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Friday, October 31, 2025

साहित्य अकादमी मुंबई का ग्यारहवां राष्ट्रीय कार्यक्रम 25 अक्टूबर 2025 को दिल्ली में संपन्न हुआ।

'साहित्य भूषण' सम्मान से सम्मानित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद, आभार अकादमी अध्यक्ष -डॉ प्रमोद पांडे जी .



 

Wednesday, April 24, 2019

'संस्कार वैभव ' अप्रैल माह - 2019 की गोष्ठी से

पंजीकृत सांस्कृतिक समिति 'संस्कार' - 'लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड, निष्काम सेवी सम्मान' आदि से सम्मानित डॉ हेम भटनागर जी के द्वारा 1981 में संस्थापित की गई। 'संस्कार' हिन्दी का प्रचार - प्रसार कर भाषा और संस्कारों को समृद्ध करने और बचाये रखने में अपना अतुलित योगदान देने के लिए हरदम प्रयासरत रहता है।   
 आज बतौर मुख्य अतिथि 'संस्कार वैभव' की गोष्ठी में शिरकत करने का अवसर प्राप्त हुआ।
 वरिष्ठ साहित्यकार एवं 'काव्य किरण सम्मान', 'संगच्छध्वं हिंदी सम्मान' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित सुश्री मीना जैन जी की अध्यक्ष्यता में खूब उम्दा हास्य -व्यंग का आनंद लिया। 
 सर्वप्रथम दीप प्रज्ज्वलित कर इंद्रधनुषी परिधानों में सजी -संवरी सभी सदस्यों ने सरस्वती वन्दना से शुभारम्भ किया। मधुर गीत -संगीत, शानदार रचनाओं व कुशल संचालन द्वारा गोष्ठी अत्यंत सफल रही।
मीना जैन जी के अथक व सतत प्रयासों से 'संस्कार वैभव' नौ वर्षों से निरंतर प्रगतिशील है। अंत में लज़ीज़ भोजन व मेल -मिलाप करते हुए अगले माह की गोष्ठी तक के लिए सभी ने विदा ली। 

Thursday, April 5, 2018

उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसे रामगढ़ ( नैनीताल ) में कवयित्री महादेवी वर्मा की मीरा कुटीर के प्रांगण को गुलज़ार करती दो दिवसीय गोष्ठी - स्त्री और लेखन'

"पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले / विश्व का क्रंदन भुला देगी / मधुप की मधुर गुनगुन।"

कुछ ऐसी ही मधुर गुनगुन से २६ एवं २७ मार्च २०१८ को कई दिग्गज साहित्यकारों ने नैनीताल की विहंगम पहाड़ियों को संगीतमय किया। उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसे रामगढ़ ( नैनीताल ) में स्थित कवयित्री महादेवी वर्मा की मीरा कुटीर के प्रांगण ( शैलेश मटियानी पुस्तकालय के हाल में ) को गुलज़ार करती दो दिवसीय गोष्ठी - स्त्री और लेखन' समपन्न हुयी। यह गोष्ठी महादेवी के १११ वे जन्मदिन पर 'महादेवी सृजन पीठ' कुमाऊं विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित की गई ।
 सुश्री मृदुला गर्ग, श्री मंगलेश डबराल, श्री सतीश जायसवाल, महादेवी सृजन पीठ के निदेशक प्रो देव सिंह पोखरिया, संगोष्ठी समन्वयक श्री मोहन सिंह रावत एवं कई अन्य साहित्यकारों के सानिध्य में उनके उत्तम विचारों को आत्मसात करते वे अद्भुत पल थे। महादेवी की प्रिय शिष्या डॉ यास्मीन सुल्ताना ने उनके साथ व्यतीत अपने सुंदर पलों को संस्मरण द्वारा साझा किये। गीता गैरोला दी, श्री मुकेश नौटियाल, श्री सुनील भट्ट , श्री कुंवर रविंद्र, डॉ सिद्धेश्वर, डॉ शशांक, डॉ अनिल, मेरी बाल सखा डॉ नूतन गैरोला एवं कई अन्य साहित्यकारों ने आलेख एवं कविताओं में समाहित भावों से सभी को मंत्रमुग्ध किया।




