Friday, December 2, 2016

हँसता हुआ जो जाएगा, वो मुकद्दर का सिकंदर जान ऐ मन कहलायेगा


सारे टी वी एंकर्स , प्रिंट मीडिया नोटबंदी को लेकर हलकान हुए जा रहे है। कहाँ कितनी लंबी लाइन लगी 
है? कहाँ कौन दुखी है, कौन गश खा कर गिर गया, कौन हार्ट अटेक से परलोक सिधार गया, कौन अम्मा भूखी रह गयी कौन बाबा दुःख से पगलाया हुआ है...किसका ब्याह रुक गया, नहीं रुका नहीं। किसके ब्याह में नोटबंदी से अड़चन आ गयी? या रब बेकार बातें,कबाड़ बातें। रोज़ वही मिच -मिच। रोज़ वही टॉपिक। सभी दुखियारों का इन मीडिया वालों से जबरदस्त कॉन्ट्रैक्ट है। तभी तो इनकी माइक्रस्कोपी आँखों को ये सब दिखता रहता हैं। किसी एक के मुंह में माइक लगा कर कुछ सुनवा देते हैं। फिर हमसे उम्मीद - लो जी सारे देश का नक्शा यही है। 

"बेकार लोग हो तुम सच्ची। उन गरीबों से पूछना था अपार्ट नोटबंदी क्या उनका जीवन सुख की सेज है ? क्या कभी किसी को इसके अलावा कोई तकलीफ नहीं हुयी ? ब्याह शादियों में रिश्तेदारों की ऊंची नाक और दहेज़ का भूत कभी आड़े नहीं आया ? अस्पताल, रेल, बस, स्कूल, कालेज, मेट्रो, सड़कों के जाम में खड़ी गाड़ियां....दफ्तर....कहाँ नहीं है लाइन?" मैंने उन दुखियारे और बेचारे से दीखते पत्रकार महोदय से कह ही दिया।  

"इनफैक्ट आप समझ नहीं पा रहीं हैं। देखिये....." वे भवों में और गहरे बल डालते हुए बोले । 

"अभी कुछ नहीं देखना। शाम को टी वी पर दिखाना। मेरे गांव में नए बच्चे का नामकरण ग्यारहवे दिन होता है। इस मुद्दे पर आपसे दो महीने बाद बात करूँगी, ठीक ? तब तक चिल करो। ये लो च्वींगम खाओ और मेरी तरह दिन भर जुगाली करो।" 

"पक्का मिलिएगा। " वो जुगाली करते हुए एक मस्त हंसी हंस दिए। 

अब उन महाशय से दो महीने बाद पक्का मिलूंगी। आखिर वादा किया है भाई और वादाखिलाफी मैं करती नहीं। 

हमें नहीं दीखते ये दुखियारे लोग. उल्टा लंबी लाइन पर लगे हुए लोग भी -"मोदी ने कर तो बढ़िया ही दिया है। " कहने वाले ही मिल जातें हैं। लगता है आँखे टेस्ट करवाने का सही समय आ गया है मेरा तो... 

अंततः 

सारी दुनिया एक तरफ और हमारे वाट्सएप वाले एक तरफ। कोई भी नया मुद्दा उठना चाहिए बस सब जुट जातें हैं जोक्स बनाने और हंसी ठहाके लगवाने में। ग़ज़्ज़ब की क्रिएटिविटी है हमारे देश में। ये सीरियस दीखते हुए बुद्धिजीवी होने का ढोंग नहीं करते। मुझे तो अपनी इस होनहार, मज़ेदार पीढी पर खूब प्यार आता है। जब जीना ही है तो खुश रह कर जीना चाहिए..है न..बाकी जीने के सबके अपने तरीके...तेरी दुनिया से होके मज़बूर चला....गीत तो ये भी खूबसूरत ही है।   
 


Monday, November 28, 2016

तुझको चलना होगा


 कुछ तो बोल। हम पिछले घंटे भर से एकदम चुप बैठे हैं। बॉय द वे , तू सोच क्या रही है ?

हम क्यों नहीं बहते इस झरने की तरह ?

क्योंकि हम इतने सरल नहीं होते। न जाने कहाँ -कहाँ की सोचों में दिमाग घुमाते रहते हैं। वो क्या कह रहा होगा ? लोग क्या कहेंगे ? समाज क्या सोचेगा ? क्या इज़्ज़त रह जाएगी...? हद है।

ह्म्म्म,  और यही सब सोच कर हम अपना आज खराब कर देते हैं।

हाँ बिलकुल ऐसा ही है।

अच्छा सुन जब तूने अपने ऑफिस में अपने दोस्तों को मेरे बारे में बताया तो उन्होंने क्या कहा था ? क्या सोच रहे थे वे मेरे बारे में ? उन्होंने क्या....

