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Monday, April 27, 2020

खुद से मिलकर बातें करना अच्छा लगता है


मुझ पर
तुम्हारी उदास शामों की
चाय उधार रही 
तुम पर
मेरी वीरान रातों की नींद उधार रही 
अब फैसला तुम पर छोड़तें हैं 
या हम ये उधारी चुका लें 
या बने रहें कर्ज़दार 
एक दूसरे के 
मिलते रहें 
यूँ ही एक दूसरे से 
शिकवे शिकायत के बहाने 
इसके सिवा दुनिया में रखा क्या है 
बातें करने के लिए  
बहाने चाहिए 
वरना 
बैठे 
रह जाते हैं 
हम दोनों अक्सर 
उस बहती धारा के किनारे 
और बहते रहते हैं उस के साथ 
चुपचाप खामोशी से एक दूसरे की 
धड़कनें गिनते 
हुए 


Thursday, April 23, 2020

मन रे तू काहे ना धीर धरे


जब 
नहीं रह जाता कुछ  
बाहर झाँकने के लिए 
तो अपने ही भीतर  
झाँकने लगती हूँ 
जहाँ मिलते है मुझे
उत्तर की प्रतीक्षा करते 
ठगे से खड़े प्रश्नों के अवशेष 
आश्चर्य और कशमकश से भरी 
इस घुटन से घबरा कर 
फिर बाहर भागती हूँ 
जीवन का एक बड़ा हिस्सा 
इसी भीतर -बाहर के पलायन में
हो जाता है व्यतीत 
शेष रह जाती हैं थोड़ी सी राहतें 
जो मिलती हैं तब 
जब सींचती हूँ मैं 
अपने पूरे भरोसे के साथ 
सड़क जितनी लम्बी 
उम्मीद की बेल को 

Thursday, August 17, 2017

तू न चलेगा तो चल देंगी राहें


इस 
दुनिया में
 जितने तरह के नाम है 
उतने ही तरह के निराले इंसान  
जैसे 
इस धरा में 
पुष्पित हुए हैं पुष्प 
नाना प्रजाति नाना प्रकार के 
उनके 
रंग अलग हैं 
सुवास भी अलग सी 
आकार अलग प्रकार अलग 
गोया 
एक आंगन में 
एक ही तरह के संस्कार 
एक सा व्यवहार मिलने पर भी  
कुछ 
बन जातें हैं 
अच्छे विचारों के संवाहक 
कोई संसार की हर बात से ख़फ़ा 
कोई 
हो जाता है 
मीठा मधु फूलों सा प्यारा 
कोई नीम कड़वा गुलाब का कांटा 
चंद 
दुनिया से दुखी 
हर बात हालात से नाराज़
कुछ रहतें हैं हर हाल आनंदित 
हमें 
खूब रास आती है 
कड़वाहट नीम करेले की 
नागफनी से तो बेइंतहा मोहोब्बत है ही 




Wednesday, May 17, 2017

उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में


जब 
हम सीख लेते हैं 
कहना सुनना और शब्दों से खेलना 
हमें 
लगता है 
हमने कविता कह दी 
जब 
हम सीख लेते हैं 
हंसना कुहुकना और चहकना 
हमें 
लगता है 
हम मलंग हो गए हैं 
जब
 हम सीख लेते हैं 
सड़कों जंगलों में भटकना 
हमें लगता है हम यायावर हो गए 
जब 
हम सीख लेते हैं 
मुस्करा कर आगे बढ़ जाना 
हमें 
लगता है 
हम जीना सीख गए हैं 
हम 
होते कुछ हैं
 खुद को समझ कुछ और लेते हैं


Monday, February 20, 2017

जाने कहाँ गए वो दिन


मुझे ताज़्ज़ुब होता है 
कि बात क्या थी
हालात क्या थे 
फ़िक्र क्या थी 
हौसले क्या थे 
उम्र क्या थी 
ज़ज़्बात क्या थे 
बहरहाल जो भी था 
बालपन की सुबह थी 
यौवन के दिन थे 
अलसाई सी शामें थीं और 
अलमस्त सी रातें 
वो उम्र भी क्या उम्र थी 
वो स्कूल के दिन
वो कॉलेज के दिन 
ठहाकों कहकहो के दिन 
कसकती मदहोशी के दिन 
मुझे ताज़्ज़ुब होता है 
आखिर वे दिन गए तो गए कहाँ 
 



