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Friday, September 25, 2026

कुछ अनकहा सा


बात कहीं से भी शुरू करो, कितनी बड़ी भूमिका बांधो किंतु बातों के मर्म को समझना जरूरी है।" उसने कहा।  

"ठीक बात" वह उत्तर हमेशा नपे-तुले शब्दों में देता है। 

"और" 

"और क्या?"  

"कुछ नहीं। जाने दो। कुछ तो इंसान अपने लिए भी रखे, अनकहा, अनसॉल्वड सा।"
 
"मतलब?"

"वही अनकहा जो कहीं उलझा हुआ होता है भीतर। कसकता हुआ संवेदनाओं को जन्म देता है। नई कहानियों का जन्म ऐसे ही होता है।"

"हो गया? और कुछ?" दोनों की हंसी से पार्क का वह कोना महक उठा। 




Tuesday, June 23, 2026

जिजीविषा ( बॉस्को जिंदादिली का एक नाम )

 

8 जून 2012 को एक छोटी सी टोकरी में बैठ कर वह मासूम आँखों वाला प्यारा, नन्हा मेहमान हमारे घर आया। तब वह एक सप्ताह का था। वैसे उसका जन्म 29 अप्रैल को हुआ। हमारी एकमात्र बिटिया को जब साथी की जरूरत महसूस हुई तब हमने उसे कुछ ऐसे बहलाया। वह नादान भी अति आनंदित होकर बहल गई। वह छोटा भाई था इसलिए बड़ी बहन की डांट, फटकार, स्नेह, प्रेम, धमाल सब उसके हिस्से में आया। घर गुलज़ार हो गया। उसका नामकरण हुआ तो नाम पड़ा बॉस्को। 

वक्त के साथ जितना बॉस्को शैतानी करता उतना ही सबका दुलारा बनता गया। सुबह और शाम को घूमते हुए घर ही नहीं सोसाइटी भर के बड़े, बच्चे सभी उसे सहलाये बगैर आगे नहीं बढ़ते हैं। शांत, प्यारा, आज्ञाकारी, सुन्दर बोस्को। 

बॉस्को का डॉक्टर के पास जाना अमूमन नहीं होता है। वर्ष में केवल एक बार जाता है वो भी रेबीज और डिस्टेंपर का इंजेक्शन लगवाने। या फिर खून की जांच आदि करवाने। घर का खाना वह आनंद पूर्वक खाता है। न तो उसे डॉग फूड की आदत डाली गई न उसने कभी पसंद किया। पहले चिकन और चावल खाता था। बाद में १० वर्ष का होने पर डॉक्टर ने मना कर दिया कहा - प्रोटीन कम देना होगा। चिकन थोड़ा कम खिलाइए। यानि उसे शाकाहारी बनना होगा। परीक्षा थी जिसने कभी सब्जियां खाई ही नहीं अब खाएगा क्या? कहीं घूमने जाने पर उसे दो -दो दिन भूखा रहना मंजूर था किन्तु चिकन चावल के न मिलने पर कुछ और कतई नहीं खाता था। रोचक बात यह थी कि इससे न उसकी ऊर्जा में फर्क पड़ता था और न ही वह किसी तरह की नाराजगी जाहिर करता था। उछल -कूद बराबर बनी रहती।  
शाकाहारी बनाने की तैयारी में अगली सुबह जब उसे सीताफल, गाजर आदि के साथ चावल दिए गए उसने झटपट, बिना किसी परेशानी के ऐसे भोजन किया जैसे रोज यही खाता होगा। क्या उसे अंतर्बोध हो गया था? क्या जानवर इतने समझदार होते है? कि वे जानते हैं उनके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा? हैरानी और संतोष से दिल भीग गया। उस दिन से बॉस्को अचानक शाकाहारी हो गया किन्तु हमेशा उछलता -कूदता स्वस्थ रहा। 

बॉस्को लाह्सा एप्सो है। 14 वर्ष से अब तक बेहद स्वस्थ, सुन्दर, समझदार एवं सबको मोहित करने वाला शांतिप्रिय जीव रहा है। पिछले महीने सहसा एक दिन उसे ज्वर आया। हम उसे घर के पास बने 'वैदिक क्लीनिक' पर ले गए। ड्रिप लगी और रक्त की जांच के लिए उसका रक्त लिया गया। अगले दिन जब परिणाम आया तो उसे टिक फीवर था लेकिन बाकि रक्त की रिपोर्ट एकदम बढ़िया। उसकी किडनी, लीवर आदि सब कुछ बच्चों जैसा स्वस्थ। डॉक्टर उससे बेहद खुश रहते हैं।

चार दिन बाद मुझे फिर क्लीनिक जाना पड़ा क्यूंकि बॉस्को मुंह से बहुत ज्यादा लार टपका रहा था। डॉक्टर ने उसका मुंह खोल कर देखा तो नीचे वाले जबड़े पर करीब डेढ़ इंच का ट्यूमर। सब हैरान...कब बन गया इतना बड़ा? यह कभी दर्द से चिल्लाया क्यों नहीं? खाना कैसे खा रहा था? कई अनुत्तरित प्रश्न जेहन में उठने लगे। अब? डॉक्टर के अनुसार - मुंह के ट्यूमर अक्सर कैंसर होते हैं। बहरहाल ट्यूमर का सिरिंज सैंपल लेकर जांच के लिए भेज दिया गया। आठ दिन के बाद परिणाम सुखद था। ट्यूमर नॉन कैंसर वाला निकला। (बाद में बायोप्सी में माइल्ड, फर्स्ट ग्रेड का कैंसर था)

