Tuesday, June 23, 2026

जिजीविषा ( बॉस्को जिंदादिली का एक नाम )

 

8 जून 2012 को एक छोटी सी टोकरी में बैठ कर वह मासूम आँखों वाला प्यारा, नन्हा मेहमान हमारे घर आया। तब वह एक सप्ताह का था। वैसे उसका जन्म 29 अप्रैल को हुआ। हमारी एकमात्र बिटिया को जब साथी की जरूरत महसूस हुई तब हमने उसे कुछ ऐसे बहलाया। वह नादान भी अति आनंदित होकर बहल गई। वह छोटा भाई था इसलिए बड़ी बहन की डांट, फटकार, स्नेह, प्रेम, धमाल सब उसके हिस्से में आया। घर गुलज़ार हो गया। उसका नामकरण हुआ तो नाम पड़ा बॉस्को। 

वक्त के साथ जितना बॉस्को शैतानी करता उतना ही सबका दुलारा बनता गया। सुबह और शाम को घूमते हुए घर ही नहीं सोसाइटी भर के बड़े, बच्चे सभी उसे सहलाये बगैर आगे नहीं बढ़ते हैं। शांत, प्यारा, आज्ञाकारी, सुन्दर बोस्को। 

बॉस्को का डॉक्टर के पास जाना अमूमन नहीं होता है। वर्ष में केवल एक बार जाता है वो भी रेबीज और डिस्टेंपर का इंजेक्शन लगवाने। या फिर खून की जांच आदि करवाने। घर का खाना वह आनंद पूर्वक खाता है। न तो उसे डॉग फूड की आदत डाली गई न उसने कभी पसंद किया। पहले चिकन और चावल खाता था। बाद में १० वर्ष का होने पर डॉक्टर ने मना कर दिया कहा - प्रोटीन कम देना होगा। चिकन थोड़ा कम खिलाइए। यानि उसे शाकाहारी बनना होगा। परीक्षा थी जिसने कभी सब्जियां खाई ही नहीं अब खाएगा क्या? कहीं घूमने जाने पर उसे दो -दो दिन भूखा रहना मंजूर था किन्तु चिकन चावल के न मिलने पर कुछ और कतई नहीं खाता था। रोचक बात यह थी कि इससे न उसकी ऊर्जा में फर्क पड़ता था और न ही वह किसी तरह की नाराजगी जाहिर करता था। उछल -कूद बराबर बनी रहती।  
शाकाहारी बनाने की तैयारी में अगली सुबह जब उसे सीताफल, गाजर आदि के साथ चावल दिए गए उसने झटपट, बिना किसी परेशानी के ऐसे भोजन किया जैसे रोज यही खाता होगा। क्या उसे अंतर्बोध हो गया था? क्या जानवर इतने समझदार होते है? कि वे जानते हैं उनके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा? हैरानी और संतोष से दिल भीग गया। उस दिन से बॉस्को अचानक शाकाहारी हो गया किन्तु हमेशा उछलता -कूदता स्वस्थ रहा। 

बॉस्को लाह्सा एप्सो है। 14 वर्ष से अब तक बेहद स्वस्थ, सुन्दर, समझदार एवं सबको मोहित करने वाला शांतिप्रिय जीव रहा है। पिछले महीने सहसा एक दिन उसे ज्वर आया। हम उसे घर के पास बने 'वैदिक क्लीनिक' पर ले गए। ड्रिप लगी और रक्त की जांच के लिए उसका रक्त लिया गया। अगले दिन जब परिणाम आया तो उसे टिक फीवर था लेकिन बाकि रक्त की रिपोर्ट एकदम बढ़िया। उसकी किडनी, लीवर आदि सब कुछ बच्चों जैसा स्वस्थ। डॉक्टर उससे बेहद खुश रहते हैं।

