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Tuesday, June 23, 2026

जिजीविषा ( बॉस्को जिंदादिली का एक नाम )

 

8 जून 2012 को एक छोटी सी टोकरी में बैठ कर वह मासूम आँखों वाला प्यारा, नन्हा मेहमान हमारे घर आया। तब वह एक सप्ताह का था। वैसे उसका जन्म 29 अप्रैल को हुआ। हमारी एकमात्र बिटिया को जब साथी की जरूरत महसूस हुई तब हमने उसे कुछ ऐसे बहलाया। वह नादान भी अति आनंदित होकर बहल गई। वह छोटा भाई था इसलिए बड़ी बहन की डांट, फटकार, स्नेह, प्रेम, धमाल सब उसके हिस्से में आया। घर गुलज़ार हो गया। उसका नामकरण हुआ तो नाम पड़ा बॉस्को। 

वक्त के साथ जितना बॉस्को शैतानी करता उतना ही सबका दुलारा बनता गया। सुबह और शाम को घूमते हुए घर ही नहीं सोसाइटी भर के बड़े, बच्चे सभी उसे सहलाये बगैर आगे नहीं बढ़ते हैं। शांत, प्यारा, आज्ञाकारी, सुन्दर बोस्को। 

बॉस्को का डॉक्टर के पास जाना अमूमन नहीं होता है। वर्ष में केवल एक बार जाता है वो भी रेबीज और डिस्टेंपर का इंजेक्शन लगवाने। या फिर खून की जांच आदि करवाने। घर का खाना वह आनंद पूर्वक खाता है। न तो उसे डॉग फूड की आदत डाली गई न उसने कभी पसंद किया। पहले चिकन और चावल खाता था। बाद में १० वर्ष का होने पर डॉक्टर ने मना कर दिया कहा - प्रोटीन कम देना होगा। चिकन थोड़ा कम खिलाइए। यानि उसे शाकाहारी बनना होगा। परीक्षा थी जिसने कभी सब्जियां खाई ही नहीं अब खाएगा क्या? कहीं घूमने जाने पर उसे दो -दो दिन भूखा रहना मंजूर था किन्तु चिकन चावल के न मिलने पर कुछ और कतई नहीं खाता था। रोचक बात यह थी कि इससे न उसकी ऊर्जा में फर्क पड़ता था और न ही वह किसी तरह की नाराजगी जाहिर करता था। उछल -कूद बराबर बनी रहती।  
शाकाहारी बनाने की तैयारी में अगली सुबह जब उसे सीताफल, गाजर आदि के साथ चावल दिए गए उसने झटपट, बिना किसी परेशानी के ऐसे भोजन किया जैसे रोज यही खाता होगा। क्या उसे अंतर्बोध हो गया था? क्या जानवर इतने समझदार होते है? कि वे जानते हैं उनके लिए क्या अच्छा है क्या बुरा? हैरानी और संतोष से दिल भीग गया। उस दिन से बॉस्को अचानक शाकाहारी हो गया किन्तु हमेशा उछलता -कूदता स्वस्थ रहा। 

बॉस्को लाह्सा एप्सो है। 14 वर्ष से अब तक बेहद स्वस्थ, सुन्दर, समझदार एवं सबको मोहित करने वाला शांतिप्रिय जीव रहा है। पिछले महीने सहसा एक दिन उसे ज्वर आया। हम उसे घर के पास बने 'वैदिक क्लीनिक' पर ले गए। ड्रिप लगी और रक्त की जांच के लिए उसका रक्त लिया गया। अगले दिन जब परिणाम आया तो उसे टिक फीवर था लेकिन बाकि रक्त की रिपोर्ट एकदम बढ़िया। उसकी किडनी, लीवर आदि सब कुछ बच्चों जैसा स्वस्थ। डॉक्टर उससे बेहद खुश रहते हैं।

चार दिन बाद मुझे फिर क्लीनिक जाना पड़ा क्यूंकि बॉस्को मुंह से बहुत ज्यादा लार टपका रहा था। डॉक्टर ने उसका मुंह खोल कर देखा तो नीचे वाले जबड़े पर करीब डेढ़ इंच का ट्यूमर। सब हैरान...कब बन गया इतना बड़ा? यह कभी दर्द से चिल्लाया क्यों नहीं? खाना कैसे खा रहा था? कई अनुत्तरित प्रश्न जेहन में उठने लगे। अब? डॉक्टर के अनुसार - मुंह के ट्यूमर अक्सर कैंसर होते हैं। बहरहाल ट्यूमर का सिरिंज सैंपल लेकर जांच के लिए भेज दिया गया। आठ दिन के बाद परिणाम सुखद था। ट्यूमर नॉन कैंसर वाला निकला। (बाद में बायोप्सी में माइल्ड, फर्स्ट ग्रेड का कैंसर था)