दिल्ली के अन्य वेटनेरी डॉक्टर के पास जाने के अच्छे अनुभव (मित्रों आदि के मिलेजुले निजी अनुभव) मेरे पास नहीं हैं। ऊंची दुकान...की तर्ज पर छोटी सी परेशानी के लिए भी रक्त जांच, एक्सरे आदि अन्य जांच के नाम पर बड़े बिल बना देना साधारण बात होती है। पिछले कुछ वर्षों से हम लोग रेबीज का टीका लगवाने या अन्य (deworming) जरुरत होने पर 'वैदिक क्लीनिक के कुशल, एवं सौम्य सर्जन रवींद्र वर्मा' के पास जाते हैं। उनका जीव प्रेम कमाल का है फिर चाहे वह पंछी, खरगोश हो या फिर कुत्ते। बिना किसी दिखावे के सहज -सरल डॉक्टर रविंद्र अपने कार्य में निपुणता से लगे हुए हैं। हमें उनके ज्ञान, योग्यता और इलाज पर पूरा भरोसा है।   
बॉस्को को लेकर डॉक्टर थोड़ा असमंजस में थे कि इस उम्र में उसे एनेस्थीसिया देना कितना सही रहेगा? लेकिन मेरा मानना था वैसे भी ट्यूमर की वजह से वह दर्द में रहेगा। बाद में खाने में दिक्कत होने की वजह से कितने दिन चलेगा? इसलिए जो भी हो सर्जरी हो जानी चाहिए। हमने कंसेंट पर हस्ताक्षर कर दिए। 

किडनी और लीवर की अच्छी हालत देखते हुए उसे एनेस्थीसिया दिया गया। मैंने मन ही मन सोचा 'यदि अब यह कभी नहीं उठा तो?' आंखें नम हो गई किन्तु दिल ने कहा ये हमें इतनी जल्दी छोड़ कर नहीं जा सकता। और सर्जरी हो गई। करीब 45 मिनट के बाद डॉक्टर बाहर आए। "सब ठीक हो गया। अब इसे 2 घंटे में होश आ जाएगा फिर आप इसे घर ले जा सकते हैं।" सुकून की सांस लेना किसे कहते हैं हमें उस दिन मालूम हुआ। 

अपने कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने के बाद जब हम वापस आए तब तक बॉस्को होश में आकर हमारी राह देख रहा था। कुछ दस -बारह दिन थोड़ा ढीला रहा किन्तु खाते -पीते, टहलते सब बढ़िया हो गया। कमाल की बात यह थी कि आज तक हमने इसे न पहले और न बाद में कभी भी कराहते या दर्द से परेशान होते नहीं देखा और न ही खाना छोड़ते हुए। कहते हैं -कुत्ते अपना दर्द छुपाने में अति माहिर होते हैं। एक हम इंसान थोड़ा सा पीड़ा हुई नहीं कि कराहते हुए आंसुओं को रास्ता दे देते हैं। 
आज खाते - पीते, उछलते, कूदते बॉस्को एक स्वस्थ जीवन जी रहा है। मनुष्य का इलाज करना फिर आसान है वे बोल कर अपना दर्द बयां कर सकते हैं, अपनी तकलीफें बता सकते हैं। किन्तु बेजुबान जानवर? जानवरों के दर्द को उनके भावों को, उनके रोगों को समझ कर उनका निदान करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। और इस दुष्कर कार्य को बखूबी अंजाम दे रहे हैं नेक एवं अपने क्षेत्र में पारंगत डॉक्टर (सर्जन) रविंद्र वर्मा।  

दिल से धन्यवाद डॉक्टर रविंद्र, बॉस्को को नवजीवन देने के लिए। 


Dr.Ravindra Kumar Verma 
Veterinary Consultant & Surgeon 
Vedic Pets Clinic and Surgery Centre
8, Gurudwara road, near Mother Dairy, Sector-1, Vaishali, 
Ghaziabad, Uttar Pradesh 201010, India
Mobile - 9289544101


Monday, November 24, 2025

फिर छिड़ी रात बात फूलों की


उस दिन सूरज की किरणों के जगाने से पहले ही नींद उचट गई। पिछली रात की बारिश से वातावरण में ठंडक समाई हुई थी। चलते चले जाने का मन हुआ दूर तक इन सर्पिलाकार सड़कों पर जो बारिश की नमी से भीगी हुई थीं। रविवार की छुट्टी वाला बेफिक्री भरा दिन। मन प्रसन्न था और सोच स्वतंत्र। ज़िंदगी कभी इतनी रहम दिल भी हो जायेगी सोचा नहीं था। बीती -बिसरि स्मृतियों को जोड़ते - तोड़ते निरुद्देश्य चलते रहने का भी अपना आनंद है।    

जीवन के इस पड़ाव में घटनाओं और अनुभवों से सराबोर ये ज़िंदगी अब और भी अच्छी लगने लगी है। भोर में चह -चह करती गौरैया बहुत दिख रही थी। मेरी बचपन की यादों का पंछी, टुकुर टुकुर ऐसे देख रही थी जैसे पहचान रही हो। फूलों और जंगली घास की मिली जुली खुशबू से महकती मैं अपनी कल्पनाओं में सुन्दर रंग भरती रही। जानती हूँ ज़िंदगी कल्पनाओं के सहारे नहीं चलती। यथार्थ से रूबरू होना पड़ता है। 

पगडंडियों पर नजर रख कर न चलते हुए, सिर उठा कर चीड़ के ऊंचे, लम्बे पेड़ों के पीछे से झांकते हुए साफ नीले आकाश को देखती हुई चल रही थी। चुपचाप नीचे देखते हुए चलने से लगता है बाहरी दुनिया से बेखबर हम पूरी तरह अपने साथ है। अपना साथ सबसे सुन्दर साथ होता है। ना हम पर ना हमारे विचारों पर...कहीं किसी का कोई हस्तक्षेप नहीं।  

