Wednesday, April 25, 2018

हिन्दी अकादमी की मासिक पत्रिका - इंद्रप्रस्थ भारती (मार्च 2018 ) में प्रकाशित कहानी - मुख़्तसर सी बात

'साहित्य कोई खेल नहीं' में मैत्रेयी पुष्पा जी की कलम से निकले शब्द - अपनी ही पीड़ाओं से बंधे आज के अविश्वासी लेखन संसार में खुद को साधे रखना मामूली बात नहीं है।

 ' प्रेम अनुभूति और अहसास है। प्रेम परमानंद है तो मीठा दर्द भी है।प्रेम तो आत्मा का आत्मा से और दिल से दिल का संगम का दिव्य अहसास है.'  (डॉ जीतराम भट्ट)


Thursday, April 12, 2018

उदयपुर से प्रकाशित, त्रैमासिक पत्रिका - अभिनव सम्बोधन ( जनवरी -मार्च २०१८ ) में प्रकाशित कहानी - 'धुंध भरे रास्ते'

सम्पादक - क़मर मेवाड़ी जी 
मेवाड़ी जी उन चंद आदरणीय सम्पादकों में हैं जो कहानी देख कर निर्णय लेते हैं न कि कहानी भेजने वाले के परिचय के आधार पर। अक्टूबर २०१५ - जनवरी २०१६ की सम्बोधन पत्रिका का जब स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर प्रकाशित -प्रेम कथा अंक आया था। तब मैंने फेस बुक पर लगी पोस्ट के आधार पर उन्हें अपनी एक प्रेम कथा 'सरल समर्पण' यूँ ही भेज दी थी। अद्भुत आश्चर्य तब हुआ जब उनका सिर्फ एक वाक्य कहता हुआ फोन आया। " बहुत शानदार कहानी है। संग्रह में ले रहा हूँ। लिखती रहें।" कहानी उन्हें बेहद पसंद आयी थी। उस वक्त मैं ढेरों आश्चर्य से भर गई थी। सोचा इतने वरिष्ठ साहित्यकार, इतनी ईमानदारी और इतनी विनम्रता। उस कहानी के बाबत मेरे पास खूब मेल, टेक्स्ट और फ़ोन भी आए थे। आज विरले ही हैं जो किसी को सराहते हैं और उनके आगे बढ़ने पर प्रसन्न होते हैं? साहित्य की दुनिया में यदि आदरणीय क़मर मेवाड़ी जी जैसे अग्रज हों तो नवोदयों का मार्ग प्रशस्त होता रहेगा, हौसला बना रहेगा और कलम चलती रहेगी। मेवाड़ी जी आपको मेरा नमन। 



Thursday, April 5, 2018

उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसे रामगढ़ ( नैनीताल ) में कवयित्री महादेवी वर्मा की मीरा कुटीर के प्रांगण को गुलज़ार करती दो दिवसीय गोष्ठी - स्त्री और लेखन'

"पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले / विश्व का क्रंदन भुला देगी / मधुप की मधुर गुनगुन।"

कुछ ऐसी ही मधुर गुनगुन से २६ एवं २७ मार्च २०१८ को कई दिग्गज साहित्यकारों ने नैनीताल की विहंगम पहाड़ियों को संगीतमय किया। उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसे रामगढ़ ( नैनीताल ) में स्थित कवयित्री महादेवी वर्मा की मीरा कुटीर के प्रांगण ( शैलेश मटियानी पुस्तकालय के हाल में ) को गुलज़ार करती दो दिवसीय गोष्ठी - स्त्री और लेखन' समपन्न हुयी। यह गोष्ठी महादेवी के १११ वे जन्मदिन पर 'महादेवी सृजन पीठ' कुमाऊं विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित की गई ।
 सुश्री मृदुला गर्ग, श्री मंगलेश डबराल, श्री सतीश जायसवाल, महादेवी सृजन पीठ के निदेशक प्रो देव सिंह पोखरिया, संगोष्ठी समन्वयक श्री मोहन सिंह रावत एवं कई अन्य साहित्यकारों के सानिध्य में उनके उत्तम विचारों को आत्मसात करते वे अद्भुत पल थे। महादेवी की प्रिय शिष्या डॉ यास्मीन सुल्ताना ने उनके साथ व्यतीत अपने सुंदर पलों को संस्मरण द्वारा साझा किये। गीता गैरोला दी, श्री मुकेश नौटियाल, श्री सुनील भट्ट , श्री कुंवर रविंद्र, डॉ सिद्धेश्वर, डॉ शशांक, डॉ अनिल, मेरी बाल सखा डॉ नूतन गैरोला एवं कई अन्य साहित्यकारों ने आलेख एवं कविताओं में समाहित भावों से सभी को मंत्रमुग्ध किया।




अल्पभाषी, विनम्र एवं कुशल संचालक श्री मोहन सिंह रावत जी को हार्दिक धन्यवाद एवं आभार जिनके आमंत्रण पर मैं गोष्ठी में सम्मिलित हुयी। सौम्य प्रो देव सिंह पोखरिया जी का भी हार्दिक धन्यवाद एवं आभार जिन्होंने मुझे कविताओं के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करने का अवसर प्रदान किया। अन्य सभी मित्रों को साधुवाद, अभिनन्दन।
गोष्ठी के दूसरे दिन सुस्वादु भोजन के उपरांत प्रसन्नता से सराबोर और परिचय का आदान -प्रदान करते हुए सभी विदा हुए अगले वर्ष फिर से एकत्रित होने के लिए।  

Monday, April 2, 2018

बीटल्स आश्रम ( महर्षि महेश योगी आश्रम, चौरासी कुटिया ) ऋषिकेश -उत्तराखंड


"If you don't know where you're going, any road will take you there."