दिल्ली के अन्य वेटनेरी डॉक्टर के पास जाने के अच्छे अनुभव (मित्रों आदि के मिलेजुले निजी अनुभव) मेरे पास नहीं हैं। ऊंची दुकान...की तर्ज पर छोटी सी परेशानी के लिए भी रक्त जांच, एक्सरे आदि अन्य जांच के नाम पर बड़े बिल बना देना साधारण बात होती है। पिछले कुछ वर्षों से हम लोग रेबीज का टीका लगवाने या अन्य (deworming) जरुरत होने पर 'वैदिक क्लीनिक के कुशल, एवं सौम्य सर्जन रवींद्र वर्मा' के पास जाते हैं। उनका जीव प्रेम कमाल का है फिर चाहे वह पंछी, खरगोश हो या फिर कुत्ते। बिना किसी दिखावे के सहज -सरल डॉक्टर रविंद्र अपने कार्य में निपुणता से लगे हुए हैं। हमें उनके ज्ञान, योग्यता और इलाज पर पूरा भरोसा है।   
बॉस्को को लेकर डॉक्टर थोड़ा असमंजस में थे कि इस उम्र में उसे एनेस्थीसिया देना कितना सही रहेगा? लेकिन मेरा मानना था वैसे भी ट्यूमर की वजह से वह दर्द में रहेगा। बाद में खाने में दिक्कत होने की वजह से कितने दिन चलेगा? इसलिए जो भी हो सर्जरी हो जानी चाहिए। हमने कंसेंट पर हस्ताक्षर कर दिए। 

किडनी और लीवर की अच्छी हालत देखते हुए उसे एनेस्थीसिया दिया गया। मैंने मन ही मन सोचा 'यदि अब यह कभी नहीं उठा तो?' आंखें नम हो गई किन्तु दिल ने कहा ये हमें इतनी जल्दी छोड़ कर नहीं जा सकता। और सर्जरी हो गई। करीब 45 मिनट के बाद डॉक्टर बाहर आए। "सब ठीक हो गया। अब इसे 2 घंटे में होश आ जाएगा फिर आप इसे घर ले जा सकते हैं।" सुकून की सांस लेना किसे कहते हैं हमें उस दिन मालूम हुआ। 

अपने कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने के बाद जब हम वापस आए तब तक बॉस्को होश में आकर हमारी राह देख रहा था। कुछ दस -बारह दिन थोड़ा ढीला रहा किन्तु खाते -पीते, टहलते सब बढ़िया हो गया। कमाल की बात यह थी कि आज तक हमने इसे न पहले और न बाद में कभी भी कराहते या दर्द से परेशान होते नहीं देखा और न ही खाना छोड़ते हुए। कहते हैं -कुत्ते अपना दर्द छुपाने में अति माहिर होते हैं। एक हम इंसान थोड़ा सा पीड़ा हुई नहीं कि कराहते हुए आंसुओं को रास्ता दे देते हैं। 
आज खाते - पीते, उछलते, कूदते बॉस्को एक स्वस्थ जीवन जी रहा है। मनुष्य का इलाज करना फिर आसान है वे बोल कर अपना दर्द बयां कर सकते हैं, अपनी तकलीफें बता सकते हैं। किन्तु बेजुबान जानवर? जानवरों के दर्द को उनके भावों को, उनके रोगों को समझ कर उनका निदान करना अत्यंत दुष्कर कार्य है। और इस दुष्कर कार्य को बखूबी अंजाम दे रहे हैं नेक एवं अपने क्षेत्र में पारंगत डॉक्टर (सर्जन) रविंद्र वर्मा।  

दिल से धन्यवाद डॉक्टर रविंद्र, बॉस्को को नवजीवन देने के लिए। 


Dr.Ravindra Kumar Verma 
Veterinary Consultant & Surgeon 
Vedic Pets Clinic and Surgery Centre
8, Gurudwara road, near Mother Dairy, Sector-1, Vaishali, 
Ghaziabad, Uttar Pradesh 201010, India
Mobile - 9289544101