अल्पभाषी, विनम्र एवं कुशल संचालक श्री मोहन सिंह रावत जी को हार्दिक धन्यवाद एवं आभार जिनके आमंत्रण पर मैं गोष्ठी में सम्मिलित हुयी। सौम्य प्रो देव सिंह पोखरिया जी का भी हार्दिक धन्यवाद एवं आभार जिन्होंने मुझे कविताओं के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करने का अवसर प्रदान किया। अन्य सभी मित्रों को साधुवाद, अभिनन्दन।
गोष्ठी के दूसरे दिन सुस्वादु भोजन के उपरांत प्रसन्नता से सराबोर और परिचय का आदान -प्रदान करते हुए सभी विदा हुए अगले वर्ष फिर से एकत्रित होने के लिए।  

Tuesday, December 26, 2017

मॉरीशस में एक शाम और 'हिन्दी गौरव सम्मान'

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।   
( निदा फ़ाज़ली  )

यूँ तो दिल में हहराती संवेदनाओं को कलमबद्ध करना, देश -दुनिया में विचरना, समाज देखना, उनके सुख -दुःख , खुशिया -दर्द, व्यथाये, प्रेम, रुमानियत आदि से संवेदित होते हुए उन्हें संजोना बेहद सुखद क्षण होते हैं। 

जहाँ घर, बाहर, दफ्तर, समाज, मित्र, रिश्ते - नाते  आदि के साथ सामंजस्य बनाते हुए लिखना कई बार मुश्किलों से भर देता है। वहीं एक छोटी सी हौसलाअफ़ज़ाई की शाम चेहरे पर सहर सी मुस्कान सजा देती है। 


 कहानी संग्रह - धुंध भरे रास्ते' का लोकार्पण -  नवंबर 2017  ( आधारशिला प्रकाशन )


 ' हिन्दी गौरव सम्मान'  मिलने पर ख़ुशी का एक पल। ( मॉरीशस के प्रधानमन्त्री महामहिम प्रवीण जगन्नाथ, उच्चायुक्त माननीय अभय ठाकुर व् अन्य गणमान्य। )


Monday, January 23, 2012

'संस्कार' ने मनाया सरस्वती पर्व

"हर दिन उत्सव का दिन है, एक- एक दिन आनंदमय जीते-जीते पूरा जीवन ही उत्सव सा जिया जाता है"
डॉ हेम भटनागर जानकी देवी महाविद्यालय की सेवानिवृत प्रधानाचार्या रही हैं, उन्होंने 1981 में हिन्दी को बढ़ावा देती 'संस्कार' नामक स्वैच्छिक संस्था की नीव रखी, कई पुस्तकों की लेखिका व वृषभदेव पुरस्कार, निष्काम सेवी पुरस्कार, बाल और किशोर साहित्य सम्मान और हिन्दी के क्षेत्र में विशेष योगदान के अनेकों पुरस्कार इनके हिस्से में हैं...84 वर्ष की अवस्था में आज भी उतनी ही सक्रीय हैं। 

22 जनवरी रविवार को संस्कार'  की सभा अनुभव आनंद ने सरस्वती पर्व मनाया। ठंडे दिन के बावजूद भी बहुत से उत्साही मित्रों की उपस्थिति बनी रही। इस बार सभा का आयोजन अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर के घर पर ही किया गया। 

स्वागत और परिचय के बाद शुरू हुआ सरस्वती पूजन और बसंत के मधुर गीत, जो अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर द्वारा लिखे और लयबद्ध किये गये थे। उन्हें मधुर स्वर दिया, संगीत साधिका श्रीमती प्रमिला भटनागर, अनिता चुघ, श्रीमती मधुलिका अग्रवाल व अन्य सभी साथियों ने। 