चार दिन बाद मुझे फिर क्लीनिक जाना पड़ा क्यूंकि बॉस्को मुंह से बहुत ज्यादा लार टपका रहा था। डॉक्टर ने उसका मुंह खोल कर देखा तो नीचे वाले जबड़े पर करीब डेढ़ इंच का ट्यूमर। सब हैरान...कब बन गया इतना बड़ा? यह कभी दर्द से चिल्लाया क्यों नहीं? खाना कैसे खा रहा था? कई अनुत्तरित प्रश्न जेहन में उठने लगे। अब? डॉक्टर के अनुसार - मुंह के ट्यूमर अक्सर कैंसर होते हैं। बहरहाल ट्यूमर का सिरिंज सैंपल लेकर जांच के लिए भेज दिया गया। आठ दिन के बाद परिणाम सुखद था। ट्यूमर नॉन कैंसर वाला निकला। (बाद में बायोप्सी में माइल्ड, फर्स्ट ग्रेड का कैंसर था)

दिल्ली के अन्य वेटनेरी डॉक्टर के पास जाने के अच्छे अनुभव (मित्रों आदि के मिलेजुले निजी अनुभव) मेरे पास नहीं हैं। ऊंची दुकान...की तर्ज पर छोटी सी परेशानी के लिए भी रक्त जांच, एक्सरे आदि अन्य जांच के नाम पर बड़े बिल बना देना साधारण बात होती है। पिछले कुछ वर्षों से हम लोग रेबीज का टीका लगवाने या अन्य (deworming) जरुरत होने पर 'वैदिक क्लीनिक के कुशल, एवं सौम्य सर्जन रवींद्र वर्मा' के पास जाते हैं। उनका जीव प्रेम कमाल का है फिर चाहे वह पंछी, खरगोश हो या फिर कुत्ते। बिना किसी दिखावे के सहज -सरल डॉक्टर रविंद्र अपने कार्य में निपुणता से लगे हुए हैं। हमें उनके ज्ञान, योग्यता और इलाज पर पूरा भरोसा है।   
बॉस्को को लेकर डॉक्टर थोड़ा असमंजस में थे कि इस उम्र में उसे एनेस्थीसिया देना कितना सही रहेगा? लेकिन मेरा मानना था वैसे भी ट्यूमर की वजह से वह दर्द में रहेगा। बाद में खाने में दिक्कत होने की वजह से कितने दिन चलेगा? इसलिए जो भी हो सर्जरी हो जानी चाहिए। हमने कंसेंट पर हस्ताक्षर कर दिए। 

किडनी और लीवर की अच्छी हालत देखते हुए उसे एनेस्थीसिया दिया गया। मैंने मन ही मन सोचा 'यदि अब यह कभी नहीं उठा तो?' आंखें नम हो गई किन्तु दिल ने कहा ये हमें इतनी जल्दी छोड़ कर नहीं जा सकता। और सर्जरी हो गई। करीब 45 मिनट के बाद डॉक्टर बाहर आए। "सब ठीक हो गया। अब इसे 2 घंटे में होश आ जाएगा फिर आप इसे घर ले जा सकते हैं।" सुकून की सांस लेना किसे कहते हैं हमें उस दिन मालूम हुआ। 

अपने कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने के बाद जब हम वापस आए तब तक बॉस्को होश में आकर हमारी राह देख रहा था। कुछ दस -बारह दिन थोड़ा ढीला रहा किन्तु खाते -पीते, टहलते सब बढ़िया हो गया। कमाल की बात यह थी कि आज तक हमने इसे न पहले और न बाद में कभी भी कराहते या दर्द से परेशान होते नहीं देखा और न ही खाना छोड़ते हुए। कहते हैं -कुत्ते अपना दर्द छुपाने में अति माहिर होते हैं। एक हम इंसान थोड़ा सा पीड़ा हुई नहीं कि कराहते हुए आंसुओं को रास्ता दे देते हैं। 
आज खाते - पीते, उछलते, कूदते बॉस्को एक स्वस्थ जीवन जी रहा है। मनुष्य का इलाज करना फिर आसान है वे बोल कर अपना दर्द बयां कर सकते हैं, अपनी तकलीफें बता सकते हैं। किन्तु बेजुबान जानवर? जानवरों के दर्द को उनके भावों को, उनके रोगों को समझ कर उनका निदान करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। और इस दुष्कर कार्य को बखूबी अंजाम दे रहे हैं नेक एवं अपने क्षेत्र में पारंगत डॉक्टर (सर्जन) रविंद्र वर्मा।  