........

बता न... मैं कितनी टेन्स हूँ।  मुझे रात भर अच्छे से नींद भी नहीं आयी। बोल्ड लड़कियों की इमेज अच्छी नहीं होती न ? क्या कहा था उन्होंने ? बोल ना... क्या सोच रहे होंगे वे मेरे बारे में ?

तेरा सर सोच रहे होंगे, तुम झरने सी कब बनोगी ?





Tuesday, November 15, 2016

चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है


कल आकाश ज़्यादा स्याह था या चाँद ज़्यादा श्वेत 
अपने अपने रूप से गर्वित दोनों प्रसन्न थे 
अपनी गहराइयों और खामोशी के साथ 
आकाश महोब्बत से सराबोर 
चाँद इश्क़ में गरिफ्तार 
पूरक एक दूसरे के 
आकंठ डूबे प्रेम में 
तुझ बिन मैं क्या 
मुझ बिन तू क्या 
यही है उनकी कविता का स्वर 
उनकी कथा का कथानक 
दुनिया को भूल कर 
एक दूजे के पहलू में समाये 
मदहोश दीवानों से 
दुनिया ने जी भर सराहा 
इश्क़ और महोब्बत की 
इस अनूठी दास्तां को 
उस स्याह आकाश को 
उस संदली चाँद को 
जो जानतें हैं महोब्बत करना 
वर्षों से खामोश रह कर 

Monday, October 24, 2016

बचपन के दिन भी क्या दिन थे



बचपन की यादों से
न जाने क्या हो जाता है 
कुछ खोया पाया लगता है 
मन उलझा सुलझा रहता है 
हम लिखने लगते हैं नज़्में 
और जीने लगते हैं उनको 
उन नज़्मों में होती है 
अनगिनत अनकही बातें 
कुछ लम्हे खुशी के 
कुछ दुख की सौगातें 
कुछ किरचें यादों की लेकर  
खामोश सफर तय करते हैं 
भावों की खेती करते हैं
रिश्तों के फूल खिलाते हैं  
यादों की भीनी खुशबू से 
सपनो में रंग भरते हैं  
कुछ इत्र के बादल उठते हैं 
कुछ प्रेम लिपटता जाता है 
हम ख्वाब सजाने लगते हैं  
ये किससे कैसा नाता है 
कागज़ पर रख कर यादों को  
संसार बसाने लगते हैँ 
अनुभव के पक्के रंगों से 
जीवन को लिखने लगते हैं 
फिर से एक बार पलट कर 
बचपन को जीने लगते हैं 

Monday, October 3, 2016

ये किसने गीत छेड़ा


कितना मुश्किल हो रहा है आजकल कुछ भी लिख पाना। न शब्द हैं, न भाव और ना ही संवेदनाएं, हमेशा से अति प्रिय लगने वाला एकांत अच्छा नहीं लग रहा है। कुछ बेआवाज बातें और यादें बनी रहतीं हैं, मेरे इर्द -गिर्द...अज़ीब है सब...या रब ये कशमकश और उलझन का कैसा दौर है। 

लगता है समय आ गया है। दिल्ली से बाहर कहीं घूम आऊं। अपने पहाड़ों की तरफ। मेरे पहाड़, मेरे झरने, मेरी नदियां और मेरे अहसास। वहां की वादियों में मचलती ठंडी, शीतल हवाएं, चिड़ियों की चह चह से सजी खुशनुमा सुबह, हिमाच्छादित पर्वतों पर, टुकड़ों में बिखरी हुयी स्वर्णिम धूप और अब शरद ऋतु को आमंत्रित करता हुआ मौसम। 

सब यादों में है। बेइंतहा दिलफरेब यादें। वो जंगल की तरफ खुलती मेरे कमरे की खिड़की। उससे झांकता सुर्ख लाल बुरांश के फूलों से लदा हुआ पेड़। आंगन में नन्ही गिलहरियों की उछल -कूद , बगीचे में चिड़ियों का चिचियाता शोर, फूलों की मह -मह खुश्बू और रात को उसी खिड़की से झांकता हुआ चाँद। सब कुछ मनभावन। इससे सुंदर भला और क्या होगा। 

आती हूँ मेरे प्रिय पहाड़ों तुम्हारे गीत सुनने। तुम्हारा सानिध्य मुझे सुकून देता है, स्नेह देता है और प्रेम से भर देता है। तब सारी कायनात मुझे बेहद खूबसूरत लगने लगती है। नयी ऊर्जा और हौसलों से भर देती है... 


