Tuesday, July 16, 2019

कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे

' ये क्या लिख भेजा ?'

' आपने क्या माँगा था?' 

'यात्रा वृत्तांत के लिए कहा था।'

'हम्म '

' हम्म नहीं। यात्रा वृत्तांत भेजिए।'

' इस बार कहानी चला लीजिए।'

'बिलकुल नहीं।'

'लेकिन सभी के जीवन में हर दिन जो एक नई कहानी खुद ब खुद बन जाती है। उसका क्या। '

'बेकार बातें न करें। यात्रा वृत्तांत भेजिए ,मैं कोम्प्रोमाईज़ नहीं करता।'

'औरत करती है हरदम, कोम्प्रोमाईज़, समझौता। औरत का जीवन, बाहर -भीतर सब तरफ कोम्प्रोमाईज़।'

'फिर शुरू। वही बेढंगा राग। वही फ़लसफ़ा, हुंह। ठीक है इस बार कोम्प्रोमाईज़ करता हूँ। कहानी ठीक है। '

'हम्म...' 



Wednesday, July 10, 2019

इस जीवन का यही है रंग रूप


कई बार हम चाहते कुछ और हैं, हो कुछ और जाता है। मैं जाना कहीं और चाहती हूँ पहुँच कहीं और जाती हूँ। लिखना कुछ चाहती हूँ लिख कुछ और जाती हूँ। खूब बोलना चाहती हूँ और खामोश रह जाती हूँ। जब खामोश रहना चाहती हूँ तब बेवजह बकबका देती हूँ। सामाजिक हलचलों में शिरकत करना चाहती हूँ तब उदासीनता की कई वजहें खुद ब  खुद  बन जातीं हैं। दुनियादारी से दूर रहना चाहती हूँ और खूब सामाजिक कार्यों में उलझ जाती हूँ। पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ और ये ऊपरवाला क्या करवा लेता है मुझसे। होता सब अच्छा ही है फिर भी - या रब! जैसा मैं चाहती हूँ वैसा कब होगा?


Thursday, May 23, 2019

हमराह- ए- सफ़र, मन्नू भंडारी

" लेखन एक अनवरत यात्रा है - जिसका न कोई अंत है न मंज़िल "

आत्मकथ्य बेहद दुरूह कार्य है और हर मुश्किल कार्य रोमांचित करता है, आकर्षित करता है। इसीलिये शायद मेरे पुस्तक संसार को आत्मकथाओं ने समृद्ध कर रखा है। कोई भी व्यक्ति अपने जीवन काल में किन अच्छे -बुरे अनुभवों से गुजरा, कहाँ पर टूटा, कहाँ बिखरा और कैसे अपने आप को समेटता हुआ जीवन पथ पर अग्रसर हुआ मुझे बेहद रोमांचित करता है। 

व्यक्ति अच्छे पलों में तटस्थ रह सकें और विपरीत क्षणों में संजीदा यह भी आना चाहिए। हालातों से ज्यादा प्रभावित हुए बगैर उन के साथ सामंजस्य बैठाते हुए चलना कलाकारी है जो हर किसी में नहीं होती। 

निपट एकांत और अकेलेपन में आत्मकथा पढ़ते हुए लगता है मानो आप उस व्यक्ति विशेष के हमराह हों, उसके हर पल के साथी। कभी अपनों के साथ कभी अपने आप के साथ रहना बहुधा परमानंद का सुख देता है। वही सुख जिस की तलाश में कस्तूरी मृग भटकता रहता है। 

Wednesday, April 24, 2019

'संस्कार वैभव ' अप्रैल माह - 2019 की गोष्ठी से

पंजीकृत सांस्कृतिक समिति 'संस्कार' - 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, निष्काम सेवी सम्मान' आदि से सम्मानित डॉ हेम भटनागर जी के द्वारा 1981 में संस्थापित की गई। 'संस्कार' हिन्दी का प्रचार - प्रसार कर भाषा और संस्कारों को समृद्ध करने और बचाये रखने में अपना अतुलित योगदान देने के लिए हरदम प्रयासरत रहता है।   
 आज बतौर मुख्य अतिथि 'संस्कार वैभव' की गोष्ठी में शिरकत करने का अवसर प्राप्त हुआ।
 वरिष्ठ साहित्यकार एवं 'काव्य किरण सम्मान', 'संगच्छध्वं हिंदी सम्मान' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित सुश्री मीना जैन जी की अध्यक्ष्यता में खूब उम्दा हास्य -व्यंग का आनंद लिया। 
 सर्वप्रथम दीप प्रज्ज्वलित कर इंद्रधनुषी परिधानों में सजी -संवरी सभी सदस्यों ने सरस्वती वन्दना से शुभारम्भ किया। मधुर गीत -संगीत, शानदार रचनाओं व कुशल संचालन द्वारा गोष्ठी अत्यंत सफल रही।
मीना जैन जी के अथक व सतत प्रयासों से 'संस्कार वैभव' नौ वर्षों से निरंतर प्रगतिशील है। अंत में लज़ीज़ भोजन व मेल -मिलाप करते हुए अगले माह की गोष्ठी तक के लिए सभी ने विदा ली। 

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