कहानी - ये कैसी थकन / संपादक - अरविंद कुमारसंभव
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Thursday, October 2, 2025
Saturday, September 6, 2025
Tuesday, August 5, 2025
विपाशा में प्रकाशित कहानी - उम्र की थकान
हिमाचल की साहित्य, संस्कृति एवं कला की द्वैमासिक पत्रिका 'विपाशा' में प्रकाशित कहानी - उम्र की थकान
( संपादक - वरिष्ठ साहित्यकार सुदर्शन वशिष्ठ जी )
Friday, September 27, 2019
Sunday, September 22, 2019
Friday, April 19, 2019
Wednesday, December 12, 2018
Wednesday, April 25, 2018
हिन्दी अकादमी की मासिक पत्रिका - इंद्रप्रस्थ भारती (मार्च 2018 ) में प्रकाशित मेरी कहानी - मुख़्तसर सी बात
'साहित्य कोई खेल नहीं' में मैत्रेयी पुष्पा जी की कलम से निकले शब्द - अपनी ही पीड़ाओं से बंधे आज के अविश्वासी लेखन संसार में खुद को साधे रखना मामूली बात नहीं है।
' प्रेम अनुभूति और अहसास है। प्रेम परमानंद है तो मीठा दर्द भी है।प्रेम तो आत्मा का आत्मा से और दिल से दिल का संगम का दिव्य अहसास है.' (डॉ जीतराम भट्ट)
Thursday, April 12, 2018
उदयपुर से प्रकाशित, त्रैमासिक पत्रिका - अभिनव सम्बोधन ( जनवरी -मार्च २०१८ ) में प्रकाशित मेरी कहानी - 'धुंध भरे रास्ते'
सम्पादक - क़मर मेवाड़ी जी
मेवाड़ी जी उन चंद आदरणीय सम्पादकों में हैं जो कहानी देख कर निर्णय लेते हैं न कि कहानी भेजने वाले के परिचय के आधार पर। अक्टूबर २०१५ - जनवरी २०१६ की सम्बोधन पत्रिका का जब स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर प्रकाशित -प्रेम कथा अंक आया था। तब मैंने फेस बुक पर लगी पोस्ट के आधार पर उन्हें अपनी एक प्रेम कथा 'सरल समर्पण' यूँ ही भेज दी थी। अद्भुत आश्चर्य तब हुआ जब उनका सिर्फ एक वाक्य कहता हुआ फोन आया। " बहुत शानदार कहानी है। संग्रह में ले रहा हूँ। लिखती रहें।" कहानी उन्हें बेहद पसंद आयी थी। उस वक्त मैं ढेरों आश्चर्य से भर गई थी। सोचा इतने वरिष्ठ साहित्यकार, इतनी ईमानदारी और इतनी विनम्रता। उस कहानी के बाबत मेरे पास खूब मेल, टेक्स्ट और फ़ोन भी आए थे। आज विरले ही हैं जो किसी को सराहते हैं और उनके आगे बढ़ने पर प्रसन्न होते हैं? साहित्य की दुनिया में यदि आदरणीय क़मर मेवाड़ी जी जैसे अग्रज हों तो नवोदयों का मार्ग प्रशस्त होता रहेगा, हौसला बना रहेगा और कलम चलती रहेगी। मेवाड़ी जी आपको मेरा नमन।
Friday, October 20, 2017
Thursday, August 4, 2016
Tuesday, February 23, 2016
Monday, February 8, 2016
'आरती' मासिक पत्रिका के दीपावली विशेषांक 2015 में प्रकाशित मेरी कहानी 'सर्पदंश ' का मराठी अनुवाद
कथाबिंब पत्रिका में प्रकाशित मेरी कहानी - सर्पदंश' का मराठी अनुवाद किया था वरिष्ठ उपन्यासकारा मीनाक्षी सरदेसाई जी ने। मीनाक्षी जी का दिल से शुक्रिया। उनका एक टेक्स्ट मिला - और जिन्हें मराठी आती हो वे पढ़ लें मुझे तो बस ये ' रिया ताई' पढ़ना बड़ा अच्छा लगा।
मिनाक्षी ताई आपण 'आरती मासिक' दिपावली अंकात अनुवाद केलेली "रिया ताईंची" "सर्पदंश" कथा खुप आवडली, स्री मनातील घुसमट , तीच्या मनातील व्यथा . स्रियांचे भावविश्व उलगडून दाखविण्यात। रिया ताई नि तुम्ही व तुमची कथा यशस्वी ठरली आहे. ताई आपल्या दोघींच्या पुढील वाटचालीस मन:पुर्वक शुभेच्या!
Friday, November 27, 2015
Monday, May 18, 2015
Wednesday, March 25, 2015
Thursday, March 12, 2015
आधारशिला पत्रिका के फरवरी अंक २०१५ में प्रकाशित मेरी कहानी - निर्वासिता
सम्पादक - डॉ दिवाकर भट्ट
उसका पति फ़ौजी मदन सिंह जब भी छुट्टियों में घर आता, उसके लिए
हमेशा मिठाई, किनारी वाली धोती और इंगूर लाता था। सांवली रंगत वाली, बुरांश के फूल
सी खिली हुई, पहाड़ी झरने सी उछश्रृंखल और सुतवाँ नाक वाली खूबसूरत मोहिनी जब अपने तेल
से भीगे काले बालों की लम्बी चोटी बनाती और मांग में मदन का लाया हुआ लाल इंगूर लगाती,
टिकुली लगाती तो गाँव की सभी औरतों को उसके भाग से रश्क होने लगता। वे चुहल करती हुई
कहती। "बड़ी भगवान् है रे माहि तू जो तुझे इतना प्यार करने वाला आदमी और इतने अच्छे
घरवाले मिले ठहरे।" ..........
Sunday, January 25, 2015
जनसत्ता 2014 के वार्षिक अंक में प्रकाशित मेरी कहानी 'रहमत चूड़ीवाला'
रहमत के पास चूड़ियाँ पहनाने का हुनर कमाल का था। हाथों की कौन सी हड्डी
और कौन से जोड़ पर कितना दबाव डालना है, उसे खूब आता था। मुलायम,-खुरदुरे, बड़े - छोटे,
मोटे- पतले हर हाथ पर ऐसी नफासत से चूड़ियाँ फिट बैठा देता कि देखने वाले दंग रह जाते
थे। हैरान होते थे कि इतनी छोटी माप की चूड़ियां आखिर उसने उनके हाथों
में चढ़ाई किस तरह? उन्हें चढ़ाते वक्त मजाल उससे एक भी चूड़ी मैोल जाए। किसी का हड्डियों
वाला सख्त हाथ देखता था तो दबता और जांच करता हुआ मश्वरा दे डालता था। ........
Saturday, October 4, 2014
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