दिल से धन्यवाद डॉक्टर रविंद्र, बॉस्को को नवजीवन देने के लिए। 


Dr.Ravindra Kumar Verma 
Veterinary Consultant & Surgeon 
Vedic Pets Clinic and Surgery Centre
8, Gurudwara road, near Mother Dairy, Sector-1, Vaishali, 
Ghaziabad, Uttar Pradesh 201010, India
Mobile - 9289544101


Monday, January 19, 2026

एक राह तो वो होगी तुम तक जो पहुँचती है

शाम के साढ़े छह बजे थे। दोनों मेट्रो स्टेशन की बेंच पर बैठे एक दूसरे को पहचानने की कोशिश कर रहे थे। दोनों खामोश। सर्द दिल्ली ने शाम की धुंध ओढ़ ली। दिन भर के काम के बाद घर जाने की जल्दी दोनों को थी। 

"हे कामिया, अभी तक यही बैठी हो?" ऑफिस का साथी रितेश था। 

'हम्म कामिया... "तो आप कामिया हैं। हिन्दू कॉलेज से? 2010  के एम ए इंग्लिश बैच से। राइट फ्रेंड?"

"अब्सॉल्युटली करेक्ट, और तुम अभिनव, सेम बैच से, है ना? दोस्त मेरे दिमाग की चिप अभी सही काम कर रही है मतलब।" दोनों हंस दिए। बीच में था पंद्रह वर्ष का लंबा अंतराल। कॉफी के साथ अतीत को गुनगुनाने का वादा अगले दिन के लिए तय हुआ। 

नियत समय पर अगले दिन टेबल पर दो गर्म कॉफी थी, मफ़िन थे और साथ में थी ढेरों बेवजह बातें। मसलन कॉलेज के बाद क्या किया? शादी, बच्चे, नौकरी का क्या बना? कौन अब किस पद पर आसीन है, कौन सी गाड़ी, अपार्टमेंट आदि। कौन कितना ऊपर? कितना समृद्ध? 

कॉफी समाप्त होने तक बातों का सिलसिला भी पूरा हुआ। अपनी -अपनी सम्पन्नता बखानते हुए दोनों प्रसन्न हुए। वक्त के साथ दोस्ती की सुगंध उड़ चुकी थी। शेष रही दोस्ती पर पड़ी धुंध। वैसी ही अनजानी धुंध जैसी पिछली शाम मेट्रो स्टेशन पर थी। 

Wednesday, December 10, 2025

इन हसीं वादियों में ( स्विटज़र लैंड की यात्रा का हमारा अगला पड़ाव - युन्ग्फ्राऊ, 3571 मीटर ( 11782 फीट )

 युन्ग्फ्राऊ (टॉप ऑफ़ यूरोप , स्विट्ज़रलैंड )


लुसर्न - शहर मध्य स्विट्ज़रलैंड का सबसे खूबसूरत शहर है। इस के पूर्व की ओर ऑस्ट्रिया, पश्चिम की ओर फ्रांस, उत्तर की ओर जर्मनी, और दक्षिण की ओर इटली है। यहाँ पर ज्यादा जर्मन भाषा का प्रयोग होता है और कुछ इतालवी भी बोली जाती है। कुछ दूरी तक हम सभी दिशाओं में चलेंगे ऐसा विचार था। अगले दिन लुसर्न से इंटरलाकन की तरफ बढ़े।

इन्टर्लाकन आरे नदी के साथ-साथ चलता ये खूबसूरत शहर अपने अनुपम सौन्दर्य के लिए जाना जाता है। यहाँ गर्मियों व सर्दियों में विभिन्न रोमांचक खेलों का आयोजन होता है। बॉलीवुड की शूटिंग के लिए यह बेहद प्रिय जगह है। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' , 'द हीरो' आदि कई फिल्मों में आप यहाँ की हरीतिमा और बर्फ से भरपूर धवल आल्प्स की पहाड़ियों के दृश्य देख चुके होंगे। हर भारतीय को गुरुर से सिर उठाने का अवसर देती कांस्य की बनी यश चोपड़ा जी की आदमकद मूर्ति शान से एक पार्क में खड़ी है। 


