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Thursday, May 20, 2021

प्रकृति के चितेरे, हिंदी जगत के 'वर्ड्सवर्थ' ( सुमित्रानंदन पंत जन्मदिवस - 20 मई )

 

"झरो, झरो, झरो, जंगम जग प्रांगण में,
जीवन संघर्षण में, नव युग परिवर्तन में
मन के पीले पत्तो! झरो, झरो, झरो, "

कहने वाले छायावादी युग के स्तंभ सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 में अल्मोड़ा जिले (उत्तराखंड ) के कौसानी नामक एक सुरम्य गाँव में हुआ। कौसानी के सम्पूर्ण परिवेश में मातृहीन बालक पंत को सदैव माँ की ममता और उसका प्रेम प्राप्त होता रहा।

"माँ से बढ़कर रही धात्रि, तू बचपन में मेरे हित।
धात्रि-कथा-रूपक भर तूने किया जनकबन पोषण / 
मातृहीन बालक के सिर पर वरदहस्त धर गोपन।"

प्रकृति के अद्भुत सौंदर्य को निहारते व महसूस करते हुए उन्होंने बाल्यकाल से ही अपनी काव्य साधना शुरू की। बाद में तीर्थराज प्रयाग पन्त जी की साहित्य-साधना का केन्द्र बना। स्वामी विवेकानंद एवं महर्षि अरविन्द आदि से प्रभावित होने से उनकी बाद की रचनाओं में अध्यात्मवाद और मानवतावाद के दर्शन होते है।

दिशि-दिशि में प्रेम-प्रभा प्रसार / हर भेद-भाव का अंधकार 
मैं खोल सकूँ चिर मुँदे, नाथ! / मानव के उर के स्‍वर्ग-द्वार!"

अपने मनोरम बिम्बों से प्रेम रच देने का मानो उन्हें आशीर्वाद प्राप्त था। जैसे वे अपने आप को संवारने में उत्साह दर्शाते रहे वैसे ही अपनी रचनाओं के बाह्य और आंतरिक दोनों पक्षों को श्रृंगारित करते हैं। 

"सुन्दर हैं विहग, सुमन सुन्दर,
मानव! तुम सबसे सुन्दरतम "

सुमित्रानंदन पंत सौंदर्य और भाव के कवि है। उनको प्रकृति, झरने, फूलों, बादलों का कवि कहा जाता है। संवेदनशील व कोमल स्वभाव के चलते पंत जी कभी भी अपने भावों के चित्रण में कठोरता व उग्रता नहीं ला सके। अपनी कलम से मृदु भावों और अत्यंत मनोहारी चित्रण को उकेरते हुए वे प्रेम, शीतलता, मधुरता की गंगा बहाते रहे। इसी के रहते वे सुकुमार कवि कहलाये। अपनी इस सुकुमारता के साथ वे हमेशा अमर रहेंगे। 

"आः मधु-प्रभात!--जग के तम में / भरती चेतना अमर प्रकाश  
मुरझाए मानस-मुकुलों में / पाती नव मानवता विकास "

​नमन ​!

Tuesday, February 16, 2021

आओ प्रिय ऋतुराज वसंत ( सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जन्मदिवस - 16 फरवरी )


 नव गति, नव लय, ताल-छंद नव​/नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को​/नव पर, नव स्वर दे​​! 
वर दे, वीणावादिनि वर दे! ('निराला')

छह ऋतुओं में वसंत सबसे खूबसूरत व रूमानी ऋतू है। शीत ऋतू को विदा करती व ग्रीष्म ऋतू का स्वागतकरती मदमस्त ऋतू। यह फरवरी - मार्च में (फाल्गुन -चैत्र) अपना सौंदर्य बिखेरती है। हिन्दू पंचांग वर्ष का अंत (मध्य फाल्गुन) व प्रारंभ (मध्य चैत्र) दोनों इसी ऋतू में संपन्न होते हैं। यौवन की स्फूर्ति, उमंग, ताज़गी व मदहोशी से भरी यह नवयौवना सी खूबसूरत ऋतू है। नव जीवन, नव निर्माण, नव चेतना, नवांकुरों से भरपूर आशा एवं उमंगों भरी ऋतू। इन्हीं विषेशताओं के चलते वसंत सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ 'ऋतुराज' कहलाता है।  

