Tuesday, April 18, 2017

यात्रा - पत्रिका 'अहा! ज़िंदगी' के अप्रैल 2017 अंक में प्रकाशित हिमाचल यात्रा वृत्तांत

अभी सफ़र में कोई मोड़ ही नहीं आया 
निकल गया है ये चुपचाप दास्तान से कौन   
( अख्तर शुमार )


हिमाचल प्रदेश की रोमांचक यात्रा 
( संपादक - आलोक श्रीवास्तव )



Thursday, March 23, 2017

तेरी है ज़मीं तेरा आसमान


कहने वाले कहते हैं ईश्वर को जहाँ देखो वहीं दीखते हैं। बस मन में श्रद्धा होनी चाहिए। शायद वो सभी महान श्रद्धालु होते हैं जिन्हें देवताओं के सर्वत्र दर्शन होतें हैं। सोसाइटी के बाहर पेड़ों के नीचे, मंदिरों के प्रांगण में या मंदिरों के आस -पास के पेड़ों पर ऐसे दरख़्त देवता बखूबी डेरा जमाये रखते हैं। बस अंतर इतना होता है कि यदि वे घर या मंदिर के भीतर विराजमान होते तो वहां इनका पूरा सत्कार होता। स्नान -ध्यान, धूप -बत्ती, भोग -प्रसाद आदि से।

यहाँ सड़क पर लगे पेड़ों के नीचे इन्हें कोई नहीं पूछता। यहाँ तक की कोई दो घड़ी रुक कर सर तक नहीं झुकाता। जुलम !! केवल स्थान बदल जाने से, सत्ता बदलने से, कुर्सी बदलने से इतना बड़ा अंतर ?  

सोचती हूँ पुराने हो जाने पर या जरा सा भी खंडित हो जाने से यदि देवताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है फिर इंसानों की क्या क़दर ? बुज़ुर्ग हुए, पुराने हुए, बीमार हुए.... सब बाहर। 

एक बड़ा सवाल ये भी है कि इस टाईप के महान भक्तों के पास यदि इन देवताओं के लिए अपने घर में जगह नहीं रह जाती है तो वो इन्हें कूड़े में क्यों नहीं फेंक देते? पेड़ों के नीचे या मंदिरों में क्यों बैठा जाते हैं ? क्या दिल में कोई चोर होता होगा ? शायद गलत कर रहे हैं ? या मन के किसी कोने में कुंठा होती होगी ? या शगुन -अपशगुन का भय ?

क्या भगवान् इस बात के लिए इन्हें माफ़ कर देते होंगे कि शुक्र है कमसकम पेड़ के नीचे तो बैठा गए कूड़े में नहीं फेंका ? हमेशा की तरह मेरे अनुत्तरित प्रश्न... 


Thursday, March 9, 2017

रहें न रहें हम महका करेंगे


मुझे खशबू से खूब-खूब लगाव है। खाने को मिले न मिले लेकिन मेरे पास इत्रों की भरमार होती है। हमेशा महकते रहोगे तो चहकते रहोगे। मेरा फ़लसफ़ा है। अमूमन मैं लिफ्ट का प्रयोग करना पसंद नहीं करती। सीढ़ियों से चढ़ने -उतरने के बहाने रोज की वर्जिश में थोड़ा इज़ाफ़ा हो जाता है। किन्तु कभी यदि लिफ्ट का प्रयोग करना पड़े तो आनंद आ जाता है। हर सुबह सभी महकते -चहकते अपने -अपने काम की तरफ दौड़ रहे होते हैं। 

लड़कियां, महिलाएं भीनी -भीनी परफ्यूम, डिओ या सौन्दर्य प्रसाधनों की सुगंध से लिफ्ट को महकाये रखतीं हैं। भोरे -भोरे तो बालक और पुरुष भी आफ्टर शेव, आँवला, केओकार्पिन आदि मह्कव्वा तेल से या टैलकम पावडर का छिड़काव करके प्रसन्न दीखते हैं। कभी किसी बालक से पूछ देती हूँ। " नाइस फ्रेगरेंस .. कौन सी है ?" फिर उनके चेहरे पर शर्मीली खुशी का रंग चढ़ते देखती हूँ। कुछ अति प्रसन्न होकर तुरंत उत्तर दे देते हैं। ' पार्क एवेन्यू, आरमानी, केल्विन क्लेन आदि.. कुछ ऐसे नाम सुनकर ज्ञानवर्धन हो जाता है।  

शाम को सभी काम से लौटते हैं। अब लिफ्ट की आबोहवा कुछ और तरह की होती है। महिलाएं सुबह की उनके वस्त्रों में बची -कुची खुशबू में रसोई के लिए लाती फल, सब्जियों और परेशानियों की महक ओढ़ लेती हैं। ' घर पर क्या हो रहा होगा? क्या खाना बनेगा? चुन्नू -मुन्नू , उनके बापू, अम्मा , काम वाली...' उनकी जान को टोकरा भर परेशानियां। उनकी दुखी शक्ल देख कर पूछने पर मुझे अक्सर यही जवाब मिलते हैं। " क्या बताऊँ मिसिस शर्मा....ज़िंदगी... " 