कुछ दूर निकल आई थी। अचानक एक बड़े से नुकीले पत्थर से टकरा गई। गिरती हुई सहारे को तलाशते हाथों में सड़क किनारे लगे पेड़ की झूलती शाखाएं आ गई। गिरने से बच गई। लगा आज सभी की मिली जुली साजिश है मुझे खुश रखने की। झींगुरों की झंकृत लयबद्ध आवाजों के साथ... टूटी हुई सोच की कड़ी फिर जुड़ गई। मैं और मेरे विचार हाथ थामे साथ चल रहे थे। जीवन की गणित मजेदार होती है। कुछ सवाल पल भर में हल हो जाते हैं और कुछ हमारे साथ ही अपनी ज़िंदगी का सफ़र तय करते हैं, निरंतर, बिना थके...

सहसा सिर के ऊपर से एक चील ज़ोर की आवाज़ करती हुई निकली और मैं सहम कर वर्तमान में वापस आ गई। देखती हूँ बिन बुलाए मेहमान की तरह कई सवालों के हल खोजते हुए बहुत दूर निकल आयी हूँ। वक्त के साथ सूरज का ताप भी बढ़ता जा रहा था। वापस घर की तरफ पलटी। फिर वही रास्ते, जीवन के अलग-अलग मोड़ों पर मिलते दुख-सुख का हिसाब- किताब करते हुए वापसी का सफर घर के मुख्य द्वार पर पहुँच कर पूरा हुआ। अतीत के अनुभव टटोलती हूँ तो लगता है भीड़ की कतई जरुरत नहीं। मुठ्ठी भर प्यारे दोस्तों के साथ एक शानदार जिंदगी जी सकते हैं। 

Monday, June 21, 2021

सुंदर है विहग सुमन सुंदर, मानव तुम सबसे सुंदरतम


मुद्दतों बाद फुर्सत व एकांत का मिलना अद्भुत होता है। हर पल शारीरिक मशक्कत, दिमागी कसरत करते हुए मानव गोया मशीन बन ​गया है। ​

इस ​पीड़ादायक ​कोरोना काल में अपने इर्द गिर्द नज़र डालें तो इंसानी व्यवहार में अज़ब परिवर्तन दिख रहा है। ​माना कि ​​संसार में सबका अलग स्वर होता है। शरीर का अलग, मन मस्तिष्क कुछ और कहता है और दिलो दिमाग एक अलग ही दुनिया में विचरता है।​ ​आजकल फुर्सत है सो खामोशी से बैठ कर अपने चारों तरफ देखते रहें, परिवर्तन को बारीकी से महसूस ​करते रहें और अचंभित होते​ रहें . ​

​कहीं ​दहशत, भय, उदासी, ऊब, संताप, पीड़ा, बेरुखापन, नाराजगियाँ, अकेलापन, अवसाद, समझौते ​आदि भाव दीख रहे हैं तो ​कहीं पर सौम्यता, सरलता, सादगी, सहजता जैसे सद्गुण भी नज़र आ रहे हैं। नाना मटमैले व खुशनुमा रंगो से भर गई है ये दुनिया। इंसान थम गया​ है​, उसकी सोच थम गई​​, जिंदगी रुक गई​ है​। ये सभी भाव पहले भी थे किन्तु अब इसमें अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हो गई है। पिछले दिनों दहशत और पीड़ा भरा जो समय​ गुजरा है, अभी भी गुजर रहा है और आगे भी कुछ और वक्त जिसके बने रहने की आशंका है उसे झुठलाया नहीं जा सकता।​ ​एक अदना सा ​नग्न आंखों से ​न दिखाई देने वाला विषाणु इतना बड़ा विश्वव्यापी बदलाव कर रहा है? इंसान हारा भी तो इससे? ​विस्मय होता है।  

इससे प्रभावित नहीं हुए तो सूरज, चाँद, प्रकृति, पंछी, जानवर आदि, ये सम पर रहे, कतई नहीं बदले। अपनी ही रवानगी में विचरण करते रहे। फूल खिलते रहे, फलों से रस झरता रहा। पंछी चहचहाते रहे, नदिया कलकलाती रही, हिरन कुलाचें भरते रहे... नदियों की धारा के मार्ग में अवरोध आने पर वह मार्ग बदल लेती है ​फिर भी निरंतर गतिमान रहती है। ​किसी भी हाल में ​प्रकृति की व्यवस्था नहीं ​थमती। ​ 

अब ​ऐसे में इंसान क्या करे? उसे कुछ तो करना होगा। अपने अवसाद से बाहर निकल कर सकारात्मक होकर कुछ न कुछ तो ​सोचना और उसे कार्यान्वित ​करना ही होगा।​ द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी ने अपनी कविता के ज़रिये बचपन में ही सिखा दिया था - वीर तुम बढ़े चलो...धीर तुम बढे चलो " उस वक्त चाहे वह कविता किसी भी अर्थ में कही गई हो किन्तु आज के हालात में हम ऐसा भावार्थ ले सकते हैं। 

करो ना 
क्षण भर को थम जाओ 
खूब संभल जाओ ​परन्तु हे वीर मानव! 
अपने 
अवसाद से ​
अपनी नकारात्मकता से 
बाहर निकल कर कुछ न कुछ तो 
करो ना 

Monday, December 28, 2020

अलविदा वर्ष 2020 / Time To Say Goodbye (Year -End Blog )


'ज़िंदगी के कई इम्तिहान अभी बाकी हैं / ज़िंदगी की कई उड़ान अभी बाकी हैं' 