कोयल पंचम स्वर में कुहकी तो वसंत राग बना और गीत बने। इसी ऋतू में आम में बौर आने लगते है, गेंहू में बालिया लहलहाने लगती है, सरसों के पीले फूलों से धरा मुस्काने लगती है। सूर्य देवता के संजीदा होते ही मनोहारी, रूमानी, मदमाती मस्ती से सराबोर होकर सभी झूमने -गाने लगते हैं। सारी कायनात रंगबिरंगी फूलों से झूमने लगती है तो वसंतोत्सव आ जाता है और आ जाता है रंग -बिरंगा मन को मोहने वाला होली का त्यौहार। पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल आदि में विद्या की देवी सरस्वती की उपासना (श्री पंचमी, वसंत पंचमी) करने की परंपरा है। 

पौराणिक कथाओं में वसंत को सौंदर्य व प्रेम के देवता - कामदेव का पुत्र बताया गया है। इनके प्रभाव से गोया इन दिनों प्रकृति व जन मानस उन्मादी हो जाते हैं। सदियों से वसंतोत्सव मनाये जाने के तथ्य मिलते रहे हैं। तब राज दरबार में, देवताओं के दरबार में, कृष्ण का गोपिओं संग प्रेम भरा रास हो हर तरफ उल्लास छाया रहता था। ("ऋतुओं में मैं वसंत हूँ" कृष्ण ने गीता में कहा) 

परिवर्तनशीलता प्रकृति का, जीवन का नियम है। 'जिस तरह कठोर शिशिर के बाद मनोहारी, प्यारा वसंत आ जाता है, उसी तरह कठोर दुःख के बाद सुख हर हाल आएगा यह तय होता है।' वसंत इसी संदेश को प्रस्तुत करता है।

ऋतुराज, बरसो झूम कर, इस धरा में तुम्हारा भरपूर स्वागत है। 

Monday, October 12, 2020

अपनी रचनाओं में हमेशा आबाद रहेंगे अद्भुत शब्द शिल्पी, निदा फ़ाज़ली ( जन्मदिन 12 अक्टूबर )

 कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता/तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो, जहाँ उमीद हो सकी वहाँ नहीं मिलता
मुक़्तदा हसन निदा फ़ाज़ली भारतीय हिंदी एवं उर्दू के उम्दा रचना कार हैं। उन्होंने कबीर दास, तुलसी, मीरा, सूरदास, इलियट , गोगोल, मीर, ग़ालिब, फ़रीद बाबा आदि को पढ़ते हुए और उनके फ़लसफ़े से प्रभावित होते हुए अपनी ज़िंदगी को संवारा।

उन्होंने इंसान के हर सुर को पकड़ कर अपनी नज़्मों में बखूबी उकेरा है। रुमानियत, खुशी, ग़म, इश्क़, मोहब्बत, भाईचारा, दोस्ती, भेद भाव, अवसरवादिता, मौक़ापरस्ती, जोश, जज़्बा आदि अनेक भावों पर उनकी कलम चली है। मानव मनोदशाओं को परखने वाले वे कमाल के कीमियाग़र रहे हैं।

"तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है / मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है।" ये फिल्मों के लिए लिखा उनका सबसे पहला गीत है जिसे उन्होंने फिल्म - रज़िया सुलतान' के लिए सन 1983 में लिखा था। उनके भीतर उमड़ने वाली संवेदनाओं और भावों ने उनसे बहुत लिखवाया, बेहतरीन लिखवाया :-  

1 - हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी / जिसको भी देखना हो कई बार देखना।

2 - कुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी ख़फा हैं, हर एक से अपनी भी तबियत नहीं मिलती / हँसते हुए चेहरों से है बाजार की ज़ीनत / रोने को यहाँ वैसे भी फुर्सत नहीं मिलती।