Tuesday, August 20, 2019

दीदा सुनो ना कहने वाली (छाया अग्रवाल)

थोड़े से स्नेह का प्रतिदान  

उससे मैं कभी रूबरू नहीं हुई। कई वर्षों से फेस बुक की जान पहचान, शब्दों का आदान -प्रदान, कभी कभार फ़ोन पर बात चीत। अपनी खनकती, चहकती हुई आवाज में बहुत सी हंसी और खिलखिलाहटें समेटे, किस्से -कहानियां कहती वह जिंदादिल लड़की है छाया अग्रवाल। अकोला, महाराष्ट्र के अग्रवाल इंस्टिट्यूट की डायरेक्टर। इतनी कम उम्र में बहुत कुछ हासिल कर लेना क्या होता है इसके लिए कोई छाया को देखे। 

जीवन के जिस क्षेत्र में मैं काम करती हूँ वहां आये दिन कई तरह के व्यक्तित्व, उतनी ही जानकारियां, नए विचारों आदि से दो -चार होती हूँ। देखती हूँ सब कुछ होते हुए खुश रहना चंद लोगों को ही आता है। अमूमन हर तरफ निराशा, अवसाद, घुटन, परेशानियां, अनमनापन, शिकायतें, गलतफहमियां, टूटा भरोसा, लुप्त प्रेम और भी न जाने क्या -क्या देखने -सुनने को मिलता है। इसके विपरीत अपनी शारीरिक अपूर्णता को धता बताते हुए हरदम, हर पल जिंदादिली से जीने का जीवंत उदहारण है छाया अग्रवाल। 

पिछले करीब दस- बारह वर्षों का साथ है इस हंसती -मुस्काती छाया से। "जिओ तो मस्ती से जिओ, रो कर जिए तो क्या जिए" कहने वाली सदाबहार लड़की बी कॉम, एम् कॉम आदि करने वालों को किस तरह शिक्षित करती होगी? कैसे उसके इंस्टिट्यूट का परिणाम उत्तम, अतिउत्तम आता है? यह सब मुझे ढेरों हैरानी से भर देता है। कैसी परवरिश है ये, कैसा हौसला, कैसी जिजीविषा। इसका श्रेय वह झट अपने बड़े भ्राताश्री प्रोफेसर योगेंद्र अग्रवाल जी को देती है। जिन्होंने उसे हमेशा स्वभिमान से सर ऊंचा करके जीवन जीने की राह दिखाई, ऊंची शिक्षा के प्रति सजग किया है, शान से कुछ कर गुजरने का ज़ज़्बा दिया। 

अकोला की सड़कों पर वह हैंड मैनेज कार बिना किसी बाधा के सरपट दौड़ाती है। "दिदू मेरी बात सुनों न। दीदा वो..." कहती हुई इस सदाबहार लड़की के भीतर कितना कुछ है कहने, बताने के लिए। एक बात जो मुझ तक कभी नहीं पहुँचती वह होती हैं इसकी तकलीफें, इसकी निराशाएं। मैंने कहा - बेवकूफ, कोई तकलीफ हो तो वो भी साझा कर लिया कर। बहुत ताकत है मेरे इन कन्धों पर।' तो जोर से हंस कर कह देती है - "दीदा पहले एक बार फिर से कहो न, बेवकूफ। ये शब्द मुझे बहुत अच्छा लगता है। केवल आपके मुंह से हाँ, कोई और कहेगा तो उसकी खैर नहीं फिर, हाँ नी तो। दीदा मैं आपके सामने हमेशा छोटी बच्ची ही बने रहना चाहती हूँ।" उसकी बिना ब्रेक की हंसी है थमती ही नहीं।

"अपना दुःख दर्द भी शेयर करना चाहिए छवि।" 

"अरे हट्टो दीदा, वो आपको सुनाने वाले बहुत मिलेंगे। कैसा है कि मुझसे आप पूछो - क्या किया, कितना किया, कैसे, कहाँ, कब..जीवन बहुत छोटा है और काम बहुत हैं।" तब मुझे वे तमाम लोग याद आते हैं जो ढेरों सुविधा संपन्न होने के बावजूद भी छोटी -छोटी बिना वजह की बातों, तकलीफों से भरे रहतें हैं। ऐसे व्यक्तियों से मिलने पर या उनका फ़ोन आते ही मन डूबने लगता है, न जाने आज कौन सी कहानी होगी, कैसे सांत्वना दूंगी। ये दुःख- सुख सुनना संक्रामक रोग से लगते हैं मुझे। जैसा देखो -सुनो वैसा ही मन हो जाता है। 