वर्ष 2020 दुनिया भर को हैरान कर देने वाला वर्ष रहा है। क्षणिक सी मुस्कान, मायूसी, उदासी, अकेलेपन और अफ़सोस का वर्ष। सब तरफ वीराना, खामोशी और अशांति का आलम छाया रहा। सारा संसार कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह कर थम गया। असहाय, बेबस और भयभीत आँखों से कोरोना जैसे अति सूक्ष्म विषाणु का तांडव देखता रहा। ऐसे हालात में बड़ा, छोटा, अमीर, गरीब सब एक सम पर आकर ठहर गए। रोग का आक्रमण सब तरफ बराबर रहा। किसी से कोई भेदभाव नहीं, न किसी जाति से, न किसी वर्ग से। कई इस कोरोना से संघर्ष करते हुए ज़िंदगी की जंग हार गए, कई विजयी भी हुए। जीवन एक संग्राम है।

यही वह समय भी रहा जब जीवन से रफ़्तार थम गई। फुर्सत भरे पल नसीब हुए। जंगल में भटकने के भरपूर अवसर मिले। नदियों के बहाव को, पहाड़ों के विराट रूप को और प्रकृति के सौंदर्य को जी भर कर सराहने की तमन्ना पूरी हुई। खामोश रह कर अपने आप से साक्षात्कार करना इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। 

बहुत से सन्देश देते हुए ये कोरोना का संक्रमण जल्द ही अलविदा कह देगा। तब सब तरफ अमन,शांति और सुकून बरसेगा इसी आशा के साथ अलविदा 2020...  


Saturday, July 4, 2020

शब्दों का सफ़र


कभी कभी हम एक दूसरे को केवल शब्द दे पाते हैं अहसास नहीं। और बिना अहसासों वाला वह वार्तालाप शीत से ठिठुरता एक खामोश दिन सा होता है। इस जीवन में कितना कुछ है कहने को, सुनने को। लेकिन कौन किसकी सुने? कौन किसे सुनाए? 

हमेशा की तरह मेट्रो अपने स्टेशन में वक्त पर पहुँच गई। लड़के ने हाथ हिला कर अलविदा कहा और ट्रेन से बाहर निकल गया। लड़की ने बिना हाथ हिलाये एक फीकी मुस्कान के साथ अलविदा कहा। मेट्रो का द्वार बंद हो गया।उसने रफ़्तार पकड़ ली। दो अनजान यात्रियों के पिछले एक घंटे से साथ कर रहे शब्दों के सफर का अंत कुछ इस तरह हुआ।

Thursday, June 18, 2020

सर्वे भवन्तु सुखिनः

"हुई मुद्दत कि ग़लिब मर गया पर याद आता है / वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता।"  
 
एक जगह पर रुक जाने में एकरसता की जकड़न अज़गर की गिरफ्त सी लगने लगती है। इसलिए चलते रहो, आगे बढ़ते रहो, कहा गया। आज तक सभी चलते रहे, बढ़ते रहे। किंतु अब कोविड 19 की महामारी ने इसे पूरी तरह बदल दिया है।

हमसे कहा गया पानी बचाओ, नदियां बचाओ, हवा को जहरीला मत होने दो, पेड़ मत काटो, प्रकृति के प्रति हिंसक मत बनो। और समझाया गया प्रकृति से प्रेम करो, उसके प्रति उदार बनो, किसी की समझ में नहीं आया। उसी का दुष्परिणाम रहा कि ये नासमझ मानव आज एक अति छोटू, नग्न आंखों से न दिखाई देने वाले कोरोना से हार रहा है। उसके सामने लाचार है। घबराहट से भरा वह भयभीत शावक सा उससे छुपता, बचता फिर रहा है। कोरोना ने कहा - बहुत हुआ, बहुत दौड़ लिए। अब कुछ वक्त के लिए थम जाओ। बंद करो अपनी मनमानियां।' सब स्तब्ध, ये क्या हुआ? वे चौंकें, डरे और त्राहि माम कहते हुए थम गए। न चाहते हुए भी जबरन थमना पड़ा।     

देखा जाय तो थमा क्या? केवल मनुष्य और उसके संसाधन। इंसान जल्दी में था, होड़ लगाता था, हाय -तौबा करता था। वह सब थम गया। इंसान घर पर क़ैद हो गया, उसके ऑफिस, फैक्टरियां, दुकाने, होटल, स्कूल, कॉलेज सब बंद हो गए। मेट्रो, रेल, हवाई जहाज़, सड़कों से गाड़ियां वे भी बंद हो गईं। सहसा सारा संसार थम गया। दुनिया रुक गई। बाहरी जीवन में उसकी गतिविधियां एकदम बंद हो गईं। 

अब आकलन करें क्या नहीं थमा? चूंकि हमें हर हाल सांस लेनी थी, हवाएं नहीं थमीं। पानी चाहिए था नदियां, धाराएं, झरने नहीं रुके। भोजन चाहिए था प्रकृति ने, दरख्तों ने फलना -फूलना नहीं छोड़ा। बारिशों की झाड़ियां लगे या फिर आंधी -तूफ़ान आए। बर्फ गिरी, ओलावृष्टि हुई। प्रकृति लहूलुहान होती रही किंतु थमी नहीं। बावजूद इसके वह हिम्मत करके फिर उठी, मुस्कुराई, लहलहाई और संसार को विभोर करती रही। 

आज इस अत्यंत खतरनाक विषाणु के सामने सारा विश्व पराजित हो गया। इसने कोई भेद -भाव नहीं किया। जिसने इसके सामने सर उठाने की कोशिश की वही घराशायी हुआ। खूब पैसे वाले, बड़ी -बड़ी पदवी वाले, अट्टालिकाओं वाले, झुग्गियों वाले, बेघरबार, गरीब, मजलूम, लाचार सभी ने इससे तौबा कर रखी है। कोई गुरुर करे तो किस बात का। सबक इतना ही या तो इंसान अपनी मनमानियों पर अंकुश लगा ले, या फिर शहादत के लिए तैयार रहे।    