3 - सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो, सभी हैं भीड़ में, तुम भी निकल सको तो चलो / यही है ज़िंदगी, कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें, इन्ही खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो।

4 - होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है, इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है / हम लबों से कह न पाए, उनसे हाल -ए -दिल कभी, और वो समझे नहीं ये खामोशी क्या चीज है।

5 - अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम, हर वक्त का रोना तो बेकार का रोना है / आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को, आकाश की चादर है, धरती का बिछौना है।

6 - अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम हैं, रुख हवाओं का जिधर का उधर के हम हैं / चलते रहना है कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब, सोचते रहते हैं किस राह गुज़र के हम हैं।

7 - दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए, जब तक न सांस टूटे, जिए जाना चाहिए / अपनी तलाश अपनी नज़र अपना तजरबा, रस्ता हो चाहे साफ़ भटक जाना चाहिए।

8 - कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है, सबने इंसान न बनने की कसम खाई है /  इतनी खूँखार न थी पहले इबादतगाहें, ये अक़ीदे हैं या इंसान की तन्हाई है।

9 -बदला न अपने आपको जो थे वही रहे, मिलते रहे सभी से अजनबी रहे / दुनिया न जीत पाओ तो हारो न खुद को तुम, थोड़ी बहुत तो जे़हन में नाराज़गी रहे।

10- हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी / ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र, आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी।

Friday, July 31, 2020

आदर्श से यथार्थ की तरफ प्रेमचंद की वैचारिक यात्रा ( जन्मदिवस - 31 जुलाई )

"मुंशी जी आप विधाता तो नहीं थे लेखक थे। अपने किरदारों की किस्मत तो बदल सकते थे।"  गुलज़ार ने उनके शोषित, प्रताड़ित, पीड़ित जैसी समाज में फ़ैली कई कुरीतियों की चिंता करते हुए लेखन पर कहा है। 
उस दिन उपन्यास सम्राट, मुंशी प्रेमचंद की जन्मस्थली, वाराणसी के 'लमही' गांव में जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उनकी जन्मस्थली पर प्रवेश करते ही अभिभूत होना स्वाभाविक था।गोया मुंशी जी से साक्षात रूबरू होने लगे हों। यही वे पले -बढे, होंगे। यही रची होंगी उन्होंने वे महान, कालजयी रचनाएँ। हमारे लिए आह्लादित कर देने वाले वे अद्भुत पल थे। 
'यहाँ के अध्यक्ष सुरेश चंद्र दूबे जी के अलावा हमने नहीं देखा किसी और को यहाँ। अकेले वे ही सारा ध्यान रखतें हैं और प्रेमचंद की विरासत को संभाले रखने का प्रयास कर रहे हैं।' ऐसा आसपास के लोगों का कहना था। 
"कौन आएगा यहाँ, कोई न आया होगा / मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा।" कैफ़ भोपाली का ये शेर आज उनकी जनस्थली पर पसरे सन्नाटे पर सटीक बैठता है। 
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद को उनके जन्म दिवस पर मेरा श्रद्धानत नमन। 

Tuesday, July 28, 2020

नामवर सिंह एक तटस्थ व्यक्तित्व - (जन्मदिवस 28 जुलाई )

उस दिन इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स में (28 जुलाई 2016) नामवर जी का जन्मदिन मनाया गया था। तब उन्होंने अपने जीवन के 90 वर्ष पूरे किए थे। उन्हें देख कर और सुन कर अनुमान नहीं लगाया जा सकता था कि वे नब्बे की वयस में हैं। शानदार, भव्य व्यक्तित्व। न झुका हुआ न झूला हुआ। तना हुआ, सीधा, ठाड़ा, लंबा कद। नौजवानों को मात देती हुई अच्छी, पतली काया। चेहरे पर गरिमामय ज्ञान का तेज। मंच से घंटो बोलना कोई मुश्किल नहीं किंतु कम शब्दों में बहुत कुछ कह देने का हुनर उनके पास ही हो सकता था।

