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Monday, August 23, 2021

पाखी मासिक पत्रिका के अगस्त 2021 , अंक में प्रकाशित उपन्यास समीक्षा

पहाड़ों से होते पलायन के दर्द को उजागर करते मेरे उपन्यास -'पहाड़ की सिमटती शाम' की समीक्षा मुख्य धारा की - 'पाखी'  पत्रिका में प्रकाशित।  


 पत्रिका सम्पादक -     अपूर्व जोशी 

समीक्षक -              प्रोफ़ेसर साधना अग्रवाल 

Tuesday, July 14, 2020

दस्तक प्रभात अखबार में प्रकाशित मेरे उपन्यास की समीक्षा 

प्रोफ़ेसर साधना अग्रवाल द्वारा की गई मेरे उपन्यास -पहाड़ की सिमटती शाम' की समीक्षा, दस्तक प्रभात अखबार में प्रकाशित 
 

Monday, April 15, 2019

' फैलसूफ़ियाँ ' ( राजीव तनेजा )


' फैलसूफ़ियाँ ' ( इसी पुस्तक से - ऐश करना, तामझाम ) राजीव तनेजा द्वारा लिखित व्यंग संग्रह है। यह पुस्तक उन्होंने मुझे जनवरी में कुरियर की थी। लेखक से रूबरू होने पर लगता नहीं कि यह अल्पभाषी, सौम्य लेखक इतनी शिद्दत से व्यंग रच सकता है। किन्तु अक्सर उनके चुटीले व्यंग, तंज और कटाक्ष मुस्कराने की कई वजह दे जाते हैं। अपने स्वयं के व्यंग लेखन पर मेरी कलम अड़ियल रवैया अपनाने लगती है। चूँकि पुस्तक मुझे भेंट स्वरूप प्राप्त हुयी अतः लिखना हर हाल बनता था। घटना प्रधान रचनाओं पर आधारित यह व्यंग संग्रह 'अधिकरण प्रकाशन ' (मूल्य -१५०/- ) से प्रकाशित हुआ है।

यह लेखक की पहली पुस्तक है, पहला प्रयोग है। एक सौ साठ पृष्ठों की इस पुस्तक में दस व्यंगात्मक लेखों के संकलन हैं। इसे संवाद शैली में व्यंगात्मक पुट के साथ बखूबी रचा गया है। अपने समय को और दैनंदिन जीवन में अपने इर्द -गिर्द हुयी घटनाओं को चैतन्य और चौकन्ना हो कर देख पाने की पैनी दृष्टि से लेखक समृद्ध हैं। बेहद सहज व सरल भाषा में लिखी यह पुस्तक हर वर्ग के पाठकों के लिए है।

अपनी कलम से उन्होंने व्यंग और तंज की आड़ में समाज में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और ढोंगी बाबाओं पर गहरा प्रहार किया है। इसमें आजकल व्याप्त प्रेम के नाम पर होने वाले धोखे के किस्से भी हैं। कहीं ऐसे संवेदनहीन और झोलाछाप डॉक्टरों का भी ज़िक्र है जिन्होंने अपने पेशे की गरिमा को ताक पर रखकर केवल पैसा कमाने को अपना मुख्य उद्देश्य बना रखा है।

संवाद शैली में लिखे होने से इस संग्रह की रचनाओं में नाटकों का अक्स दिखता है। इसी तरह सतत लिखते हुए यदि कभी लेखक की कलम व्यंगात्मक नाटकों की रचना कर दे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा। इसी शुभकामना सहित।



Sunday, July 20, 2014

’गलियारे’ By Roop Singh Chandel पुस्तक समीक्षा - आधारशिला पत्रिका के ( जून - जुलाई 2014 ) के अंक में प्रकाशित


वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल का नवीनतम उपन्यास ’गलियारे’ सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का न केवल बहु-आयामी चित्रण प्रस्तुत करता है बल्कि अफसरशाही तानाशाही को जिस जीवन्तता के साथ उद्घाटित करता है वह हमें ब्रिटिश हुकूमत की याद दिला जाता है। 

मेरे अनुसार हिन्दी का यह पहला उपन्यास है जिसमें अब तक अछूते और आम-व्यक्ति के लिए अज्ञात इस क्षेत्र को सूक्ष्मता और गहनता से विवेचित किया गया है। यद्यपि कथाकार का इससे पूर्व का उपन्यास  ’गुलाम बादशाह’ भी सरकारी-अफसरशाही को केन्द्र में रखकर लिखा गया एक चर्चित उपन्यास था। जिसे गत वर्ष आचार्य निरंजननाथ सम्मान से नवाजा गया था, लेकिन उसका कथानक विशेषरूप से अफसरशाही तक ही सीमित था, जबकि ’गलियारे’ भ्रष्टाचार के तमाम पहुलओं पर विचार करता है।    