Sunday, September 18, 2016

खामोश सा अफ़साना


कभी -कभी बेहद अनिश्तिता की स्तिथी बन जाती है। कभी लगता है खूब बोलना -बतियाना चाहिए। पूर्वतः भीड़ में शिरकत करते हुए लोगों से मिलना जुलना, गोष्ठियाँ, थियेटर, फिल्म, आवारगी आदि सभी कुछ बिंदास करना। मित्रों, रिश्तेदारों के बुलावों और आमन्त्रण को स्वीकार करते हुए देर शाम घर पहुंचना। वो भी ठीक ही था। सोचकर उत्त्साहित भी हो जाती हूँ। 

फिर अगले पल विचार बदलते देर नहीं लगती। क्यों करना चाहिए ये सब ? ऐसा करके क्या तो निराला हुआ और अब क्या निराला होगा ? चुपचाप शांति से जीवन जीने में भी कोई बुराई नहीं लगती। घर - बाहर के अपने रोज के काम करना। फ्री होते ही फिर मन और दिल की करना। इससे बढ़ कर कोई आनंद नहीं। 

ज्यादा मिचमिच और चकर -चकर किये बगैर भी बढ़िया चल रहा है। वक्त वैसे ही काम पड़ा रहता है फिर काहे के झमेले पालना। शायद इसी को आनुवांशिकता कहते होंगे। मेरी अति अल्पभाषी माँ महीने के तीस दिन में मुश्किल से तीस वाक्य बोलतीं होंगी। सोचती हूँ इससे उनका क्या बिगड़ा ? लोग उन्हें खूब चाहते हैं, खूब आदर -मान देते हैं। मुझे मेरी माँ दुनिया की सबसे खूबसूरत, सबसे सुखी और सुकून से भरी हुयी लगतीं हैं। हर परिस्थिती में मुस्काती हुयी। उन्हें ज़िंदगी से न कभी कोई शिकायत थी, न होगी। उनसे अक्सर कह देतीं हूँ। 

"माँ यार आई लव यू...खूब.....एंड मिस यू.... खूब। " इसके एवज में माँ मेरा हाथ थाम कर अपनी मासूम और प्यारी सी मुस्कान थमा देतीं हैं। हम सभी से स्नेह तो वे भी बेइंतहा करतीं हैं बस ऐसा कुछ कहतीं नहीं हैं। 

"अपने शब्दों को बचा के रखने का तुम्हारा शौक बहुत पुराना है, जानती हूँ यार माँ..."


Tuesday, August 16, 2016

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना ( Sharmila Chanu Irom )


'उनके लोग उन्हें स्वीकार नहीं कर रहे हैं..' अखबार में खबर की हेडलाइन्स थी। कौन हैं वे लोग? जिन्हें शर्मीला इरोम के 'लोग' कहा गया ? 

इरोम की आज की स्तिथी को देखते हुए कई ऐसे सवाल दिमाग में तैरने लगे जिनका न सिरा न अंत। प्रतीक बन कर रह जाना शायद उन्हें अब मंजूर नहीं। उन्होंने क्या सोच कर उपवास शुरू किया होगा और अंत में हुआ क्या? कोई भी काम यदि 'बाई चॉइस शुरू करो तो क्या अंजाम ऐसा होता है ? गाईड फिल्म का नायक, सन्यासी राजू याद आने लगा। मन में उठते सवालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है।

क्या इरोम ने तब सोचा होगा उनकी इस तपस्या का यह सिला मिलेगा ? ये संकल्प स्वइच्छा से शुरू किया गया था जिसमें उनके निजी स्वार्थ की गुंजायश तक नहीं। फिर ? 

अपनी सारी जवानी की आहुति अस्पताल के बंद कमरे में होम करके अट्ठाइस वर्ष की शर्मीला चौवालीस वर्ष की इरोम बन गईं। क्या सोलह वर्ष तक निराहार रह कर उन्हें बेहद आनंद की प्राप्ति हुयी होगी ? कुछ परमानंद टाईप की ?

