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Saturday, September 6, 2025

Tuesday, August 5, 2025

विपाशा में प्रकाशित कहानी - उम्र की थकान

हिमाचल की साहित्य, संस्कृति एवं कला की द्वैमासिक पत्रिका 'विपाशा' में प्रकाशित कहानी - उम्र की थकान

 ( संपादक - वरिष्ठ साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ठ जी )


Friday, September 27, 2019

जाह्नवी पारिवारिक मासिक पत्रिका के 'राष्ट्रभाषा विशेषांक' ( सितम्बर 2019 ) में प्रकाशित मेरी कहानी - पालकी का कहार 

प्रेम जितना दिव्य और सरल होता है उसका मार्ग उतना ही कठिन और कष्टपूर्ण क्यों है?  अनगिनत सवालों के कठघरे में खड़ा प्रेम,,,

जाह्नवी मासिक 
सम्पादक एवं प्रकाशक - श्री भारत भूषण चड्ढा 
9891788245 , 25845818 
नई दिल्ली 

Wednesday, December 12, 2018

उत्तरांचल पत्रिका, दिसम्बर 2018 में प्रकाशित मेरी कहानी - माया महा ठगनी

उत्तराखण्ड की सशक्त अभिव्यक्ति , दो दशक से निर्बाध रूप से प्रकाशित पत्रिका  




संपादकीय कार्यालय : 
श्री आकाश जोशी 
RZ - 701 / A , स्ट्रीट 4 , 
मेन सागरपुर, कैलाशपुरी रोड,
नई दिल्ली  - 110046 
मोब - 8826129105 

Wednesday, April 25, 2018

हिन्दी अकादमी की मासिक पत्रिका - इंद्रप्रस्थ भारती (मार्च 2018 ) में प्रकाशित मेरी  कहानी - मुख़्तसर सी बात

'साहित्य कोई खेल नहीं' में मैत्रेयी पुष्पा जी की कलम से निकले शब्द - अपनी ही पीड़ाओं से बंधे आज के अविश्वासी लेखन संसार में खुद को साधे रखना मामूली बात नहीं है।

 ' प्रेम अनुभूति और अहसास है। प्रेम परमानंद है तो मीठा दर्द भी है।प्रेम तो आत्मा का आत्मा से और दिल से दिल का संगम का दिव्य अहसास है.'  (डॉ जीतराम भट्ट)


Thursday, April 12, 2018

उदयपुर से प्रकाशित, त्रैमासिक पत्रिका - अभिनव सम्बोधन ( जनवरी -मार्च २०१८ ) में प्रकाशित मेरी कहानी - 'धुंध भरे रास्ते'

सम्पादक - क़मर मेवाड़ी जी 
मेवाड़ी जी उन चंद आदरणीय सम्पादकों में हैं जो कहानी देख कर निर्णय लेते हैं न कि कहानी भेजने वाले के परिचय के आधार पर। अक्टूबर २०१५ - जनवरी २०१६ की सम्बोधन पत्रिका का जब स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर प्रकाशित -प्रेम कथा अंक आया था। तब मैंने फेस बुक पर लगी पोस्ट के आधार पर उन्हें अपनी एक प्रेम कथा 'सरल समर्पण' यूँ ही भेज दी थी। अद्भुत आश्चर्य तब हुआ जब उनका सिर्फ एक वाक्य कहता हुआ फोन आया। " बहुत शानदार कहानी है। संग्रह में ले रहा हूँ। लिखती रहें।" कहानी उन्हें बेहद पसंद आयी थी। उस वक्त मैं ढेरों आश्चर्य से भर गई थी। सोचा इतने वरिष्ठ साहित्यकार, इतनी ईमानदारी और इतनी विनम्रता। उस कहानी के बाबत मेरे पास खूब मेल, टेक्स्ट और फ़ोन भी आए थे। आज विरले ही हैं जो किसी को सराहते हैं और उनके आगे बढ़ने पर प्रसन्न होते हैं? साहित्य की दुनिया में यदि आदरणीय क़मर मेवाड़ी जी जैसे अग्रज हों तो नवोदयों का मार्ग प्रशस्त होता रहेगा, हौसला बना रहेगा और कलम चलती रहेगी। मेवाड़ी जी आपको मेरा नमन। 



Friday, October 20, 2017

पत्रिका ' अहा ज़िंदगी ' ( अक्टूबर 2017 - उत्सव अंक ) में प्रकाशित मेरी कहानी - गलीच जिंदगी

पानी की आवाज़ न आई उसका दिल भी खाली था..
( संपादक - श्री आलोक श्रीवास्तव ) 