भूल जाना इंसान की फितरत होती है। जिस दिन कोरोना इन्हें माफ़ कर देगा। अपना तांडव समाप्त कर देगा। उस दिन से अपनी व्यस्तताओं में, अपने गुरुर में इंसान सब भूल जाएगा। वही मनमानी, उदंडता, प्रकृति का दोहन, संसाधनों का दुरुपयोग उसकी लापरवाही से और जाने -अनजाने फिर शुरू हो जाएगा। सवाल ये कि क्या इंसान इस महामारी से सबक लेगा? प्रकृति के इस इशारे को समझ सकेगा? अपने गलत और बेवकूफी भरे आचरण में बदलाव लाएगा? या फिर से मनमानी करेगा और उसके दुष्परिणाम स्वरूप किसी कोरोना को फिर से आमंत्रित करने की तैयारी में जुट जाएगा?

इंसान वही जो अपनी ग़लतियों से सबक ले। अपनी क्षुद्र, विध्वंशक सोच और कुंठित मनोवृत्तियों से आज़ाद होकर सरल, उदार और प्रेममयी हो जाए। तब तक सर्वे भवन्तु सुखिनः  

Friday, April 10, 2020

नज़रिया

"एक चोर, एक पियक्कड़ और एक अकर्मण्य लेकिन एक अत्यंत बढ़िया आदमी।" एक सत्रह वर्षीया लड़की ने अपने मित्र का परिचय गोर्की से इन शब्दों में कराया। 

गोर्की ने इसे उस सत्रह वर्षीया लड़की की प्रतिभा कहा। 

समस्त बुराईयों के बावजूद किसी में अच्छाई देख पाना वाकई प्रतिभा है। अमूमन ऐसा होता नहीं है। इसीलिए यह बात और भी ज्यादा मायने रखती है। हम सभी एक इंसान को अपनी -अपनी दृष्टि और सोच के अनुसार भिन्न -भिन्न नज़रिये से देखतें हैं। किसी के प्रति सोच बदलते ही नज़रिया बदल जाता है और नज़रिया बदलते ही सोच। 

दॉस्तोएवस्की के कई असफल प्रेम की उनकी प्रेमिकाओं ने उनमें अलग -अलग अवगुण देखे थे। किसी ने कहा - वो पाशविक थे, तो किसी के अनुसार वो ईर्ष्यालु और शक्की। किसी ने उनमें जुंआरी देखा तो किसी ने अपनी चाहना के लिए प्रेम का ढोंग करता हुआ अवसरवादी भी कह दिया था। शायद इसलिए वो सभी असफल प्रेम की भागीदार बनी। ऐसा नहीं है कि समानताएं और एक जैसे विचार ही दोस्ती के लिए जरूरी हैं। विभिन्नताएं भी प्रेम पैदा कर सकती हैं। 

अन्ना ग्रिगोरीव्ना और दॉस्तोएवस्की के बहुत से बेमेल विचारों के बावजूद भी वे उनके साथ उनकी मृत्यू 1881 में, ज़िंदगी के करीब तेरह वर्ष तक उनकी पत्नी बन कर रहीं। उसने उन्हें उनकी सभी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ स्वीकारा था। सही मायने में उनकी ज़िंदगी थोड़ा बहुत स्थिर भी उसी के बाद से हुई थी। 

अब जो है सो है। जो नहीं है वो भी है। इसी होने और नहीं होने में ही छिपा है जीवन का असली राज और तमाम खुशियां। सिर्फ कुछ खट्टी -मीठी यादें भी बहुत होती हैं प्रसन्न रहने के लिए। बस एक नज़र चाहिए। 

Sunday, April 5, 2020

जो जीता वही सिकंदर


कल शाम सोसाइटी के भीतर टहलने निकली। कुल तीन लोग दिखे, मेरी जैसी बबाल हरकत करते हुए। अभी एक चक्कर लगाया ही था कि क्यूट से बुजुर्ग गार्ड भैया सामने आ गए। मुस्काते हुए बोले।

"मास्क भी नहीं। मैडम आप का भी अलग ही चल रहा है। आपको क्या लग रहा कि कोरोना वाईरस आपसे पूछेगा - 'मुझसे दोस्ती करोगे?' वो बस गले पड़ जाएगा। आगे आप खुद समझदार हैं।" 

"मतलब आप अब भी मान रहें हैं कि मैं समझदार हूँ?" मैं हंस दी। ये मेरी हंसी भी अजीब है। जहाँ इसकी जरुरत कतई नहीं होती वहां भी झट हाज़िर। मुझे नहीं लगता जीवन में रोनी सूरत लेकर, तंज, ताने देकर, अपनी कुंठाओं को दूसरों पर उड़ेल कर या फिर नकारात्मकता फैला कर हम संकट से ऊबर जातें हैं या अपनी व्यथाओं को कम कर देते हैं। 

"घर कब से नहीं गए?"

"जब से लॉकडाउन हुआ है" उनकी सरल मुस्कान अभी भी वहीं थी। 

"घर परिवार से दूर हैं, चिंता नहीं होती उनकी?"

"होती क्यों नहीं है?"

"फिर?"

