8 जून 2012 को एक छोटी सी टोकरी में बैठ कर वह मासूम आँखों वाला प्यारा, नन्हा मेहमान हमारे घर आया। तब वह एक सप्ताह का था। वैसे उसका जन्म 29 अप्रैल को हुआ। हमारी एकमात्र बिटिया को जब साथी की जरूरत महसूस हुई तब हमने उसे कुछ ऐसे बहलाया। वह नादान भी अति आनंदित होकर बहल गई। वह छोटा भाई था इसलिए बड़ी बहन की डांट, फटकार, स्नेह, प्रेम, धमाल सब उसके हिस्से में आया। घर गुलज़ार हो गया। उसका नामकरण हुआ तो नाम पड़ा बॉस्को।
वक्त के साथ जितना बॉस्को शैतानी करता उतना ही सबका दुलारा बनता गया। सुबह और शाम को घूमते हुए घर ही नहीं सोसाइटी भर के बड़े, बच्चे सभी उसे सहलाये बगैर आगे नहीं बढ़ते हैं। शांत, प्यारा, आज्ञाकारी, सुन्दर बोस्को।
बॉस्को का डॉक्टर के पास जाना अमूमन नहीं होता है। वर्ष में केवल एक बार जाता है वो भी रेबीज और डिस्टेंपर का इंजेक्शन लगवाने। या फिर खून की जांच आदि करवाने। घर का खाना वह आनंद पूर्वक खाता है। न तो उसे डॉग फूड की आदत डाली गई न उसने कभी पसंद किया। पहले चिकन और चावल खाता था। बाद में १० वर्ष का होने पर डॉक्टर ने मना कर दिया कहा - प्रोटीन कम देना होगा। चिकन थोड़ा कम खिलाइए। यानि उसे शाकाहारी बनना होगा। परीक्षा थी जिसने कभी सब्जियां खाई ही नहीं अब खाएगा क्या? कहीं घूमने जाने पर उसे दो -दो दिन भूखा रहना मंजूर था किन्तु चिकन चावल के न मिलने पर कुछ और कतई नहीं खाता था। रोचक बात यह थी कि इससे न उसकी ऊर्जा में फर्क पड़ता था और न ही वह किसी तरह की नाराजगी जाहिर करता था। उछल -कूद बराबर बनी रहती।

शाकाहारी बनाने की तैयारी में अगली सुबह जब उसे सीताफल, गाजर आदि के साथ चावल दिए गए उसने झटपट, बिना किसी परेशानी के ऐसे भोजन किया जैसे रोज यही खाता होगा। क्या उसे अंतर्बोध हो गया था? क्या जानवर इतने समझदार होते है? कि वे जानते हैं उनके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा? हैरानी और संतोष से दिल भीग गया। उस दिन से बॉस्को अचानक शाकाहारी हो गया किन्तु हमेशा उछलता -कूदता स्वस्थ रहा।
बॉस्को लाह्सा एप्सो है। 14 वर्ष से अब तक बेहद स्वस्थ, सुन्दर, समझदार एवं सबको मोहित करने वाला शांतिप्रिय जीव रहा है। पिछले महीने सहसा एक दिन उसे ज्वर आया। हम उसे घर के पास बने 'वैदिक क्लीनिक' पर ले गए। ड्रिप लगी और रक्त की जांच के लिए उसका रक्त लिया गया। अगले दिन जब परिणाम आया तो उसे टिक फीवर था लेकिन बाकि रक्त की रिपोर्ट एकदम बढ़िया। उसकी किडनी, लीवर आदि सब कुछ बच्चों जैसा स्वस्थ। डॉक्टर उससे बेहद खुश रहते हैं।
चार दिन बाद मुझे फिर क्लीनिक जाना पड़ा क्यूंकि बॉस्को मुंह से बहुत ज्यादा लार टपका रहा था। डॉक्टर ने उसका मुंह खोल कर देखा तो नीचे वाले जबड़े पर करीब डेढ़ इंच का ट्यूमर। सब हैरान...कब बन गया इतना बड़ा? यह कभी दर्द से चिल्लाया क्यों नहीं? खाना कैसे खा रहा था? कई अनुत्तरित प्रश्न जेहन में उठने लगे। अब? डॉक्टर के अनुसार - मुंह के ट्यूमर अक्सर कैंसर होते हैं। बहरहाल ट्यूमर का सिरिंज सैंपल लेकर जांच के लिए भेज दिया गया। आठ दिन के बाद परिणाम सुखद था। ट्यूमर नॉन कैंसर वाला निकला। (बाद में बायोप्सी में माइल्ड, फर्स्ट ग्रेड का कैंसर था)