अपने दोनों पैरों को बैसाखी के सहारे टिका कर जग जीतने का ज़ज़्बा रखने वाली यह लड़की किसी जुझारू सैनिक से कम नहीं। जो संसार के इस संग्राम में कुछ कर गुजरने का, कई ज़िंदगियों में बदलाव ला देने का दमखम रखती है। छाया तू ऊपरवाले का चमत्कार है, एक दुआ है। तू हरदम इसी तरह खिलखिलाए, मुस्काए, दुआ और ढेर-ढेर स्नेह। 



Monday, January 9, 2017

ये हौसला कैसे झुके

आज दिल्ली के एक हैड पोस्ट ऑफिस जाना हुआ। वहां सीनियर ऑफिसर की कुर्सी के पीछे एक बड़ा सा बोर्ड लगा था, जिसमें 1983 से अब तक उस पोस्ट पर कार्य  कर चुके  करीब 37  अफसरों के  नाम अंकित थे।

कमाल की बात ये कि उन 37 नामों में एक भी महिला ऑफिसर का नाम नहीं था। ऐसा कैसे ?? उन अति चुस्त -दुरुस्त अफसर से बस पूछ ही लिया। मुझे वर्कोहॉलिक लोगों से मिलकर कर वैसे भी आनंद आ जाता है।

 " ऑफिसर,...इतने वर्षों में एक भी महिला इस पोस्ट  तक कैसे नहीं पहुँच सकी ? पहुँचने  नही दीं गयीं ? या फिर वे  ही पहुँचना ही नहीं चाहतीं ? " वे ठहाका लगा कर हंस दिए।

"अब इसका उत्तर भी तो दे डालिये। जेंविन उत्तर। " मेरी उत्सुकता यथावत थी।

" सही बात तो ये है कि  महिलाएं केवल असिस्टेंट पोस्ट तक पहुँचने के बाद ही रुक जातीं हैं।  शायद इस कुर्सी की जिम्मेदारियों से  घबरा जातीं हैं। बहुत काम होता है इस पद पर ,देर सबेर होना आम बात है। कई ब्रांचेज लिंक होतीं हैं। सब को देखना होता है। और भी बहुत कुछ। "

" पर क्या इसके लिए उन्हें ऑफर की जाती है ?"

" बिलकुल , इसमें कोई भेद भाव नहीं होता , आप खामख्वाह शक़ मत करिये। काफ़ी ठंडी हो रही है , पी लीजिये अब। " वे फिर हंस दिए।

सोचतीं हूँ यदि उनकी बात सच है तो ??   सारे घर, रिश्ते, रिश्तेदारों आदि जैसी कठिन जिम्मेदारियां  निभाने के बाद क्या महिलाएं सच में  उस हेड ऑफीसर के पद  की जिम्मेदारी से घबरा जातीं होंगी ? या फिर घर - रिश्तों आदि की अन्य  जिम्मेदारियां आड़े आ जातीं  होंगी ?

या फिर..... सवालों की फेहरिस्त... का कोई अंत नहीं...


Friday, December 16, 2016

खुश रहे तू सदा ये दुआ है मेरी


सेन्फ्रेंसिस्को से दिल्ली वापसी थी। चाइना सदर्न की फ्लाइट। उस प्यारी सी बालिका ने मिक्की माउस वाले हेयर बैंड से अपने छितरे हुए बालों को पीछे की तरफ समेट रखा था। अपनी स्मार्टनेस को बनाये रखते हुए उसके डैड का चेहरा उतरा हुआ था। मार्डन बनने की पूरी कोशिश करती हुयी मॉम का चेहरा तमतमाया हुआ। बहरहाल वजह जो भी हो, बालिका खुश थी। कभी कहती। 

"मॉम आपने दद्दू के लिए वो बी पी नापने वाला इंस्ट्रूमेंट क्यों नहीं लिया? हाऊ बैड।"

"..." 

"डैड इवन आपने भी दद्दू के लिए वो इवनिंग गाउन नहीं लिया। लेना चाहिए था। दद्दू कितने खुश होते"

"इट वाज टू एक्सपेंसिव...चिल बेबी."

"हाउ मीन डैड, मैं दद्दू को बताउंगी वो पिज़्ज़ा कितना वाव था, नैए..हमें उनके लिए लाना चाहिए था, हाउ सैड..."