Monday, February 8, 2016

'आरती' मासिक पत्रिका के दीपावली विशेषांक 2015 में प्रकाशित मेरी कहानी 'सर्पदंश ' का मराठी अनुवाद



​कथाबिंब पत्रिका में प्रकाशित मेरी कहानी - सर्पदंश' का मराठी अनुवाद किया था वरिष्ठ उपन्यासकारा मीनाक्षी सरदेसाई जी ने। मीनाक्षी जी का दिल से शुक्रिया। उनका एक टेक्स्ट मिला - और जिन्हें मराठी आती हो वे पढ़ लें मुझे तो बस ये ' रिया ताई' पढ़ना बड़ा अच्छा लगा। 

मिनाक्षी ताई आपण 'आरती मासिक' दिपावली अंकात अनुवाद केलेली  "रिया ताईंची"  "सर्पदंश" कथा खुप आवडली, स्री मनातील घुसमट , तीच्या मनातील व्यथा . स्रियांचे भावविश्व उलगडून दाखविण्यात। रिया ताई नि तुम्ही व तुमची कथा यशस्वी ठरली आहे. ताई आपल्या दोघींच्या पुढील वाटचालीस मन:पुर्वक शुभेच्या!






Friday, November 27, 2015

मेरी कहानी 'लाल चूड़ियों का सच' - जागरूकता मेल पर


कहानी 'लाल चूड़ियों का सच' पढ़ें - http://www.jagruktamail.com/e-paper.html       पृष्ठ दस पर। 
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Wednesday, March 25, 2015

राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती के (दिसंबर -जनवरी 2015 अंक में ) प्रकाशित मेरी कहानी - हस्ताक्षर होने तक



कहानी - हस्ताक्षर होने तक  ( राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती के अंक दिसंबर -जनवरी २०१५ में प्रकाशित )   

Thursday, March 12, 2015

आधारशिला पत्रिका के फरवरी अंक २०१५ में प्रकाशित मेरी कहानी - निर्वासिता

सम्पादक  - डॉ  दिवाकर भट्ट 


उसका पति फ़ौजी मदन सिंह जब भी छुट्टियों में घर आता, उसके लिए हमेशा मिठाई, किनारी वाली धोती और इंगूर लाता था। सांवली रंगत वाली, बुरांश के फूल सी खिली हुई, पहाड़ी झरने सी उछश्रृंखल और सुतवाँ नाक वाली खूबसूरत मोहिनी जब अपने तेल से भीगे काले बालों की लम्बी चोटी बनाती और मांग में मदन का लाया हुआ लाल इंगूर लगाती, टिकुली लगाती तो गाँव की सभी औरतों को उसके भाग से रश्क होने लगता। वे चुहल करती हुई कहती। "बड़ी भगवान् है रे माहि तू जो तुझे इतना प्यार करने वाला आदमी और इतने अच्छे घरवाले मिले ठहरे।" ..........



Sunday, January 25, 2015

जनसत्ता 2014 के वार्षिक अंक में प्रकाशित मेरी कहानी 'रहमत चूड़ीवाला'



रहमत के पास चूड़ियाँ पहनाने का हुनर कमाल का था। हाथों की कौन सी हड्डी और कौन से जोड़ पर कितना दबाव डालना है, उसे खूब आता था। मुलायम,-खुरदुरे, बड़े - छोटे, मोटे- पतले हर हाथ पर ऐसी नफासत से चूड़ियाँ फिट बैठा देता कि देखने वाले दंग रह जाते थे। हैरान होते थे कि इतनी छोटी माप की चूड़ियां आखिर उसने उनके हाथों में चढ़ाई किस तरह? उन्हें चढ़ाते वक्त मजाल उससे एक भी चूड़ी मैोल जाए। किसी का हड्डियों वाला सख्त हाथ देखता था तो दबता और जांच करता हुआ मश्वरा दे डालता था। ........

Saturday, October 4, 2014

कथाबिंब पत्रिका के (जुलाई -सितम्बर 2014 ) अंक में प्रकाशित मेरी कहानी- 'सर्पदंश'

सम्पादक - डॉ अरविंद 



राधिका से क्या चाहता था विराज?

विराज से क्या चाहती थी राधिका?

क्या था राधिका के मन के भीतर जिसे विराज कभी समझ ही नहीं सका?

क्या जीवन हमेशा ही इतना उलझा हुआ होता है...? 

 पढ़ने के लिए यहाँ - 

http://issuu.com/kathabimb/docs/2014_3qfull/1?e=3010945/9538819