उपन्यास की कथा अफ़सरशाही के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालती हुई जिज्ञासा, महत्वाकांक्षा, प्रशासन के विभिन्न पदों पर आसीन ब्यूरोक्रेट्स, स्थितियों के अनुसार अपने स्वार्थ और हित के लिए सरकारी सुविधाओं का अनुचित प्रयोग, उच्च और निम्न वर्ग में भेद-भाव, ग्रामीण और महानगरीय परिवेश का अंतर आदि  दिखाती हुई आगे बढ़ती है।

कहानी ग्रामीण परिवेश के गरीब युवक सुधांशु दास और एक उच्च-पदस्थ सम्पन्न अफ़सर की महानगर में पली -पढ़ी बेटी प्रीति मजूमदार के प्रेम के साथ प्रारंभ होती है। सुधांशु अपनी मेहनत के बलबूते पर आई. ए. एस. अफ़सर बन जाता है। दोनों का विवाह होता है। शादी के पश्चात कुछ समय तक सब ठीक चलता है। लेकिन प्रीति के भी आई ए एस अफ़सर बन जाने के बाद किस तरह उनकी प्रेम कथा सरकारी तंत्र की दूरव्यवस्था, हर स्तर पर शोषण, वर्ग-भेद, नैतिक पतन और मौकापरस्त राजनीति से चौतरफ़ा घिरती हुई लहूलुहान हो जाती है। उसका बेबाक वर्णन उपन्यास में हमें मिलता है। 

उनकी ज़िंदगी इतने उतार -चढ़ाव से होकर गुजरती है कि पूरी किताब को एक स्ट्रेच में पढ़ने का लोभ बना रहता है। उपन्यास की विशेषता भाषा की सहजता और किस्सागोई शैली है। किस्सागोई शैली ने इस कथाकार को एक अलग पहचान प्रदान की है.


अफ़सरशाही का यदि अपना एक रुआब होता है तो कुछ मजबूरियाँ भी होती हैं। इन सबके चलते ज़िंदगी किस प्रकार प्रभावित होती है और रिश्ते कैसे दरकते हैं, उन्हें सम्भालना और निभाते रखना कितना मुश्किल हो जाता है, इसका सार्थक वर्णन उपन्यास करता है। यहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहराई तक समाई हुईं हैं कि ईमानदार ,कर्तव्यनिष्ठ और उसूलों पर टिके रहने वाले अफ़सरों के लिए ये किसी जंग से कम नहीं। उन्हें मुश्किलों, अपमान, अवहेलना और घुटन के साथ जीने के लिए कितना मजबूर होना पड़ता है कहानी के नायक सुधांशु के मार्फ़त समझा जा सकता है। 

सुधांशु इस उपन्यास का एक ऎसा पात्र है जिसकी ईमानदारी उसके बॉस पाल के लिए चुनौती बन चुकी है। पाल ही नहीं रिश्वतखोर छोटे अधिकारियों की दृष्टि में भी वह खटकता है और सुधांशु के विरुद्ध जिस प्रकार के षडयंत्र होते हैं वे आम पाठक को चौंकाते हैं। 


प्रीति इस सिस्टम के रंग में रंगने लगती है और ब्यूरोक्रेसी का हिस्सा बनती जाती है। इस दौड़ में बने रहने की कोशिश में वह इस कदर उलझ जाती है कि अहंकार, लोभ और दम्भ से भरी बात -बात पर सुधांशु को उसके ग्रामीण होने और पिछड़ेपन के ताने देने लगती है। कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं।  

 " यार सुधांशु अब तुम किसान नहीं हो…… क्लास वन अफसर हो। उसी प्रकार बातें सोचा और किया करो।“  

  या फिर - " क्लास वन अफसर होकर भी तुम्हारी सोच अभी गाँव वाली ही है "

वह अपना घर-बार, रिश्ते सब दाँव पर लगा देती है। मीणा जैसे अफसर प्रीति को बरगलाने और सुधांशु के विरुद्ध भड़काने में सफल हो जाते हैं। अफसरशाही के अहं में डूबी प्रीति सुधांशु को कदम-कदम पर प्रताड़ित करती है। परिणाम स्वरूप सुधांशु से उसका विलगाव और अंततः व्यवस्था और पत्नी की प्रताड़ना और उपेक्षा से टूटा सुधांशु शराब और अन्यप्रकार के आत्मघाती ड्रग्स की शरण में जीवन का सुकून खोजने के     लिए अभिशप्त हो जाता है। यहां लेखक का यह कथन उल्लेख्य है। 

" हिंदुस्तान की ब्यूरोक्रेसी की यही तो खूबी है कि वो रिश्तों को पनपने से पहले ही उसे जड़ से काट फेंकती हैं "

उलझनों और राजनैतिक दांव -पेंचों का ताना -बाना रचते गिलयारे भीतर ही भीतर कहाँ खुलते हैं और कहाँ पहुँचते हैं बखूबी समझाने की कोशिश में लेखक पूर्ण रूप से सफल रहा है। बेहद ईमानदारी के साथ कहना चाहती हूं कि  'गलियारे'  ’मस्ट रीड’ की लिस्ट में बहुत ऊपर रखा जाने योग्य ही नहीं है बल्कि यह विषय की मौलिकता, सहज कथनात्मकता और शिल्प वैशिष्ट्य के कारण हिन्दी के शीर्षस्थ उपन्यासों में स्थान पाने योग्य उपन्यास भी है।