"सभी इंसान पहले अपने घर परिवार की ही चिंता करते हैं। दूसरों के लिए कुछ करने का अवसर अभी आया है? फ़ौज़ में भर्ती होना चाहता था। नहीं चुना गया। आजकल अच्छा लग रहा है। ऐसे लगता है हम सब देश के वीर सिपाही हैं। डॉक्टर्, नर्स, पुलिस, फ़ौज़ सभी आगे आ गए। जान पर खेल कर ज़िंदगियाँ बचा रहें हैं। घर -बार तो उनके भी हैं न मैडम।" इंसान सोचता है केवल बड़ी पद -प्रतिष्ठा वाले ही समझदार होते हैं। 

आज सबकी जान पर बन आई है इसलिए घबराहट से भरे खामोश हैं। जिस दिन संसार इस विषाणु से मुक्त हो जाएगा देखना तब है। फिर से सब सिकंदर बन जाएंगे। सरकार को कोसने भेजंगे, आरोप -प्रत्यारोप लगेंगे। तोहमतें लगेंगी, लानत -मलानत होगी। देश में अशांति और नफरत फैलाने वाले तत्व फिर सर उठाएंगे। बहरहाल, जिसके पास जो होगा, वह वही तो बांटेगा। 

Saturday, March 21, 2020

कुछ तेरा ना मेरा मुसाफिर जाएगा कहाँ


कभी अजीब कश्मकश होती है भीतर। किससे कहना चाहते हैं, क्या कहना चाहते हैं, कहाँ जाना चाहते हैं कुछ नहीं मालूम होता। कुछ दिन आते हैं ऐसे भी। निरर्थक, निरुद्देश्य भटकन भरे दिन। ऐसे ही एक अजीब, दुविधा भरे दिन नदी के बहाव के साथ दूर निकल जाओ। न कहीं पहुँचने की चाह हो, न ठहरने की। बहते रहो जल के बहाव के साथ। विचरते रहो अपने विचारों के साथ। 

ये अलग बात है कि अंत में हर कोई कहीं न कहीं पहुँच ही जाता है। कुछ न कुछ पा ही जाता हैं। किन्तु उलझन यह कि क्या वह मिलता है जिसकी तलाश में ये भटकन थी, ये व्यग्रता थी? इतना आसान नहीं कि हम जो चाहें, जब चाहें वो मिल ही जाए। गर ऐसा हो तो जीवन का आनंद ही क्या। 

आनंद और सुकून प्राप्त करना हमारे सफ़र का शाश्वत सत्य होता है। हमारी भटकन का अंतिम सत्य भी। हम सभी ऐसे ही किसी न किसी अज्ञात सफ़र के मुसाफिर हैं। इसी पर एस डी बर्मन ने बखूबी कहा- 

यहाँ कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहाँ
कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी पे लिखी लिखाई
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसी के ना आई
कुछ
 तेरा ना मेरा 
मुसाफिर जाएगा 
कहाँ...

Friday, February 14, 2020

ढाई आखर प्रेम का - प्रेमोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

 
वो हमसफ़र था मगर उससे हमनवाई न थी      
   (नसीब तुराबी)

विसंगतियां हर तरफ हैं इसलिए संसार अपने आप में सहमा, सकुचाया, अनमना अजीब से अकेलेपन से ग्रस्त है। भयावह स्थिति देखने को मिलती है सार्वजानिक स्थानों में, मेट्रो में, पार्क में, सिनेमा हॉल में, सोशल साइट्स पर। इंसान कस्तूरी मृग की तरह खुशियों सी महकती कस्तूरी यहाँ -वहां ढूंढता -फिरता है। टेलीविजन देखना, संगीत सुनना, फ़िल्में देखना, मॉल में घंटों व्यतीत करना जरुरत कम किन्तु अकेलापन भरने के विकल्प ज्यादा बन गए हैं। लोग अपने मोबाईल में, लैपटॉप में, किताबों में अपने अकेलेपन को छिपाये फिरतें हैं। यही उनके मन बहलाने के और उनके अकेलेपन से निजात दिलवाने के साथी रह गए हैं। यह देख कर 'ढाई आखर प्रेम का' सिखाने वाले कबीर अपने आप को ठगा हुआ महसूस करते होंगे। 

जिनको अपने अकेलेपन से निकलना नहीं आता वे अवसादित होने लगते हैं, शिकायतों से भर जाते हैं। "मुझे पूछा नहीं, मेरे से बात नहीं की, फोन नहीं किया, मेरा हाल नहीं जाना, मुझे बताया नहीं, मुझसे क्यों नहीं पूछा, मुझसे मिले नहीं इत्यादि। पहल कौन करें? आज इंसान को इंसान से बात करने के लिए, मिलने के लिए, फोन करने के लिए सोचना पड़ता है। कहीं व्यस्त हुआ तो? सो रहा हो तो? उसे ठीक नहीं लगा तो? किसी आवश्यक कार्य में लगा हुआ हो तो? घरवालों, बच्चों के साथ सुख मय क्षणों में हो तो? आदि। यही 'तो' उन्हें उलझनों से भर देता है। न हम दूसरों से बात करने की पहल करते हैं और न दूसरा हमसे। ऐसे में अकेलापन वह अमावस की रात जिसकी सहर नहीं। 

अपनी इन तमाम समस्याओं के समाधान हमें स्वयं ही तलाशने होंगे। अपने अकेलेपन को दूर करने के नायाब तरीके इज़ाद करने होंगे। अब करते यूँ हैं कि अपने आप से प्रेम करके देखते हैं, अपने, अपनों से प्रेम करते हैं। व्हाट्सअप और फेसबुक जैसे तमाम सोशयल साइट्स पर अकेलापन बाँटने से अच्छा स्वयं में प्रसन्न रहना सीख लेते हैं। कभी बेझिझक मित्रों से फोन कर लेते हैं, मिले, बैठे, बतियाएं, घूमें, बारिश में भीगें, धूप में फिरें, आकाश निहारें, खूब चलें, अवसर मिलते ही पार्क में टहल आएं, जो मन में आये वो कर लेते हैं। अपरिचित लोगों से बात करके भी देख लेते हैं। हर वो काम कर गुजरते हैं जिसे करने में हमें संकोच होता है, घबराहट होती है और डर लगता है। अंततः अपने आपको खुश रखना हमारी स्वयं की जिम्मेदारी है। इसके लिए हम दूसरे से उम्मीद क्यों रखें भला।   