यहीं से शुरू होता है युन्ग्फ्राऊ और टिटलिस की पहाड़ियों के लिए रास्ता। जिसे कॉग व्हील ट्रेन ( खाँचों में फंस कर चलते पहिए ) और गंडोला, रोटेयर द्वारा तय करना होता है। 


ऊपर एक होटल, दो रेस्तरां, एक ऑब्सर्वेटरी , एक स्की स्कूल, एक सिनेमा हाल, एक रिसर्च सेण्टर व एक आइस पैलेस है। ट्रेन से बाहर निकल कर हमने रेस्तराँ में प्रवेश किया और एक मग गर्म चॉकलेट का पीकर बाहर बर्फ में निकल आए। अथाह बर्फ के बावजूद भी ठंड का नामोनिशान नहीं। पता नही ख़ुशी थी या जोश...आंग्ल लोग जहाँ कोट, टोपी, स्वेटर और मफलर से लेस होकर फोटो खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे और अपनी ठंड से लाल होती नाक को टिशू से सहला रहे थे वहीं हमारी मई- जून की गर्मी से झुलसे हुए भारतीय लोगों का दल (कुछ बुजुर्गों को छोड़कर) गर्म कपड़े हटा कर, बर्फ में खूब लोटपोट हो कर हँसते, खिलखिलाते खेल रहे थे। एक विदेशी ग्रुप लीडर ने बड़े ही आदर भाव से मेरे निकट आकर अपनी प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा। "भारतीय बहुत रंगीन मिजाज़ और खुशदिल होते हैं और ज़िंदगी को भरपूर जीते हैं.. " एक सहज, गर्वित मुस्कान मेरे चेहरे पर छा गई। 

हिम महल (आइस पैलेस) - यहीं पर बना है हतप्रभ करता आइस पैलेस, बर्फ का महल। मुख्य द्वार से ही बर्फ शुरू हो जाती है। फिसलने के डर से सभी, साइड में लगी रेलिंग को पकड़ कर चल रहे थे। कुछ देर बाद मालूम हुआ कोई जरुरत ही नहीं रेलिंग पकड़ने की। नीचे बिछी बर्फ के ऊपर वैक्स की पारदर्शी तह लगी थी। रपटने का कोई मतलब नहीं। चारों तरफ बर्फ की भव्य दुनिया। बर्फ से बनी आकृतियाँ जैसे मोर, पक्षी, टेडी बेयर, भालू, बच्चे आदि की सजीव सी लगती आकृतियाँ और गुफाएँ मन मोह रही थीं। अन्दर तापमान सेट होता है जिससे वहाँ पर बनी आकृतियाँ व आकार बने रहें। सफ़र की समाप्ति कर अति आनंदित हो फिर हम नीचे उतरने लगे। 

इतना सब कुछ देखकर लगा धन्य है मानव और उसकी कलात्मक सोच। एक बात तो ज़हन में जरुर आ रही थी कि वहाँ पर सिर्फ 3571  मीटर की ऊँचाई पर ये सब बना दिया गया है। हमारे भारत के 18,380 फीट की ऊंचाई पर स्थित लद्धाक में खर्दुंग ला विश्व में सबसे ऊंचाई पर बना मोटर मार्ग में प्रकृति ने हमको इससे भी सुन्दर नज़ारा दिया है। लेकिन वहाँ पर सिर्फ मुस्तैदी के साथ डटे हुए देश के वीर जांबाज सैनिकों के अलावा और कुछ क्यों नहीं है? कहाँ क्या कमी रह गई है...? यह कमी हम में है ? या हमारी व्यवस्था में..?