Tuesday, November 15, 2016

चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है


कल आकाश ज़्यादा स्याह था या चाँद ज़्यादा श्वेत 
अपने अपने रूप से गर्वित दोनों प्रसन्न थे 
अपनी गहराइयों और खामोशी के साथ 
आकाश महोब्बत से सराबोर 
चाँद इश्क़ में गरिफ्तार 
पूरक एक दूसरे के 
आकंठ डूबे प्रेम में 
तुझ बिन मैं क्या 
मुझ बिन तू क्या 
यही है उनकी कविता का स्वर 
उनकी कथा का कथानक 
दुनिया को भूल कर 
एक दूजे के पहलू में समाये 
मदहोश दीवानों से 
दुनिया ने जी भर सराहा 
इश्क़ और महोब्बत की 
इस अनूठी दास्तां को 
उस स्याह आकाश को 
उस संदली चाँद को 
जो जानतें हैं महोब्बत करना 
वर्षों से खामोश रह कर 

Monday, October 24, 2016

बचपन के दिन भी क्या दिन थे



बचपन की यादों से
न जाने क्या हो जाता है 
कुछ खोया पाया लगता है 
मन उलझा सुलझा रहता है 
हम लिखने लगते हैं नज़्में 
और जीने लगते हैं उनको 
उन नज़्मों में होती है 
अनगिनत अनकही बातें 
कुछ लम्हे खुशी के 
कुछ दुख की सौगातें 
कुछ किरचें यादों की लेकर  
खामोश सफर तय करते हैं 
भावों की खेती करते हैं
रिश्तों के फूल खिलाते हैं  
यादों की भीनी खुशबू से 
सपनो में रंग भरते हैं  
कुछ इत्र के बादल उठते हैं 
कुछ प्रेम लिपटता जाता है 
हम ख्वाब सजाने लगते हैं  
ये किससे कैसा नाता है 
कागज़ पर रख कर यादों को  
संसार बसाने लगते हैँ 
अनुभव के पक्के रंगों से 
जीवन को लिखने लगते हैं 
फिर से एक बार पलट कर 
बचपन को जीने लगते हैं 

Thursday, July 14, 2016

नहीं तो चिरागों से लौ जा रही थी


कितना वक्त बीत गया 
बाहर की दुनिया में दौड़ते हुए 
भीतर की तरफ यात्रा करनी है 
अब कहीं तो पहुंचना है 
एक कश्मकश है, छटपटाहट है 
कुछ है भीतर, बहुत कुछ है 
जो आतुर है सिमटने को
कभी बिखरने को
जीवन का उत्साह है
जानने की उत्सुकता है 
अपनों का स्नेह है, प्रेमी का प्रेम है 
मिलन की खुशी है, बिछोह का दर्द है 
क्या है कुछ खबर नहीं 
कभी ढल जाएंगे ये अहसास
यादों की नमी लिए  
महकते शब्द बनकर 
कोरे कागज़ पर 
तब कह देंगे हम दुनिया वालों से 
समझो अपने भीतर के अहसासों को 
जो हर रूप में होते हैं 
सुंदर, खूबसूरत और बेमिसाल  
 

Wednesday, June 29, 2016

अज़नबी कौन हो तुम


इंतज़ार न भी हो किसी का तो क्या 
हमें पलट कर देखने की 
आदत हो गई है 
क्या करें 
कभी जी लेते हैं कुछ पल महोब्बत के
कभी बन जातें हैं अज़नबी फिर से 
चलते रहतें हैं दोनों 
चुपचाप 
एक ही राह के 
मुसाफिर बन कर 
न हम ही कुछ कह सके 
न तुम ही कुछ बोले 
चलो अब रहने दो 
 कुछ न कहो 
हम  
खामोशी से 
कर लेंगे गुफ्तगूं 
एक आदत हो गई है
 अज़नबी बने रहने की 
एक दूसरे में समाते हुए 
एक दूसरे से नज़रें चुराते हुए 
फिर भी कितना अच्छा होता गर 
सफर खत्म होने से पहले 
हम कहीं तो पहुंचते 
कभी तो मिलते 
पहली बार 
एक बार
सिर्फ  

Tuesday, May 17, 2016

खुश रहो अहले वतन, हम तो सफर करते हैं


https://en.wikipedia.org/wiki/Cellular_Jail    ( Port Blair, Andaman ) 


ए मुकद्दर तेरा जवाब नहीं
मेरी तक़दीर में न सही 
हुजूम अपनों का 
गैरों को अपना सकें  
ऐसी भी कोई बात नहीं 
 
हमें अपने आप से 
फुर्सत नहीं मिलती 
काम औरों के आ सकें 
ऐसे भी हालात नहीं 

या रब! कुछ करो ऐसा 
मनावन का दौर चले 
कुछ रूठों को मना ले  
कुछ बिछड़ों को मिला दे 

ज़िंदगी का फलसफा यही 
चाँद हँसे तारे खिले 
हवा चले नदियां बहें 
तनहा हो अनजान हो 
सफर यूँ ही चलता रहे.. 