 यहाँ पर उम्र का अंतर नहीं होता संस्कार का यही एक ज़ज्बा मुझे बेहद आकर्षित करता है। सभी मस्ती में, मिल- जुल कर गाते और खुशियाँ बिखेरते हैं। 
संगीतमय सफ़र के बाद संस्कार सचिव श्रीमती मधुलिका अग्रवाल के द्वारा संस्कार की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई.....बीते माह और संस्कार गोष्ठियों का लेखा जोखा। उसके बाद संस्कार अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर ने की कुछ बात मित्रों से। इस बार गोष्ठी का विषय था ' काव्यमयी,पौराणिक या साहित्यिक अपने परिचित फूलों की कहानियां। 
सभा को आगे बढ़ाते हुए फिर कुछ सदस्यों द्वारा वासंती सुगंध लिए कविता पाठ, फूलों पर लघु कहानियां और आलेख प्रस्तुत किये गये। श्रीमती मीना जैन (उपाध्यक्ष संस्कार)  श्रीमती इंदु जैन, कौसल्या गुप्ता (सेवानिवृत प्रोफ़ेसर मिरांडा हाउस), अनुराधा गुप्ता( समाज सेविका), कई पुस्तकों के लेखक व लेखिकाएं श्री धर्मप्रकाश जैन, जनक वैद, विभा जोशी (बाल भारती प्रकाशन), अंशु जैन, इंदु जैन, प्रकाश जी और श्री अर्जुन पांचोली आदि सदस्यों ने भी अपने विचार रखे। 
 अंत में सभी ने स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया। सभा के साथ ही पुस्तक प्रदर्शनी भी लगी थी, संस्कार की चतुर्मासी पत्रिका 'कलरव'  संस्कार का वार्षिक केलेंडर 'बारामासा' बाल लेखन और व्यस्क लेखकों द्वारा रचित पुस्तकें भी यहाँ पर उपलब्ध थीं। 

बसंत की आहट पहचानती बसन्ती बयार सी सुगन्धित,  आपसी मेल- जोल, लेखन और ज्ञान को बढ़ावा देती 'अनुभव आनंद' की ये सभा सरस्वती जी का आशीर्वाद लेती फिर मिलने तक संपन्न हुई।

Sunday, August 21, 2011

कृप्या बालिकाओं को प्रोत्साहन दें


 जब शब्द दुनिया के हर संवेदनशील इंसान के शब्द बन जाते हैं 

Tuesday, September 8, 2009

संस्कार ने 'अनुभव आनंद' की सभा में मनाया 'हिंदी दिवस'

"अपने जीवन को किसी एकांत क्षण में बटोर कर वर्तमान के बीते हुए दिनों की स्मृर्तियों से छू कर देखने पर हमारे भीतर एक प्रकाश की लहर दौड़ती है। वही तो हमें ठहराव की स्थिति में ला सकती है"
6 सितम्बर, रविवार को प्रातः का समय, सभी अति प्रसन्न। हिन्दी मातृभाषा के देश में हिंदी प्रेमियों का एक जगह पर एकत्रित होना सुखद क्षण था...प्रातः 10 . 45  पर मैं वहाँ पहुँची। संस्कार की संस्थापिका हेम भटनागर जी कुछ सहयोगियों की साथ वहाँ पहले से ही उपस्थित थीं। अपनी वही चिरपरिचित मुस्कराहट व सादगी से सुशोभित सभी कुछ व्यस्थित करवा रहीं थीं। दिखावे व आडम्बर से दूर एक हस्त लिखित व हस्त निर्मित बेहद खूबसूरत बैनर व संगीत वाद्य यंत्रों से सजा ये हाल एक अलग ही आभा बिखेर रहा था।

करीब 80 की वय का ये व्यक्तित्व व हिंदी प्रसार को अपने बेशकीमती 28  वर्ष देती हुयी, प्रेम बिखेरती, उत्त्साह वर्धन करती हेम जी आज भी ३० की वय के उन युवाओं को भी कहीं पीछे छोड़ देती है जो ज़िन्दगी की दौड़ में सामंजस्य ना बैठाता हुआ थका, हारा प्रतीत होता है।