Monday, November 24, 2025

फिर छिड़ी रात बात फूलों की


उस दिन सूरज की किरणों के जगाने से पहले ही नींद उचट गई। पिछली रात की बारिश से वातावरण में ठंडक समाई हुई थी। चलते चले जाने का मन हुआ दूर तक इन सर्पिलाकार सड़कों पर जो बारिश की नमी से भीगी हुई थीं। रविवार की छुट्टी वाला बेफिक्री भरा दिन। मन प्रसन्न था और सोच स्वतंत्र। ज़िंदगी कभी इतनी रहम दिल भी हो जायेगी सोचा नहीं था। बीती -बिसरि स्मृतियों को जोड़ते - तोड़ते निरुद्देश्य चलते रहने का भी अपना आनंद है।    

जीवन के इस पड़ाव में घटनाओं और अनुभवों से सराबोर ये ज़िंदगी अब और भी अच्छी लगने लगी है। भोर में चह -चह करती गौरैया बहुत दिख रही थी। मेरी बचपन की यादों का पंछी, टुकुर टुकुर ऐसे देख रही थी जैसे पहचान रही हो। फूलों और जंगली घास की मिली जुली खुशबू से महकती मैं अपनी कल्पनाओं में सुन्दर रंग भरती रही। जानती हूँ ज़िंदगी कल्पनाओं के सहारे नहीं चलती। यथार्थ से रूबरू होना पड़ता है। 

पगडंडियों पर नजर रख कर न चलते हुए, सिर उठा कर चीड़ के ऊंचे, लम्बे पेड़ों के पीछे से झांकते हुए साफ नीले आकाश को देखती हुई चल रही थी। चुपचाप नीचे देखते हुए चलने से लगता है बाहरी दुनिया से बेखबर हम पूरी तरह अपने साथ है। अपना साथ सबसे सुन्दर साथ होता है। ना हम पर ना हमारे विचारों पर...कहीं किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं।  

कुछ दूर निकल आई थी। अचानक एक बड़े से नुकीले पत्थर से टकरा गई। गिरती हुई सहारे को तलाशते हाथों में सड़क किनारे लगे पेड़ की झूलती शाखाएं आ गई। गिरने से बच गई। लगा आज सभी की मिली जुली साजिश है मुझे खुश रखने की। झींगुरों की झंकृत लयबद्ध आवाजों के साथ... टूटी हुई सोच की कड़ी फिर जुड़ गई। मैं और मेरे विचार हाथ थामे साथ चल रहे थे। जीवन की गणित मजेदार होती है। कुछ सवाल पल भर में हल हो जाते हैं और कुछ हमारे साथ ही अपनी ज़िंदगी का सफ़र तय करते हैं, निरंतर, बिना थके...

सहसा सिर के ऊपर से एक चील ज़ोर की आवाज़ करती हुई निकली और मैं सहम कर वर्तमान में वापस आ गई। देखती हूँ बिन बुलाए मेहमान की तरह कई सवालों के हल खोजते हुए बहुत दूर निकल आयी हूँ। वक्त के साथ सूरज का ताप भी बढ़ता जा रहा था। वापस घर की तरफ पलटी। फिर वही रास्ते, जीवन के अलग-अलग मोड़ों पर मिलते दुख-सुख का हिसाब- किताब करते हुए वापसी का सफर घर के मुख्य द्वार पर पहुँच कर पूरा हुआ। अतीत के अनुभव टटोलती हूँ तो लगता है भीड़ की कतई जरुरत नहीं। मुठ्ठी भर प्यारे दोस्तों के साथ एक शानदार जिंदगी जी सकते हैं। 

Friday, October 31, 2025

साहित्य अकादमी मुंबई का ग्यारहवां राष्ट्रीय कार्यक्रम 25 अक्टूबर 2025 को दिल्ली में संपन्न हुआ।

'साहित्य भूषण' सम्मान से सम्मानित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद, आभार अकादमी अध्यक्ष -डॉ प्रमोद पांडे जी .



 

Monday, September 15, 2025

चार्ली चैपलिन की अद्भुत दुनिया - वेवे स्विट्ज़रलैंड में (जीना इसी का नाम है )

“I always like walking in the rain, so no one can see me crying.”
― Charlie Chaplin

संसार में हास्य बिखरने वाला भीतर कितना अकेला था। ब्रिटिश चार्ली चैपलिन ने अपने जीवन के अंतिम कई वर्ष स्विट्ज़रलेंड में वेवे शहर के इसी घर में व्यतीत किए। 1977 में अपनी पत्नी ओना एवं आठ बच्चों के साथ आलीशान जीवन जीकर वे इस संसार से विदा हुए। 