"चुप बैठो शैंकी शट यॉर माउथ....ओके...एनफ ऑफ़ यू ..." मार्डेन माँ ने घुड़का। 

देखा जाय तो बेटा -बहु दद्दू के लिए कुछ लाये हों या नहीं किन्तु पोती ढेर सारी बातें जरूर लायी थी। घर पहुँचने पर स्नेह से भरे और इंतज़ार करते दादा जी से कौन कैसे मिलेगा? उनसे मिलकर किसको कितनी खुशी होगी? मिलियन डॉलर का सवाल..." 


  

Tuesday, August 16, 2016

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना ( Sharmila Chanu Irom )


'उनके लोग उन्हें स्वीकार नहीं कर रहे हैं..' अखबार में खबर की हेडलाइन्स थी। कौन हैं वे लोग? जिन्हें शर्मीला इरोम के 'लोग' कहा गया ? 

इरोम की आज की स्तिथी को देखते हुए कई ऐसे सवाल दिमाग में तैरने लगे जिनका न सिरा न अंत। प्रतीक बन कर रह जाना शायद उन्हें अब मंजूर नहीं। उन्होंने क्या सोच कर उपवास शुरू किया होगा और अंत में हुआ क्या? कोई भी काम यदि 'बाई चॉइस शुरू करो तो क्या अंजाम ऐसा होता है ? गाईड फिल्म का नायक, सन्यासी राजू याद आने लगा। मन में उठते सवालों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है।

क्या इरोम ने तब सोचा होगा उनकी इस तपस्या का यह सिला मिलेगा ? ये संकल्प स्वइच्छा से शुरू किया गया था जिसमें उनके निजी स्वार्थ की गुंजायश तक नहीं। फिर ? 

अपनी सारी जवानी की आहुति अस्पताल के बंद कमरे में होम करके अट्ठाइस वर्ष की शर्मीला चौवालीस वर्ष की इरोम बन गईं। क्या सोलह वर्ष तक निराहार रह कर उन्हें बेहद आनंद की प्राप्ति हुयी होगी ? कुछ परमानंद टाईप की ?

अपना उपवास तोड़कर यदि उन्होंने खुले आकाश के नीचे से अपनी ( AFSPA ) अहिंसात्मक लड़ाई ज़ारी रखने की सोची तो इसमें गलत क्या हो गया ? विरोध के स्वर क्यों उठे ? मजबूत इरादों वाली इरोम ने जब शुरू करते समय किसी से नहीं पूछा तो अब क्यों पूछना था ? वे नाराज होने वाले लोग कहाँ से प्रकट हो गए ? सोलह वर्ष उन्होंने जो किया वो सामने है अब जो भी करेंगी वो भी करने दो। गलत कुछ नहीं किया। फिर पहले से ही विरोध क्यों ? यदि वे खुले आकाश के नीचे विचरते हुए या कोई अन्य रास्ता अपनाते हुए अपने मकसद को पूरा करने का प्रयास करना चाहतीं हैं तो इसमें उनके सो कॉल्ड लोगों को परेशानी क्या है ? 

अपने इन तमाम वर्षों के दौरान 'राजू गाईड' की तरह वे शहीद हो जातीं तो क्या होता? वे पुण्यात्मा कहलातीं ? उनका नाम अमर हो जाता? देश -विदेश के सारे अखबार उनके इस बलिदान से उनकी चर्चा और प्रशंसा से भरे होते ? उनकी प्रतिमाएं लगतीं, स्कूल- कॉलेजों के पाठ्यक्रम में पढाईं जातीं ? कितने ही उच्च पुरस्कारों की झड़ी लग जाती ?  

इस देश में इंसान की कदर मरणोपरांत है। हमने जिन महान लोगों को उनके बुलंदियों और गुमनामी के दौर में देखा भी नहीं होता है उनके बारे में जानते तक नहीं थे। इस संसार से जाते ही उन्हें जानने लागतें हैं। उनके लिए गुमनामी, कष्टों और अभावों से भरा जीवन जीने से अच्छा मरना लाजवाब होता है....या मरना ही यादगार हो जाता है। रोबिन शर्मा ने कहा - 'Who will cry when you die ' ये चाहे किसी भी सन्दर्भ में कहा हो किन्तु इसका लिट्रल अर्थ लेते हैं तो ?