गीतकार ने अकेलेपन को जिंदादिली से जीने वालों के लिए ही ये नज़्म लिखी है। "हम भी अकेले तुम भी अकेले / मजा आ रहा है / कसम से " 

वे जो प्रेम करना जानते हैं, स्वयं से, दूसरों से. देश से और वे जो इस फन से अपरिचित, अनजान, अछूते बने रह कर कटुताएं, दुर्भावनाएं, नकारात्मकता फैलाने की कोशिश करते रहतें हैं उन सभी के जीवन में ढेर प्रेम बरसे, घनघोर सुकून बरसे। सभी खुश रहें, आबाद रहें। दुआ !!

  

Monday, February 3, 2020

लड़की कब समझेगी


अभी वह अपने बचपन में अठखेलियां करती है। बेखबर है दुनिया के रंग -ढंग से। खुश है। खेल रही है अपने मेमने के साथ। प्यारे मेमने को वह सोमू कहती है। दे रही है उसे अपना सम्पूर्ण स्नेह और प्रेम। वह करती है सोमू पर अथाह विश्वास। उसकी हर कलाबाजी पर लड़की भरती है किलकारी और प्रसन्न रहती है। दोनों एक दूसरे की खुशी का रखते हैं पूरा ध्यान। 

जीवन लंबा है। मेमना बड़ा हो जाएगा। वह सीख जाएगा अन्य साथियों के साथं दौड़ना, कूदना, खाना और अपने मन मुताबिक जीना। तब उसे जरुरत नहीं होगी लड़की के स्नेह और प्रेम की। बचपने को पीछे धकेल कर लड़की भी बड़ी होगी। संसार के रीति -रिवाज़ों को अपनाती संगठित होती जाएगी। गांभीर्य का गोटा लगी हुई जिम्मेदारियों का दुपट्टा ओढ़ने लगेगी। हर लड़की के पास होता है प्रेम, स्नेह और विश्वास का अद्भुत खजाना। अपने उसी हुनर को दिखाती हुई वह दूसरों की खुशी के लिए अलाव सी जलती है। रौशन करती है उनका जीवन। लड़की को अपने लिए भी जीना कभी तो आएगा।

लंबे जीवन में होम होते हुए अलाव की आंच कम होने लगेगी। रीतते हुए वह खामोशियों से भरती जाएगी। करने लगेगी फिर से प्रेम भरे दिनों का इंतज़ार।

प्रेम भरे दिन तब आएंगे जब वह करेगी अपने आप से प्रेम। जिसमें एकांत उसका पक्का साथी होगा रुमानियत से कसमसाता हुआ। तब हर लड़की को अपने लिए भी जीना आ जाएगा। 

Thursday, January 23, 2020

वसंत की आहट


जब फागुन सुस्ताने लगेगा तो चैत मुस्काने लग जाएगा। तब पतझड़ सड़क पर बहार बनकर खेलेगा। सुनहरी, सूखी पत्तियों से पार्क और सड़क पटने लगेगी। उन पर चलने से चरमराहट का स्वर दूर -दूर तक गुंजित होगा। प्रकृति न जाने कितने ही रूपों में संगीत बिखेरती है। कभी हवा की सांय - सांय, कभी पत्तों की खड़बड़ाहट। पेड़ों की सनसनाहट, नदियों की कलकलाहट। झींगुरों की झनझनाहट, चिड़ियों की चहचहाहट आदि। पतझड़ के बाद नई कोपले यौवन की अंगड़ाई लेकर फूल बनने को बेकरार रहती है। उसके कुछ समय बाद सारी कायनात फूलों, वनस्पतियों की भीनी -भीनी खुश्बू से महमहा उठेगी। पहाड़ तुम सुंदर हो। जानते हो न मैं क्या कह रही हूँ।"

"जानता हूँ "

"तब "

"तब चलेंगे न दूर पहाड़ों की यात्रा पर" वह हमेशा की तरह हंस दिया और दोनों के बीच का जीवन वसंत खिल उठा। एक बार फिर दोनों उन्ही रास्तों पर... 

Monday, September 2, 2019

छोडो कल की बातें

पता नहीं ये लड़की पास होगी भी कि नहीं? 

कौन लड़की?

मेरी बेटी। 

हो जाएगी। क्यों?

मैं इसे हमेशा दोस्तों के साथ घूमते और मोबाइल टटोलते हुए ही देखतीं हूँ। 

फिर भी इन लोगों के नंबर देखो नब्बे , नियानब्बे प्रतिशत आ जाते हैं। 

सच्ची। पढ़ते हुए ये कभी दीखते नहीं। 

पढ़ते हुए तो हम दीखते थे। हाथों पर, मुंह पर, कपड़ों पर सब जगह स्याही लगी रहती थी। न टीवी, न इंटरनेट, न मोबाईल। करने के लिए रह ही क्या जाता था। बस पढ़ना। इस बात पर दोनों सहेलियां खिलखिलायीं। अपने समय को सराहती हुई वे वर्तमान को आश्चर्य से देख रहीं थीं। आने वाले समय के प्रति अटकलें लगाने लगीं। 

Tuesday, July 16, 2019

कभी खामोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे

' ये क्या लिख भेजा ?'