जानकी देवी महाविद्याल में प्राचार्या पद को सुशोभित करती वे सादगी से भरपूर और हमेशा अनुशासन प्रिय रहीं। उनकी ठहराव ली हुयी, हौसला बढाती हुयी, सत्यता का पुट लिए बातें भीतर एक हलचल छोड़ जाती हैं व बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं। उनका कहना है।


और आगे कहती हैं। -"किसी की सहमती हो या असहमति, दोनों स्थितियों में उनके भीतर सोच जन्म लेती है"


हेम जी संगीत को जीवन का अभिन्न अंग मानती हैं व समस्त प्रवीणता के साथ निभातीं भी हैं...अनुभव आनंद की कोई सभा बिना संगीत के हुई  हो मुझे ज्ञात नहीं। बहुत ही मधुरता से सभी साथी राग, भजन व गीत गाते हुए वातावरण को संगीतमय व हर्षित कर देतीं हैं।

सर्वप्रथम हेम जी ने संस्कार के समस्त परिवार व छात्राओं के साथ अपने अनुभव बाँटें व बीते दिनों की सुन्दर यादों को संजोया। जिनमें हमेशा की तरह अच्छा जीवन जीने के सन्देश भी समाहित थे। 'कलरव' पत्रिका का उद्देश्य भी यही रहता है।

"कोई अच्छा विचार अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचे, कोई संवेदनशील क्षण भावुक हृदयों में हलचल मचा सके " और इसमें वे अक्षरशः सफल भी रहती हैं। थोडा विचलित होकर कह उठती हैं।

"मीडिया,टी वी, अखबार, नित्य भ्रष्टाचार की ख़बरों में चारों ओर शोर के बीच अपने को, व अपने बच्चों को, अपने आस-पास को कैसे बचायें रखें? यह प्रश्न कठिन से कठिनतर होता जा रहा है.."

उनकी पुस्तक 'समर्पित अमृत पुत्रियों को' का भी लोकार्पण श्री अजित सिंह (किरोड़ीमल कॉलेज) के कर कमलों द्वारा हुआ। सभा का इस बार का विषय था - 'अध्ययन व अध्यापन के अनुभव' , सभी ने अपने अपने विचार रखें जो आगामी 'कलरव' पत्रिका में प्रकाशित होंगे।



धन्य हैं वो अमृत पुत्रियाँ जिन्हें हेम जी जैसी गुरु का सनिद्धय व वरद हस्त प्राप्त हुआ। वक्त हाथों से छूटा जा रहा था और कहने सुनने को बहुत कुछ था , उनकी छात्राओं ने भी गुजारिश की दो शब्द बोलकर वो अपने गुरु के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहतीं हैं। गुरु के महात्म्य को व्यक्त करते समय शब्द कितने कम पड़ जातें हैं ..



छात्राओं ने जब बोलना शुरू किया तो सिलसिला चलता ही गया...कितने ही भाव बहे, स्नेह, श्रद्धा, आदर, मुस्कुराहटें, प्रेममयी अश्रुजल कितना कुछ था की समय को अनदेखा करना ही उचित जान पड़ा...

बहुत से पुरूस्कार अलग -अलग क्षेत्रों में योगदान के लिए अजीत जी के कर कमलों द्वारा दिए गए, अंत में मनभावन संगीत व प्रसाद स्वरुप स्वादिष्ट भोजन कर मीठी यादें लिए सभी एक बार फिर बिछुड़ गए पुनः एकत्र होने के लिए....



Friday, July 31, 2009

अनुभव आनंद के पल !


कुछ दिन पूर्व डाक द्वारा खूबसूरत , हस्तलिखित निमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ अनुभव आनंद की मीटिंग का था। फिर मित्र का फ़ोन आया -"कैसा लगा अनुभव आनंद का निमंत्रण पत्र? हस्तलिखित, कंप्यूटर की दुनिया से दूर...चल कर देख लें आप को अच्छा लगेगा। वैसे तो अनुभव आनंद नाम ही बहुत था आकर्षित होने के लिए।


