Wednesday, March 25, 2015

कहानी अंश- हस्ताक्षर होने तक ( राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती के अंक दिसंबर -जनवरी २०१५ में प्रकाशित )



"हाँ तो माथुर जी आप कुछ कहना चाहेंगे?" 

मैं उस चुप्पे माथुर को एक मौक़ा और देना चाहती थी। परन्तु कुमार साहब को ये नागवार गुजर रहा था। यह मैं उनके चेहरे पर आते - जाते भावों को देख कर सब समझ रही थी। चुप्पा माथुर फिर भी कुछ नहीं बोला। बस इतना ही हुआ कि इस बार उन्होंने पहले से थोड़ी बड़ी मुस्कराहट दे दी। हार कर मुझे फिर से कुमार साहब का ही मुंह देखना पड़ता है। मन ही मन कहते हुए चलिए आप ही सुनाइए अपनी कहानी। वह बिना मौक़ा चूके फिर शुरू हो गए।


" मिसिस....."  वे मेरा नाम जानने की इच्छा से मेरी तरफ देखने लगे।

"सक्सेना…जी मुझे माया सक्सेना कहते हैं।" मैं मुस्कुरा दी।

"हाँ तो मिसिस माया, वो मैं बता रहा था कि इनके ऊपर एक कानूनी कार्यवाही चल रही है। बस उसी की वजह से ये बहुत परेशान चल रहें हैं। खाना -पीना, दोस्ती, रिश्ते सब छोड़ कर बस दिन भर यहां ऑफिस के अपने इस कमरे में कैद हो जाते हैं और घर जाने पर अपने घर के कमरे में। इन्हें मैं वही समझा रहा हूं। ज़िंदगी इस तरह थोड़े ही कटती है।"

"सही कह रहे हैं आप कुमार साहब। कोई रो के काट लेता है तो कोई हंस कर। सभी के अपने तरीके हैं। परन्तु रो कर काटने में मजेदारी नहीं है। क्या बेमतलब बिगड़ी हुई शक्लें लिए, मनहूसियत फैलाए घूमते रहो। दुनिया में और भी....." मैंने अपना जीवन ज्ञान बाँट लेना चाहा। जिसे जल्द ही उन्होंने फिर खारिज़ कर दिया।

कुछ लोगों में दूसरों को सुनने का धैर्य कम होता है। या फिर उन्हें ये पक्का यकीन होता है कि जो उम्र में बड़ा होता है वही ज्ञानी होता है। मुझे वे दुनियादारी की बातों में कच्चा समझ रहे थे। इतना तो मैं दावे से कह सकती हूँ। और वे सही समझ रहे थे। कोई नहीं बहरहाल उनकी मंशा बेहद नेक थी। वह यही चाह रहे थे कि मैं उनसे बहुत कुछ सीख लूं। इसमें कोई हर्ज भी नहीं था। लोग तो ऐसी 'हाउ टू लिव योर लाइफ़ हैप्पिली ' टाईप की क्लासेस के लिए न जाने कितने रूपये न्योछावर कर देते हैं। 

”आपको मैं इतना बताना चाहता हूँ कि.....



कहानी - हस्ताक्षर होने तक  ( राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती के अंक दिसंबर -जनवरी २०१५ में प्रकाशित )   
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