विश्व उनको एक शानदार अभिनेता, कॉमेडियन, डाइरेक्टर, फिल्ममेकर आदि कई रूपों में याद करता रहेगा। अति संघर्ष और गरीबी में व्यतीत हुए बचपन में मूक चलचित्र से लेकर आधुनिक फिल्मों तक का करीब 75 वर्ष के  कार्यकाल में उन्होंने कई मुकाम हासिल किए और अवार्ड्स लिए हैं। 
टिकट लेकर पहले कुछ शो देखने को मिलते हैं। जिनमे उनकी फिल्मों के दृश्य दिखाए जाते हैं। वैक्स की ऐसी सजीव मूर्तियां बनी हैं जैसे अभी बोल पड़ेंगी। (छोटा बच्चा - जैकी कूगन ) यह दृश्य उनकी मशहूर फिल्म  'The Kid'  का है। ऐसे ही बहुत से सजीव पुतलों से सुसज्जित उनकी कई फिल्मो के सेट बने हुए हैं। 

चैपलिन ने छोटे कोट, बड़ी बलून पतलून, अपने साइज से बड़े जूते, सिर पर हैट, छड़ी, पोस्ट स्टैम्प साइज मूंछे और रोचक चाल के साथ दुनिया को हंसी से सराबोर करते हुए एक कमाल की दुनिया रच कर अपना नाम इतिहास में (The little tramp ) दर्ज करा लिया। 

'द ट्रैम्प' जैसे किरदारों से उन्होंने हंसी के पीछे छिपे दर्द को सामने रखा। उनकी ज़िंदगी संघर्षों और पीड़ा से भरी रही लेकिन उन्होंने हमेशा दुनिया को हंसना मुस्कुराना सिखाया। 

“My pain may be the reason for somebody's laugh. But my laugh must never be the reason for somebody's pain.” (Charlie Chaplin)
यहां से निकल कर रास्ता उनके घर की तरफ बढ़ जाता है। प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही उनका आदमकद, सजीव प्रतीत होता पुतला बना है। बनाने वाली की कारीगरी देखते ही बनती है। चेहरे पर उम्र और अनुभव की रेखाओं की कलाकारी अद्भुत है।

 You'll find that life is still worthwhile, if you just smile.” ( Charlie Chaplin)

शयन कक्ष जहाँ उनकी उम्र के विभिन्न पड़ाव के चित्र लगे हैं। इसी बिस्तर पर उन्होंने 88 की उम्र में अंतिम साँस ली।   
इसी अतिथि कक्ष में आइंस्टीन आदि अन्य मित्रों से वार्तालाप होता रहा। 2016 के बाद इस घर को म्यूजियम में बदल दिया गया। आज भी उनके हैट, छड़ी, जूते आदि सामान यहाँ देखने को मिल जाता है। 

भोजन कक्ष में उनका नियम था कि कमसकम रात का भोजन सब साथ करें। तब सभी को अंग्रेजी में ही बात करनी होती थी क्योंकि उन्हें फ्रेंच नहीं आती थी। 'वेवे' स्विट्ज़रलैंड के दक्षिण पश्चिम भाग में स्थित फ्रेंच भाषियों का शहर है। 
"You need Power, only when you want to do something harmful otherwise Love is enough to get everything done" (Charlie Chaplin)

यहीं बैठ कर परिवार के साथ फिल्मों की चर्चाएं और फिल्म बनने का सिलसिला चलता था। अपनी पत्नी ओना संग बैठे जैसे अभी कुछ सुझाव दे देंगे। करीब डेढ़ घंटे तक इस बेमिसाल दुनिया में विचरते हुए भूल जाते हैं कि हम कहां हैं। चेहरे पर मधुर हास्य लिए इन महान व्यक्ति को यादों में समेटे हम सोविनीर शॉप की तरफ बढ़ गए। याद का एक टुकड़ा संजोने के लिए। 

“Life is a play that does not allow testing. So, sing, cry, dance, laugh and live intensely, before the curtain closes and the piece ends with no applause.”
― Charlie Chaplin (Charlie Chaplin Interviews)