' आपने क्या माँगा था?' 

'यात्रा वृत्तांत के लिए कहा था।'

'हम्म '

' हम्म नहीं। यात्रा वृत्तांत भेजिए।'

' इस बार कहानी चला लीजिए।'

'बिलकुल नहीं।'

'लेकिन सभी के जीवन में हर दिन जो एक नई कहानी खुद ब खुद बन जाती है। उसका क्या। '

'बेकार बातें न करें। यात्रा वृत्तांत भेजिए ,मैं कोम्प्रोमाईज़ नहीं करता।'

'औरत करती है हरदम, कोम्प्रोमाईज़, समझौता। औरत का जीवन, बाहर -भीतर सब तरफ कोम्प्रोमाईज़।'

'फिर शुरू। वही बेढंगा राग। वही फ़लसफ़ा, हुंह। ठीक है इस बार कोम्प्रोमाईज़ करता हूँ। कहानी ठीक है। '

'हम्म...' 



Wednesday, July 10, 2019

इस जीवन का यही है रंग रूप


कई बार हम चाहते कुछ और हैं, हो कुछ और जाता है। मैं जाना कहीं और चाहती हूँ पहुँच कहीं और जाती हूँ। लिखना कुछ चाहती हूँ लिख कुछ और जाती हूँ।

खूब बोलना चाहती हूँ और खामोश रह जाती हूँ। जब खामोश रहना चाहती हूँ तब बेवजह बकबका देती हूँ। 

सामाजिक हलचलों में शिरकत करना चाहती हूँ तब उदासीनता की कई वजहें खुद ब खुद बन जातीं हैं। दुनियादारी से दूर रहना चाहती हूँ और खूब सामाजिक कार्यों में उलझ जाती हूँ। 

पता नहीं मैं क्या चाहती हूँ? और ये ऊपरवाला क्या करवा लेता है मुझसे। होता सब अच्छा ही है फिर भी - या रब! जैसा मैं चाहती हूँ वैसा कब होगा?

Monday, July 31, 2017

कलयुग की भग्वद गीता ( व्हाट्सऐप से प्राप्त ज्ञान )


हे पार्थ,  ||  तुम पिछले मेसेज का पश्चाताप मत करो ||  || तुम अगले मेसेज की चिंता भी मत करो ||  || बस अपने करंट मेसेज से ही प्रसन्न रहो ||  

|| तुम जब नहीं थे, तब भी ये मेसेजो का चलन रहा था ||  || तुम जब नहीं होगे, तब भी ये मेसेजो का चलन चलता रहेगा ||  जो मेसेज आज तुम्हारा है, कल किसी और का था ||  वो कल किसी और का होगा ||  तुम इसे अपना समझ कर मगन हो रहे हो ||  यही तुम्हारे समस्त दुखों का कारण है ||  

बहुत बढ़िया   लाइक   धन्यवाद  जैसे शब्द अपने मन से निकाल दो || निष्काम भाव से मैसेज करो..फिर देखो तुम इस व्हाट्सऐप रूपि भवसागर में रहते हुए भी इस के समस्त कुप्रभावों से दूर रह कर स्वर्ग लोक को प्राप्त होगे  ||  राधे -राधे। 

जन्म लिया है तो सिर्फ साँसे मत लीजिये, जीने का शौक भी रखिये...कुछ रिश्ते भगवान बनाता है.... और कुछ रिश्ते whatsapp .



ॐ शांति शांति शांति:
॥शुभम् भवतु॥




Thursday, March 23, 2017

तेरी है ज़मीं तेरा आसमान


कहने वाले कहते हैं ईश्वर को जहाँ देखो वहीं दीखते हैं। बस मन में श्रद्धा होनी चाहिए। शायद वो सभी महान श्रद्धालु होते हैं जिन्हें देवताओं के सर्वत्र दर्शन होतें हैं। सोसाइटी के बाहर पेड़ों के नीचे, मंदिरों के प्रांगण में या मंदिरों के आस -पास के पेड़ों पर ऐसे दरख़्त देवता बखूबी डेरा जमाये रखते हैं। बस अंतर इतना होता है कि यदि वे घर या मंदिर के भीतर विराजमान होते तो वहां इनका पूरा सत्कार होता। स्नान -ध्यान, धूप -बत्ती, भोग -प्रसाद आदि से।

यहाँ सड़क पर लगे पेड़ों के नीचे इन्हें कोई नहीं पूछता। यहाँ तक की कोई दो घड़ी रुक कर सर तक नहीं झुकाता। जुलम !! केवल स्थान बदल जाने से, सत्ता बदलने से, कुर्सी बदलने से इतना बड़ा अंतर ?  

सोचती हूँ पुराने हो जाने पर या जरा सा भी खंडित हो जाने से यदि देवताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है फिर इंसानों की क्या क़दर ? बुज़ुर्ग हुए, पुराने हुए, बीमार हुए.... सब बाहर। 

एक बड़ा सवाल ये भी है कि इस टाईप के महान भक्तों के पास यदि इन देवताओं के लिए अपने घर में जगह नहीं रह जाती है तो वो इन्हें कूड़े में क्यों नहीं फेंक देते? पेड़ों के नीचे या मंदिरों में क्यों बैठा जाते हैं ? क्या दिल में कोई चोर होता होगा ? शायद गलत कर रहे हैं ? या मन के किसी कोने में कुंठा होती होगी ? या शगुन -अपशगुन का भय ?

क्या भगवान् इस बात के लिए इन्हें माफ़ कर देते होंगे कि शुक्र है कमसकम पेड़ के नीचे तो बैठा गए कूड़े में नहीं फेंका ? हमेशा की तरह मेरे अनुत्तरित प्रश्न...