अपना उपवास तोड़कर यदि उन्होंने खुले आकाश के नीचे से अपनी ( AFSPA ) अहिंसात्मक लड़ाई ज़ारी रखने की सोची तो इसमें गलत क्या हो गया ? विरोध के स्वर क्यों उठे ? मजबूत इरादों वाली इरोम ने जब शुरू करते समय किसी से नहीं पूछा तो अब क्यों पूछना था ? वे नाराज होने वाले लोग कहाँ से प्रकट हो गए ? सोलह वर्ष उन्होंने जो किया वो सामने है अब जो भी करेंगी वो भी करने दो। गलत कुछ नहीं किया। फिर पहले से ही विरोध क्यों ? यदि वे खुले आकाश के नीचे विचरते हुए या कोई अन्य रास्ता अपनाते हुए अपने मकसद को पूरा करने का प्रयास करना चाहतीं हैं तो इसमें उनके सो कॉल्ड लोगों को परेशानी क्या है ? 

अपने इन तमाम वर्षों के दौरान 'राजू गाईड' की तरह वे शहीद हो जातीं तो क्या होता? वे पुण्यात्मा कहलातीं ? उनका नाम अमर हो जाता? देश -विदेश के सारे अखबार उनके इस बलिदान से उनकी चर्चा और प्रशंसा से भरे होते ? उनकी प्रतिमाएं लगतीं, स्कूल- कॉलेजों के पाठ्यक्रम में पढाईं जातीं ? कितने ही उच्च पुरस्कारों की झड़ी लग जाती ?  

इस देश में इंसान की कदर मरणोपरांत है। हमने जिन महान लोगों को उनके बुलंदियों और गुमनामी के दौर में देखा भी नहीं होता है उनके बारे में जानते तक नहीं थे। इस संसार से जाते ही उन्हें जानने लागतें हैं। उनके लिए गुमनामी, कष्टों और अभावों से भरा जीवन जीने से अच्छा मरना लाजवाब होता है....या मरना ही यादगार हो जाता है। रोबिन शर्मा ने कहा - 'Who will cry when you die ' ये चाहे किसी भी सन्दर्भ में कहा हो किन्तु इसका लिट्रल अर्थ लेते हैं तो ?

इरोम मात्र एक बूंद शहद से अपना सोलह वर्षीय लंबा उपवास तोड़ते हुए संवेदित हो गईं, भावुक हो गई। उस वक्त उनके दिमाग में क्या विचार आया होगा? या फिर वे इंतज़ार में थीं कि ये सब उनकी माँ के स्नेहिल हाथों से होगा ? उस वक्त वहां पर माँ क्यों नहीं थीं ? वहां पर एक अजीब सा शोर करता सन्नाटा क्यों पसरा हुआ था? बहरहाल... 

क्या प्रेम बीच में आते ही जीवन का गणित सब गड़बड़ा जाता है ? बैजू -बावरा, हीर -राँझा, रोमियो -जूलियट, डेस्डिमोना आदि किसी भी प्रसंग को देखें। कुछ और पीछे जाएँ तो राधा, मीरा आदि को देखें। तो साबित हुआ। प्रेम = दुःख, व्यथा, त्याग, लांछन, बलिदान, अवहेलना, बैर, धोखा, हत्याएं, फरेब....ऐसा?? तभी कहा गया होगा। ' फॉल इन लव'। यदि प्रेम में ये सब भाव नहीं होते तो प्रेम दिव्यानुभूति होता, भरोसा, सकारात्मकता, मधुर अहसास से लबरेज़ होता। तब उसे 'राइज इन लव' कह देते। नहीं क्या ? 

विरोध में उठी आवाजों से कहना था - सोलह वर्ष तक जो अहिंसात्मक क्रांति की मशाल इरोम ने जलाए रखी आगे अब तुम संभाल लो। सोलह वर्ष न सही सोलह दिन...सोलह सप्ताह...कुछ समय तुम भी कर लो। कोई नहीं आयेगा, आखिर कष्ट किसे पसंद? सब इरोम करे, वे सिर्फ बातें बनायें? सारे निराशावादी, अहमक, बुड़बक लोग। और वो क्या कहतें हैं, विदूषक और चिरकुट भी...बेकार टाइप के लोग..... 

उनकी लिखी कविता की चंद पंक्तियाँ। 

मैं अमन की खुशबू फैलाऊंगी / अपनी जन्मभूमि में / जो आने वाले किसी समय में / फैल जाएगी समूची पृथ्वी पर 



 









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