दिल्ली के अन्य वेटनेरी डॉक्टर के पास जाने के अच्छे अनुभव (मित्रों आदि के मिलेजुले निजी अनुभव) मेरे पास नहीं हैं। ऊंची दुकान...की तर्ज पर छोटी सी परेशानी के लिए भी रक्त जांच, एक्सरे आदि अन्य जांच के नाम पर बड़े बिल बना देना साधारण बात होती है। पिछले कुछ वर्षों से हम लोग रेबीज का टीका लगवाने या अन्य (deworming) जरुरत होने पर 'वैदिक क्लीनिक के कुशल, एवं सौम्य सर्जन रवींद्र वर्मा' के पास जाते हैं। उनका जीव प्रेम कमाल का है फिर चाहे वह पंछी, खरगोश हो या फिर कुत्ते। बिना किसी दिखावे के सहज -सरल डॉक्टर रविंद्र अपने कार्य में निपुणता से लगे हुए हैं। हमें उनके ज्ञान, योग्यता और इलाज पर पूरा भरोसा है।
बॉस्को को लेकर डॉक्टर थोड़ा असमंजस में थे कि इस उम्र में उसे एनेस्थीसिया देना कितना सही रहेगा? लेकिन मेरा मानना था वैसे भी ट्यूमर की वजह से वह दर्द में रहेगा। बाद में खाने में दिक्कत होने की वजह से कितने दिन चलेगा? इसलिए जो भी हो सर्जरी हो जानी चाहिए। हमने कंसेंट पर हस्ताक्षर कर दिए।
किडनी और लीवर की अच्छी हालत देखते हुए उसे एनेस्थीसिया दिया गया। मैंने मन ही मन सोचा 'यदि अब यह कभी नहीं उठा तो?' आंखें नम हो गई किन्तु दिल ने कहा ये हमें इतनी जल्दी छोड़ कर नहीं जा सकता। और सर्जरी हो गई। करीब 45 मिनट के बाद डॉक्टर बाहर आए। "सब ठीक हो गया। अब इसे 2 घंटे में होश आ जाएगा फिर आप इसे घर ले जा सकते हैं।" सुकून की सांस लेना किसे कहते हैं हमें उस दिन मालूम हुआ।
अपने कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने के बाद जब हम वापस आए तब तक बॉस्को होश में आकर हमारी राह देख रहा था। कुछ दस -बारह दिन थोड़ा ढीला रहा किन्तु खाते -पीते, टहलते सब बढ़िया हो गया। कमाल की बात यह थी कि आज तक हमने इसे न पहले और न बाद में कभी भी कराहते या दर्द से परेशान होते नहीं देखा और न ही खाना छोड़ते हुए। कहते हैं -कुत्ते अपना दर्द छुपाने में अति माहिर होते हैं। एक हम इंसान थोड़ा सा पीड़ा हुई नहीं कि कराहते हुए आंसुओं को रास्ता दे देते हैं।
आज खाते - पीते, उछलते, कूदते बॉस्को एक स्वस्थ जीवन जी रहा है। मनुष्य का इलाज करना फिर आसान है वे बोल कर अपना दर्द बयां कर सकते हैं, अपनी तकलीफें बता सकते हैं। किन्तु बेजुबान जानवर? जानवरों के दर्द को उनके भावों को, उनके रोगों को समझ कर उनका निदान करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। और इस दुष्कर कार्य को बखूबी अंजाम दे रहे हैं नेक एवं अपने क्षेत्र में पारंगत डॉक्टर (सर्जन) रविंद्र वर्मा।
दिल से धन्यवाद डॉक्टर रविंद्र, बॉस्को को नवजीवन देने के लिए।
Dr.Ravindra Kumar Verma
Veterinary Consultant & Surgeon
Vedic Pets Clinic and Surgery Centre
8, Gurudwara road, near Mother Dairy, Sector-1, Vaishali,
Ghaziabad, Uttar Pradesh 201010, India
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