Wednesday, May 4, 2016

दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन


जब भी फुर्सत मिलती है 
चंद घड़ियों की 
न जाने कितने ही ख़याल 
अंगड़ाई लेने लगते हैं 
मन झूमने लगता है 
सोच के सागर हिलोरे लेने लगतें हैं 
अनेक उलझे-सुलझे, सवाल -जवाब  
ढलने लगतें हैं नज़्मों में 
सूरज के ढलते ही 
यादों का कारवां लिए 
शाम चली आती है 
तब मुस्करा देता है चाँद और 
दबे पैर चले आते हो तुम भी 
ख्यालों में ....

Monday, March 14, 2016

कुछ तुमने कहा होता कुछ हमने सुना होता


तुमने कितनी शिद्दत से कहा था 
हम तुम मिलेंगे एक दिन 
और तब तुम कहोगे 
कि तुम करते हो प्रेम मुझसे 
परन्तु वह दिन नहीं आया 
अभी तक 

तुमने कहा था हर सुबह 
जब तुम लोगे मेरे नाम को शिद्दत से  
तब सारी कायनात जगमगा उठेगी 
मेरी पुलक से तुम्हारी मुस्कान से 
और वह दिन भी नहीं आया 
अभी तक 

तुमने ऐसा भी तो कहा था 
कि हर शाम डूबते सूरज के साथ 
विदा कर दोगे तुम अपनी उदासियों को 
फिर हमारे रिश्तों की यादों को 
जीवित कर के अपने दिल में 
महक उठोगे मोगरे की डाली से 
देखो वह दिन भी तो नहीं आया 
अभी तक 

तुम बोलतें ही क्यों हो ऐसा कुछ भी
जिसे कभी पूरा नहीं कर सकते 
तुम चुप ही क्यों नहीं रहते 
मुझे पसंद है तुम्हारी खामोशियाँ भी 
वही तो है जिसे मैं पढ़ पाती हूँ हर शाम 
बड़ी खूबसूरती से तुम्हारी बातों में 
दरअसल खामोशी को पढ़ना और समझना 
बस यही एक काम आता हैं मुझे 
बखूबी !! 

Thursday, January 14, 2016

नील गगन की छाँव में दिन रैन गले से मिलते हैं


​मेरा मन ​पंछी उड़ता रहता है 
नदियों पहाड़ों के ऊपर 
खुले विशाल आकाश में 
वहाँ मेरे साथ होता है 
एक सलोना सा चाँद 
ऊपर से दीखता है 
दुनिया का केवल बाहरी सुन्दर रूप 
भीतर की व्यथाएं, उलझनें कष्ट नहीं दीखते 
नहीं दिखतीं हैं रंजिशें और मन-मुटाव  
इसलिए मैं रहना चाहतीं हूँ 
वहीं उस भ्रम की दुनिया में 
हमेशा खोयी हुई 
इन नदियों, पहाड़ों की दुनिया में 
विस्तृत आसमान में 
सबसे दूर सबसे अलग 
अपनी खामोशियों और 
उस संदली चाँद के साथ 
जो बरसाता रहता है 
अपनी शीतलता 
चारों तरफ 

Wednesday, December 16, 2015

गगन रंग दे तू मेरे मन का


तुम 
एक शाम 
खामोश रह कर गुज़ारो  
यकीनन महोब्बत हो जाएगी 
खुद से 
और सारे जहां से 
अपने आप को ठीक तरह से 
परखने निरखने और समझने का 
अवसर 
तभी मिलता है 
जब आप इधर उधर की 
वाहियात बातों पर गौर न करें 
यूँ तो 
शामें अक्सर 
गुज़र जातीं हैं बेरौनक 
काम को पीठ दिखा कर पलटते लोग 
धूप 
जो फिसलती है 
पहाड़ियों से घरों की छतों से   
पेड़ों में छिपने लगतें हैं चिचियाते पंछी 
सूरज 
 हाथ छुड़ाता और 
बेमन से अलविदा कह देता  
लालिमा से गुलनार होते गगन से 
कहना 
अलविदा किसी से 
हमेशा बेहद मुश्किल होता है 
अलविदा दिन अलविदा एक और शाम 
कल 
फिर होगी 
हर शहर की एक नई सहर
ताज़गी और जीवन ऊर्जा से भरपूर 



Monday, September 14, 2015

खोया -खोया चाँद


मेरी नज़र नहीं उठती अब 
उस चाँद की तरफ 
इसलिए अब मुझसे 
कविता नहीं रची जाती 

शाम अब भी होती है 
बादलों के सिंदूरी टुकड़े 
अब भी सजते हैं 
आकाश के उसी कोने पर 

एक अर्सा बीत गया 
चाँद को देखे हुए 
भावनाओं का तूफ़ान अब 
खामोशी ओढ़कर सो जाता है 

शब्द खो गए संवेदनाएं चूक गईं 
चलो अच्छा ही हुआ 
चाँद को अवकाश मिला 
और मुझे सुकून  