When you've seen beyond yourself, then you may find, peace of mind is waiting there." 

प्रकृति की बेपनाह सुंदरता, जंगल की अद्भुत शांति, बोलते- खामोश खँडहर और लुभावनी छोटी - छोटी ध्यान गुफाओं में बनी कलाकृतियां और उनके अवशेष की कहानियां समेटे बीट्लस आश्रम खूब आकर्षित करता हैं।
 इंग्लैंड का एक मशहूर इंग्लिश म्यूजिकल बैंड जो सन 1960 - 1970 के बीच खूब चर्चित रहा। 












Tuesday, February 27, 2018

मन की आँखों और दिल की गहराइयों से उपजी - डॉ प्रेम सिंह ( जन्म से दृष्टिबाधित ) की 'उजास '

 "सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड काव्यमय है। प्रकृति के कण -कण में कविता रची बसी है। मनुष्य नहीं था तब भी कविता थी, मनुष्य नहीं रहेगा तब भी कविता रहेगी। मैं कविता के बिना नहीं रह सकती।"  ये विदूषी कवयित्री डॉ प्रेम सिंह के उद्धगार हैं। सामान्यतः दुनिया को अपनी दृष्टि से देख कर लिखने पर भी जीवन के बहुत से कोने नज़रों की ज़द में नहीं पाते। वहीं ( जन्मांध ) कवयित्री ने केवल अपनी मन की आँखों से देख महसूस कर वह रचा कि पढ़ने वाला वाह और आह स्वतः ही कर बैठे। हर भाव हर रूप में रची -बसी कविता के जरिये उनकी बात सीधे दिल में प्रवेश करती हुयी अंतर्मन को उद्वेलित कर देती है ' उजास'  शीर्षक से प्रकाशित कविता संग्रह की कविताओं की कुछ बानगियाँ :

"तुमने समन्दर में चाबी फैंकी है, मुझे ताला तोड़ना नहीं आता 
ताला खोलना अवश्य आता है, उसी चाबी से, जो तुमने समन्दर में फैंकी है।

बहुत कुछ पा लेने के बाद भी कभी दिल का कोई कोना जब अकेला महसूस करने लगे तब कवि ह्रदय की पुकार .
 "मैंने, जीवन को और जीवन ने मुझे दिया तो बहुत कुछ है 
ये अलग बात है कि उदास रहने की आदत सी पड़ गई है।

लाजवाब पंक्तियाँ .
 "मेरा ह्रदय सूना तो नहीं, कितनी कवितायेँ खेल गईं, कितने गीत पल गए,
कितनी कहानियां दुलार पा गईं, फिर मैं व्यर्थ ही क्यों कहतीं हूँ कि ह्रदय सूना है।

मुट्ठी भर स्वतंत्रता की चाह में समाज की दकियानूसी और तंग सोच पर कवयित्री का प्रहार। 
"आकाश को उन्मुक्त हँसते देखा, मैंने भी उन्मुक्त ठहाका लगा दिया
इस तरह हँसते शर्म नहीं आती, कह कर तमाचा जड़ दिया गया और ताला लगा दिया गया 
आकाश पर तमाचा नहीं जड़ा जाता, आकाश को ताला नहीं लगाया जा सकता। "

वासंती बयार के आने पर प्रफुल्लित मन लिए वे गए उठीं। 
"वसंत अच्छा हुआ तुम गए, सोई कविता जग गई, तुम्हारा आना सुखकर है वसंत 
भावनाएं प्रस्फुरित हो जातीं हैं, अवगुंठित कविता, कामिनी बन जाती है।"

स्वार्थी और दूसरों का अहित सोचने, करने वालों पर उनका एक मारक तंज। 
 "थाली में सुराख करके, जो दूसरों को दे दोगे, तो क्या वह तुम्हारे हिस्से आएगी !
कभी कोई चोर, सब बर्तन चुरा ले जाएगा और टूटी हुयी थाली बस छोड़ जाएगा 
तब उसी को जोड़ कर, काम में लाना पड़ेगा। "

कवयित्री के मासूम मन की एक झलक।  
"भय लगे तो क्षमा मांगो, क्रोध आए तो क्षमा मांगो 
क्षमा ही करो और क्षमा ही मांगो, क्षमा ही शायद मुक्ति का द्वार है।

इसी तरह जाने कितनी ही खूबसूरत कविताओं से सराबोर यह काव्य संग्रह अद्भुत और संग्रह करने योग्य पुस्तक है। 


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