थके -हारे से भद्र पुरुष टाइप पुरुष भी यदा -कदा कोई बाजार के सामान का थैला ले कर आते हैं। किन्तु उनके वस्त्रों से सुबह की सारी महक उड़ चुकी होती है। बस पसीने की बू रह -रह कर लिफ्ट ही हवा में उनकी उपस्थिति का बोध कराती रहती है। इसलिए शाम को तो लिफ्ट को हर हाल में एक बिग नो... 

बहरहाल, बालिकाएं और बालक शाम तक भी महकते हैं। कैसे ? " वो हमारे पर्स में, बैग में, गाड़ी में स्प्रे रखे होते हैं। यू नो..थ्री -फोर आवर्स के बाद फिर से स्प्रे करके फ्रेशन अप करते रहना चाहिए।" राज की बात...

सभी महकते -चहकते रहें... दुआ... 


Thursday, March 2, 2017

ज़िन्दगी कैसी है पहेली



' रिल्के के प्रतिनिधि पत्र ' पढ़ते हुए अद्भुत आनंद में हूँ।  सोच रही हूँ - पहले मित्रों को, जानकारों को, स्नेहिल लोगों को, शुभचिंतकों को पत्र लिखते थे। उन्हें संजोते थे, उनकी खुशबू से मदमाते थे, उन्हें बार -बार पढ़ते हुए भाव विह्वल होते थे। उन पत्रों से विशेष लगाव होता था। 

अब आजकल पत्र कौन लिखता है ? फिर ? कल कैसा होगा ? यादों के खजाने में क्या कीमती होगा ? 

जीवन तुम क्या -क्या रंग दिखाओगे ? कहाँ ले जाओगे ? कहीं कोई ठहराव होगा क्या ? या रब सब तरफ सुकून बरसा !!


Monday, February 20, 2017

जाने कहाँ गए वो दिन


मुझे ताज़्ज़ुब होता है 
कि बात क्या थी
हालात क्या थे 
फ़िक्र क्या थी 
हौसले क्या थे 
उम्र क्या थी 
ज़ज़्बात क्या थे 
बहरहाल जो भी था 
बालपन की सुबह थी 
यौवन के दिन थे 
अलसाई सी शामें थीं और 
अलमस्त सी रातें 
वो उम्र भी क्या उम्र थी 
वो स्कूल के दिन
वो कॉलेज के दिन 
ठहाकों कहकहो के दिन 
कसकती मदहोशी के दिन 
मुझे ताज़्ज़ुब होता है 
आखिर वे दिन गए तो गए कहाँ 
 



Wednesday, February 8, 2017

एक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुँचती है


"कभी लगता है इंसान की खानाबदोश फितरत ही अच्छी थी। शानदार, जीवंत। हर सुबह नयी, हर शाम नयी। नया देखते रहो, नया सीखते रहो "

"नॉट एट ऑल, बिलकुल भी नहीं। एक जगह टिक कर अपनी आने वाली पीढी के बेहतर भविष्य के लिए सुख -सुविधाएँ जोड़ने में कोई बुराई नहीं है "

" बुराई ही तो है.. इन्ही भौतिक सुख -सुविधाओं को जोड़ने में उम्र तमाम हो जाती है। हमारे न रहने पर क्या होगा ? कैसे होगा का भाव हमेशा माथे पर सिलवटें बुनता रहता है। खामख्वाह की व्यस्तता और चिंताएं बोनस में " 

" तो ?? सभी करते हैं, करनी भी चाहिए। " 

"नहीं करनी चहिये। बिलकुल नहीं.. इस आसक्ति से मुक्ति मिल सकती है बशर्ते हम किसी एक जगह पर जमे न रह जाएँ। "

" बेकार की बात। अपनी जड़ें होनी ही चाहिए। तुम अजीज क्यों नहीं आती हो ऐसी बेवकूफी भरी वाहियात बातों से ?"

"अरे..बात समझो। फिर पीछे क्या छूट जायेगा ? उन सुविधाओं को कौन बरतेगा ? कैसे ? जैसे भावों से मुक्ति मिल जाएगी। क्या मस्त स्वछन्द जिंदगी होगी....नहीं क्या ? "

"ख़ाक होगा। पागलों के सर पर सींग थोड़े ही होते हैं। तुम्हारे जैसे लोग ही होते हैं- पागल। कतई पागल....."

"मुझे ये संबोधन मंज़ूर है लेकिन मैं अपने भाव नहीं बदल सकती। कतई नहीं...." 


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