इरोम मात्र एक बूंद शहद से अपना सोलह वर्षीय लंबा उपवास तोड़ते हुए संवेदित हो गईं, भावुक हो गई। उस वक्त उनके दिमाग में क्या विचार आया होगा? या फिर वे इंतज़ार में थीं कि ये सब उनकी माँ के स्नेहिल हाथों से होगा ? उस वक्त वहां पर माँ क्यों नहीं थीं ? वहां पर एक अजीब सा शोर करता सन्नाटा क्यों पसरा हुआ था? बहरहाल... 

क्या प्रेम बीच में आते ही जीवन का गणित सब गड़बड़ा जाता है ? बैजू -बावरा, हीर -राँझा, रोमियो -जूलियट, डेस्डिमोना आदि किसी भी प्रसंग को देखें। कुछ और पीछे जाएँ तो राधा, मीरा आदि को देखें। तो साबित हुआ। प्रेम = दुःख, व्यथा, त्याग, लांछन, बलिदान, अवहेलना, बैर, धोखा, हत्याएं, फरेब....ऐसा?? तभी कहा गया होगा। ' फॉल इन लव'। यदि प्रेम में ये सब भाव नहीं होते तो प्रेम दिव्यानुभूति होता, भरोसा, सकारात्मकता, मधुर अहसास से लबरेज़ होता। तब उसे 'राइज इन लव' कह देते। नहीं क्या ? 

विरोध में उठी आवाजों से कहना था - सोलह वर्ष तक जो अहिंसात्मक क्रांति की मशाल इरोम ने जलाए रखी आगे अब तुम संभाल लो। सोलह वर्ष न सही सोलह दिन...सोलह सप्ताह...कुछ समय तुम भी कर लो। कोई नहीं आयेगा, आखिर कष्ट किसे पसंद? सब इरोम करे, वे सिर्फ बातें बनायें? सारे निराशावादी, अहमक, बुड़बक लोग। और वो क्या कहतें हैं, विदूषक और चिरकुट भी...बेकार टाइप के लोग..... 

उनकी लिखी कविता की चंद पंक्तियाँ। 

मैं अमन की खुशबू फैलाऊंगी / अपनी जन्मभूमि में / जो आने वाले किसी समय में / फैल जाएगी समूची पृथ्वी पर 



 









Thursday, May 12, 2016

वो हमसफ़र था मगर उससे हमनवाई न थी

पिछले सप्ताह एक स्नेह भरा, ममतापूर्ण आवाज वाला फोन आया। उन्होंने बिना किसी भूमिका के सीधा -सपाट सवाल दाग दिया। 

"महिलाओं पर अंक निकाल रही हूँ। एक कहानी भेज दोगी?"

"जी भेज दूंगी। कथ्य क्या हो?"

"पति -पत्नी के रिश्ते पर लिख भेजो।"

"जी"

"झूठ मत लिखना। सच्ची का रिश्ता, जैसा चलता आया है और चल रहा है। सर्वे कहता है संसार में भारतीय महिलाएं सब से ज्यादा अवसादित महिलाएं हैं। वही बताओ दुनिया को..क्यों हैं न ऐसा?"

"ओहो तो आप को खतरनाक टाईप की कहानी चाहिए।"

"हाँ...बिलकुल।" वह ठठाकर हंस दीं। 

"है हिम्मत, निडर होकर लिख सकोगी? सच्चाई?"

"कैसे होगा? मैं भुक्तभोगी नहीं, अनुभवहीन, कहानी में पंच कैसे आएगा?"

"बेकार बात..अपने आस-पास देखती नहीं हो क्या? दुनिया में क्या चल रहा है?" एक जबरदस्त घुड़की मिली। 

"..... " बचपन से आज तक मुझे कभी किसी ने घुड़का नहीं। अब इस उम्र में...? खुशी जैसी हुई। उन पर प्यार जैसा भी आने लगा। जीवन की कैसी विडम्बना है। कई रिश्ते सँभालने के बावजूद भी इंसान जरा सा अपनापन जताए जाने पर कैसा भावुक हो जाता है। 

"क्या हुआ...चुप क्यों हो गईं हो? लिखो...खतरनाक कहानी। फिर फोन करूंगी।"

सोचा कैसे लिखूंगी? माना प्रकाशित हो गई तो फिर मुझे फांसी की सजा तय है। और बचाने वाला कोई आएगा नहीं। फिर भी सेमि खतरनाक जैसी लिख दूंगी। कोई नी..ज़िंदगी हर कदम एक नई जंग है।