चाँद तुझे तेरी आज़ादी मुबारक 
अब करो अपना सफर पूरा  
रात के स्याह अन्धकार से 
गुलनार होती सहर तक 


Saturday, September 5, 2015

कई बार यूँ भी होता है


कौन बनना चाहेगा 
मात्र एक ऐसी नदी 
जो सुने अपनी ही कलकल 
अपनी धड़कनों के मानिंद 
बहे चुपचाप रवानगी से 
अपने विचारों की तरह 
उतर आए पहाड़ों से 
और खो जाए जंगलों में 
सबसे दूर 
अपने आप से दूर 
कुछ वक्त बाद 
ऐसा ही हो जाता है 
इंतजार का रूप 
कि सहसा एक दिन 
छा जाता है वह  
हमारे सारे वज़ूद पर 
तुम और मैं से ऊपर उठकर 
एकसार हो जाता है 
हमारी ही तरह 


Wednesday, July 22, 2015

मासूम चाँद सी खामोशी


गोपनीयता बना देती है 
प्रेम को और भी सुंदर 
अलग हो जाता है उसका स्वरूप  
उस भीड़ भरे शहर से 
सुदूर गांव के उस शांत पहाड़ी कोने सा 
जहाँ होती है सुवास फूलों की 
होता है साथ हवा का 
भीगातीं हैं बरसातें 
खिलखिलाते हैं झरने 
हौसला देते हैं पहाड़
रवानगी देतीं हैं नदियाँ 
ऐसे में सुनाई देतीं हैं 
सिर्फ धड़कनें 
और महसूस होते है 
दबे सहमे और शर्मीले अरमान 
भरपूर खामोशी और मासूमियत 
उस अकेले ऊपर बैठे 
मासूम चाँद सी 

Tuesday, July 14, 2015

मन बावरा उड़ता जाए


रह -रह कर 
लौट -लौट कर हम 
फिर वहीं पहुँच जाते हैं 
जहाँ से बहुत दूर चले जाना चाहते थे
बचते हैं उन्ही रास्तों की पुनरावृत्ति से 
टकराना नहीं चाहते उन विचारों से 
जो बाँध लेते हों अपने आप से 
कसक बेचैनी उदासी 
कभी नहीं चाहता कोई 
सभी आकाश होना चाहतें हैं 
शामियाने की तरह तना हुआ 
दूर दूर तक फैला हुआ 
स्वतंत्र साफ़ ऊर्जावान 
बंधन, छटपटाहट देते हैं 
घबराहट देतें हैं 
फिर भी ये मन 
न जाने क्यों 
बंधने को बेकरार रहता है 
पतंग सा क्यों नहीं हो सकते हम? 
जो लहराती है आज़ादी से 
उस विशाल आसमान में 
एक छोर से दूसरे छोर तक 

Thursday, June 11, 2015

चंदा देखे चंदा


तुमने कहा था चलते रहो 
और मैं चलती ही गई 
पहुँच गई उस जगह 
जहाँ से अब तुम मुझे 
दीखते ही नहीं 
तुम साथ नहीं चले ?
या फिर मैं तेज चल पड़ी ?
बहरहाल रुकना मेरी फितरत नहीं 
तेज चलना तुम्हें आया नहीं 

कहा था एक दिन तुमने 
मिलेंगे कभी कहीं 
जगह तय तो नहीं थी 
परन्तु मिलना तय था 
किस रोज के लिए तय था ?

तुमने कहा था 
चाँद की साजिश है ये 
कि उसमे दीदार कर लें 
हम एक दूसरे का 
चाँद मुस्कराया था
हमारी इस बेवफा सोच पर 
सुविधा से चुनी हुई अदा पर 
अब देखलो जी भर के 
उस ऊपर टंगे निष्ठुर चाँद को 
तुम वहां से और मैं यहाँ से 
चांदनी चांदनी होते 


Sunday, April 19, 2015

गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता


कभी खोलती हूँ जब 
जज्बातों की पोटली 
तब निकलतें हैं उसमे से 
गांव कस्बे शहर 
वहां के पेड़ नदी हवा 
सोचों की बारिश होने पर 
यादों की खेती लहलहा उठती है 
तुम्हारे ख़याल की 
एक हल्की सी झलक दमक उठती है
तुम्हारा हंसना तुम्हारा बोलना 
मुझे अच्छा लगता है 
मैंने कहा था न तुमसे 
कभी बैठेंगे चुपचाप 
गुलमोहर के दरख़्त तले 
और करेंगे ढेर सारी बातें 
मन ही मन 
जिसे सुन सकेंगे सिर्फ हम दोनों 
देखो तो गुलमोहर फिर से 
अपनी सुर्ख ताब बिखेरने लगा है 
बताओ प्रियवर 
तुम कब आओगे?