सबसे शानदार बात उनके व्यक्तित्व की जो थी, वह थी उनकी तटस्थता। मंच से बहुत से साहित्यकारों ने उनके बारे में अपने विचार रखे। कितना कुछ कहा जा रहा था। आदर से, श्रद्धा से, सम्मान एवं मधुरता से। किस्सों का अंत नहीं था। वे ध्यान से सब कुछ सुन रहे थे। उनके चेहरे की भाव -भंगिमाओं में रत्ती मात्र भी फर्क नहीं आता था। निर्विकार भाव से उनका अपनी प्रशंसा में कहे गए उद्बोधनों को सुनते रहना अभिभूत कर रहा था।

आज दूसरों को सुनने का धैर्य बहुत कम व्यक्तियों में है। सभी के पास अपने बारे में बोलने -बताने को बहुत कुछ होता है। अमूमन लोगों का धैर्य चूका हुआ है। जल्दी आवेश में आ जाने का गुणों में वृद्धि हुई है। किसी की जरा सी आलोचना कर दो, थोड़ा सा उनके हक़ में न बोलो फिर देखो रिश्ते किस तरह झट करवट बदलते हैं। अपने आप को सही साबित करने के लिए  घंटो बहसें होने लगतीं हैं। ऐसे में अब कोई कैसे रहें अविचलित और कैसे रखा जाए धैर्य। बहरहाल -

इसलिए उस दिन नामवर जी का अति धीर -गंभीर, सहज, सरल रूप देख कर मन आनंद से भर गया था। आज वे नहीं होते हुए भी अपने पाठकों, अपने चाहने वालों की यादों और अपनी कृतियों में बने हुए हैं और हरदम बने रहेंगे।

आज उनकी नामवर जी को श्रद्धा पूर्वक मेरा नमन रहेगा। (नामवर जी का जन्मदिन 1 मई को और उनका ऑफिशल जन्मदिन कागज़ों के आधार पर 28 जुलाई को मनाया जाता है - काशीनाथ सिंह उनके अनुज भ्राता के कथनानुसार)

Thursday, July 9, 2020

रोमांस की अद्भुत दुनिया रचने वाली - बार्बरा कार्टलैंड, (जन्मदिवस - 9 जुलाई )


बार्बरा कार्टलैंड से दसवीं कक्षा के इम्तिहान देने के बाद, छुट्टियों में 'मिल्स एंड बून' पढ़ते हुए रूबरू हुई। एम बी में लिखने वाले बहुत लेखक हैं। उनमें बार्बरा कार्टलैंड द्वारा लिखित उपन्यास मुझे बेहद पसंद थे। वे कमाल की रुमानियत परोस देतीं हैं। आंखों के आगे बेइंतहा खूबसूरत रोमांस चलचित्र सा घूमने लगता है। 

उन्हीं दिनों ज़हन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि बार्बरा के नायक की तरह एक प्रेमी होना चहिए -टॉल, डार्क एंड हैंडसम। हम लड़कियों ने हसीं सपने उन्हीं दिनों देखने शुरू किए थे। यदि बार्बरा नहीं मिलती तो हम जैसों का क्या बनता? विज्ञान की प्रयोगशाला में केंचुए, मेढक चीरते, वनस्पतियां बीनते और रासायनिक समीकरणों को सुलझाने में, रूखे -सूखे बने रहते हुए जीवन ख़ाक कर देते। रोमांस के उन खूबसूरत पलों ने हमें कुछ जीवित रख छोड़ा था। 

रोमांस की अद्भुत दुनिया रचने वाली बार्बरा 9 जुलाई 1901 में इंग्लैंड में पैदा हुईं। कई लोगों को प्रेम का पाठ पढ़ा कर 21 मई 2000 में अपनी निराली साज -सज्जा के साथ इस संसार से विदा हो गई। यूँ उनका मानना था कि मृत्यु जैसा कुछ नहीं होता। एक जीवन शक्ति, शरीर से बाहर निकल जाती है और शीघ्र ही उसे नया शरीर मिल जाता है। 