नियत समय 10.30 बजे प्रातः रविवार को हम नियत स्थान पर पहुँचे। रंगबिरंगी साड़ीयों में संजीदगी से सँवरी लेखिकाएँ व बहुत कम संख्या में लेखक भी उपस्थित थे लगभग 50 - 60 के करीब। मित्र द्वारा परिचय करवाने पर सभी का गर्मजोशी व अपनत्व से मिलना मन को अति भा गया। ये थी संस्कार की सभा।

'संस्कार' का जन्म 1981 में हुआ व इसका उद्देश्य बच्चों व वयस्कों में नैतिक मूल्यों का प्रतिस्थापन करना है। साहित्यिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पुस्तक प्रकाशन करके सौन्दर्य बोध की पहचान कराना अहिंसा, प्रेम, तथा औचित्य का वातावरण बनाना इस का संकल्प है। इसके साथ ही पक्षियों के कलरव के सामान अत्यंत सहज, सरल व सुंदर चतुर्मासिक पत्रिका 'कलरव ' का भी सम्पादन हुआ।

उसी दिन उनके द्वारा लिखित पुस्तक 'पाँचों नौबत बाजती 'का लोकार्पण भी था। इस पुस्तक को उन्होंने अपनी छात्राओं को समर्पित किया है। कितना मधुर नाता व स्नेह रखतीं हैं वे सभी से। इस पुस्तक में उन्होंने कबीर को अलग-अलग रूप में देखा है। उन्होंने कबीर को शिक्षाविद ,संगीतज्ञ ,लोक गीतकार ,योगी ,साधक और भी बहुत से रूपों में ढाला है।

पुस्तक के मुख्य पृष्ठ पर हेम दी का एक मनोहारी चित्र है जिसे देखकर लगता है जैसे वे कबीर के दोहों में तल्लीन होकर भाव -विभोर हो उठी हों। किन्तु पुस्तक के अन्दर उन्होंने बताया है कि वह नियाग्रा फाल्स के तुषार कणों के स्पर्श से अभिभूत क्षणों में लिया गया चित्र है। 

अभी ये सब सुन समझ ही रही थी, तभी सामने से सौम्य,शान्त, सादगी की मूर्ती सी दिखलाई दी। वे थीं हेम दी, डॉ हेम भटनागर..'संस्कार' की संस्थापिका।

लगभग ८० वर्षीय अनुभवों का समृद्ध कोष लिए हुए। उनके बारे में कुछ कहना दीये को रौशनी दिखाने जैसा है। जानकी देवी महाविद्यालय में कई वर्षों तक प्राचार्या पद को सुशोभित कर ( तत्पश्चात प्रधानाचार्या ) अध्यापन के अनुभवों (इस नाम से पुस्तक भी प्रकाशित ) को निष्ठा पूर्वक निभाती हेम दी आज भी कई संस्थाओं व हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार को बढावा देती व्यस्त रहतीं हैं। हिंदी भाषा की अमूल्य साहित्यिक धरोहर व निधि को भली भांति संरक्षित करती दूसरों को भी उत्त्साहित करती रहतीं हैं। 

कार्यक्रम के द्वितीय चरण में कुमार गन्धर्व जी के पौत्र भुवनेश कोमकली जी ने अपने गायन -अवधूता 'युगन युगन हम योगी ' व कुछ अन्य रगों से सभी को मंत्रमुग्ध किया। कुछ गायन अपनी मधुर आवाज़ में महिला सदस्यों ने भी प्रस्तुत किया।

अंतिम चरण में शुद्ध ,सात्विक , स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेते हुए हम सभी परिचय को और बढाते हुए हास -परिहास व पुस्तक -चर्चा करते व्यस्त थे तब...सभी पर अपनी स्नेह वर्षा करती हुई हेम दी मेरे निकट पहुँची। मेरा हाथ पकड़कर स्नेहिल हो बोली -

 "सब कुछ ठीक रहा ना? आगे तुम्ही लोगों को संभालना है।"

उनकी ज्ञान भरी ममतामयी बातों व स्नेहिल स्पर्श से मैं आह्लादित हो उठी। अति आनंद का अनुभव करते हुए मैंने सभी से अगली गोष्ठी तक के लिए विदा ली।