वे बोलतीं थीं, उनकी सेक्रेटरी टाइप करती थी। उन्होंने 23 पुस्तकें एक वर्ष में लिख कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। उनके पुत्र इयान मकोरकिडेल बताते हैं कि - "साल भर में उनके प्रसंशकों के करीब दस हज़ार पत्र आते थे। उन्हें पढ़ने के लिए एक अलग सेक्रेटरी थी। बार्बरा ने केवल एक उपन्यास लिखा जो सुखांत रोमांस के इतर, दुखांत था। उनके प्रसंशक इस बात से बेहद कुद्ध हो गए। टेलीग्राम, पत्र, फ़ोन कॉल आदि सब जगह से बार्बरा को उनके क्रोध का सामना करना पड़ा। वह जैसे कोई हादसा हुआ था। जब वह पुस्तक री प्रिंट हुई तब उसका अंत सुखद व रूमानी कर दिया गया।"

उनका कहना था -"बुजुर्ग व्यक्तियों को कुछ न कुछ करते रहना चाहिए अन्यथा वे बोर होकर जल्दी मर जातें हैं। और कहा -इंसानों का सुंदर होना कोई जरूरी नहीं। प्रेम में सभी सुंदर हो जातें हैं। प्रेम उनके चेहरे पर रौनकें ला देता है। 

उम्र भर उन्होंने सौंदर्य प्रसाधनों का बखूबी उपयोग किया। वे खूब आभूषण पहनती थीं। उनके लिबास अक्सर गुलाबी और चमकीले होते थे। उनका मानना था - "औरतों को खूबसूरत परिधान पहनने चाहिए और औरत जैसा दिखना चाहिए। वे पुरुष बनने की कोशिश भला क्यूँ करें।" एक भरा -पूरा 98 वर्ष का जीवन जी कर वे संसार से विदा हुईं। अपने पीछे छोड़ गईं करीब 600 प्रकाशित एवं 160 अप्रकाशित उपन्यासों की रूमानी दुनिया और ढेर सारा रोमांस। 

उनकी माता ने उनसे कहा था। "तुमने संसार में कुछ करने के लिए जन्म लिया है। तुम्हें दुनिया को वह देना चाहिए।' 

बार्बरा ने हमसे कहा -"हमें लोगों को वह देना चाहिए, जिससे वे संसार को खूबसूरत बनाने में मदद कर सकें। प्रेम संसार को अद्भुत, आलौकिक बना देता है।"  

Wednesday, May 20, 2020

सुमित्रानन्दन पंत को याद करते हुए (जन्मदिवस - 20 मई )

"बासों का झुरमुट, संध्या का झुटपुट / हैं चहक रहीं चिड़ियाँ, टी -वी -टी -टूट टूट।"
पंत जी का जन्म उत्तराखंड में जहाँ समाधिस्थ हिमालय का विराट सौंदर्य है, देवदारु, चीड़ के सघन वनों की हरियाली, हिमकिरीट शिखरों की नयनाभिराम शोभा, रंग -बिरंगे फूलों की अम्लान हंसी, वनपाखियों की चहकन मग्न कुर्मांचल घाटी के कौसानी नामक नामक ग्राम में हुआ। 

"पुस्तकों से कहीं अधिक कौसानी की हंसमुख, चंचल हरियाली ने, स्वच्छ नीले आसमान ने मुझे सिखाया है।" (मेरा बचपन) 

उनकी मां जन्म देते ही गुजर गईं थीं। प्रकृति की गोद में पलते हुए उनकी कलम मुखर हुई। 

"माँ से बढ़कर रही धात्रि, तू बचपन में मेरे हित।"
पहाड़ों पर कदम -कदम पर देवी -देवताओं की महत्त्व -प्रतिष्ठा होती है और उनके बीच जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्ति धर्म, दर्शन और अध्यात्म से बच नहीं सकता। इसलिए पन्त का बालक मन आध्यात्मिकता और तत्व चिंतन की ओर प्रवृत्त हो गया। प्रकृति बीच विचरण करते हुए वे एकांतप्रिय और अन्तर्मुखी हो गए। उनमें अज्ञात के प्रति एक आकर्षण रहा जो बाद में आध्यात्मिक रंगो में परिवर्तित होता गया। वे सतत्तर वर्ष की आयु तक निरंतर लिखते रहे। 

प्रकृति के चितेरे और छायावादी युग के महाकवि को श्रद्धावत नमन !

Monday, May 11, 2020

सआदत हसन मंटो को याद करते हुए ( जन्मदिवस - 11 मई )

"वह लहू किसका है जो हर रोज इतनी बेदर्दी से बहाया जा रहा है? वह हड्डियां कहाँ जलायी या दफ़न की जायेंगी जिन पर से मज़हब का गोश्त -पोस्त चीलें और गिद्ध नोच -नोच कर खा गए।"


मात्र 43 वर्ष की अल्पायु में यह यथार्थवादी कहानीकार ऐसा लिख गया कि आज तक अपनी रचनाकर्मों की वजह से अमर है। गांव, प्रकृति, संस्कृति और अतीत के नॉस्टेल्जिया जैसी उनके यहाँ कोई बात नहीं पायी जाती। काली सलवार, दो कौमें, बांझ, ठंडा गोश्त आदि उनकी कई कहानियों ने बड़े तूफ़ान खड़े कर दिए थे। ये समाज के ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से लिखी कहानियां थीं। 

बेबाकी - "हर वह चीज के बारे में लिखा जाना चाहिए जो हमारे आस -पास हो रहा हो।" मंटो ने जैसा समाज में होता हुआ देखा, ईमानदारी, निर्भीकता एवं सच्चाई से लिख दिया। हंगामा इसी बात पर बरपा। कई पुरस्कारों से सम्मानित इस लेखक को हक़ीक़त लिखने वाला 'बदनाम लेखक' कहा गया। 

बंटवारे की त्रासदी झेलते हुए - "मेरे लिए यह तय करना नामुमकिन हो गया है कि इन दोनों मुल्कों में अब मेरा मुल्क कौन सा है।" इसी से जन्मी मशहूर कहानी 'टोबा टेकसिंह'  

सच्चाई और हमदर्दी - "वैश्या का मकान खुद एक जनाजा है, जो समाज ने अपने कांधे पर उठाया हुआ है। वह उसे जब तक कहीं दफन नहीं करेगा। उसके बारे में बातें होतीं रहेंगी। "उनकी (तवायफों) रौनक भरी रातों को देखने के हम इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि उनके जीवन के सन्नाटों को हम नहीं देख पाते।" 

अपनी कब्र के लिए लिखा - "यहाँ सआदत हसन मंटो लेटा हुआ है। और यहीं उसके साथ कहानी लेखन की कला और रहस्य भी दफ़्न हो रहे हैं।"   
 

Thursday, May 7, 2020

गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर को याद करते हुए  ( जन्मदिवस 7 मई )

हे अंतरयामी !
निर्मल करो, उज्ज्वल करो, सुंदर करो हे!
जाग्रत करो, उद्यत करो,
निर्भय करो हे!

(आतंरिक आनंद की तरफ)
 (  First Draft Manuscript of Gitanjali  )  
वे मात्र विलक्षण कवि नहीं थे। अपितु आजीवन, बहुमुखी और वैविध्यपूर्ण रचना -यात्रा करते हुए साधना रत रहे और 'गुरुदेव' कहलाए। 
​काबुलीवाला पढ़ी, पोस्टमास्टर पढ़ी। फिर गोरा पढ़ी, चोखेर बालि भी पढ़ ली। अंतहीन सिलसिला है। 
उम्र​ का लंबा सफ़र है, पढ़ते जाना है।
'गीतांजलि', बेशकीमती उपहार से प्राप्त आह्लादित पल। 
​नमन गुरुदेव ​!