 ( पुस्तक समीक्षा   ' आधारशिला '   पत्रिका के जून - जुलाई १४ के अंक में प्रकाशित )

लेखक से संपर्क -

rupchandel@gmail.com 

भावना प्रकाशन, ए-109 , पटपड़गंज

दिल्ली – 110091




Thursday, April 17, 2014

स्वप्न और यथार्थ - By Aravind Pandey ( पुस्तक समीक्षा - कलरव पत्रिका के मई-अगस्त अंक २०१३ में प्रकाशित )


' स्वप्न और यथार्थ ' यह पुस्तक १९८८ बैच के आई पी एस अधिकारी श्री अरविंद पांडेय के अनुसार उनकी सत्यनिष्ठ अभिव्यक्तियों एवं आत्मीय -स्वीकृतियों का आईना है। 

' स्वप्न और यथार्थ ' पुस्तक मानवीय संवेदनाओं को गहराई से महसूस करते हुए लिखी गयी है। इस पुस्तक को उन्होंने धरती के करोड़ों निर्धन और निरक्षर लोगों को समर्पित करते हुए लिखा है -

" जिन्हें 'हम धरती के लोग 'इसके योग्य नहीं बना पाए हैं कि वे इस पुस्तक को खरीद सकें, इसे पढ़ सकें " 

इस पुस्तक को लेखक ने आज के हालातों से आहत होकर देश के लिए बहुत कुछ कर गुजरने का जज़्बा लिए हुए लिखा है। पुस्तक तीन खंडों में लिखी गयी है। 

पहला पद्य खंड है। जिसमें शुरुआती कई कविताएँ सुन्दर और भावपूर्ण छंदों में लिखी हुई जो जयशंकर प्रसाद और सुमित्रा नंदन पंत की भाव- भाषा को लेकर चलतीं हैं। आज के समकालीन और अकविता के समय में इस तरह का सुन्दर पद्य लेखन रोमांचित करता है। लेखक ने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाते हुए इसे अलग -अलग भावों में लिखा है। 'कभी प्रकृति के सौंदर्य पर, देश के नौजवानों के उत्साह -वर्धन के लिए और देश में व्याप्त कुरीतियों, अफसरशाही और भ्रष्टाचार पर। तो कभी स्त्रियों की दुर्दशा पर और कभी हिन्दी की चिंताजनक स्थिति पर। दृष्ट्व्य है -

'प्रकृति प्रेमी रूप में बसंत के आगमन पर उल्लसित होकर कोयल से कहना - 
' हे बसंत की मधुर प्रेयसी / शतशः तेरा अभिनन्दन है / नहीं विहंगम नहीं, नहीं, तुम / ग़ुज़्ज़, रहस्य, अदृश्य तत्व हो। '

या फिर -
'धरा का करता था श्रृंगार / चन्द्रिका का सुन्दर-विक्षेप / यथा करती है ईश्वर-भक्ति / बुद्धि पर सत्व -वृत्ति का लेप '

आज के हालातों पर -
हलाहल पीने के भी बाद / बना रहता है जिसका स्वत्व / महायोगी पशुपति के तुल्य / प्राप्त करता है वही शिवत्व '

इसी तरह आज समाज में स्त्रियों की दुर्दशा से विचलित होते हुए आक्रोश के स्वर - 

'दिव्य भारत भूमि की जिस कोख ने हमको जना / कुछ करो, उस कोख की तो लाज बचनी चाहिए'

बह गया पौरुष सभी देवों का फिर से एक बार / अब, जमीं पर फिर कोई दुर्गा उतरनी चाहिए। '

बिहार की क्रुद्ध कोसी के तांडव पर जब सैकड़ों जानें गयीं थी तब लेखक का नौकरशाही और भ्रष्ट समाज पर प्रहार करते हुए कहना -

'मन में दानव सा लोभ लिए / मानव ने कैसे पाप किये / पानी बनकर ईमान बहा / कहने को ना कुछ शेष रहा / उन्मत्त हँसी नौकरशाही / गलकर बह गयी लोकशाही '

दूसरा गद्य खंड है- जिसमें देश के कई ज्वलंत मुद्दों पर लिखा गया है। इसमें अंबेडकर अक्षुण्ण हैं, एम.एफ. हुसैन का माँ सरस्वती की असभ्य पेंटिंग बनाने पर उठे विरोध के स्वर, छुआ -छूत , जाति , भेद -भाव और दलितों और कमज़ोर वर्गों के हक़ के लिए लड़ते , उमड़ते ज़ज़्बात हैं। 

इसी खंड में मातृभाषा हिंदी की दुर्दशा पर दुख जताते हुए लिखा है की इसे प्रगति की भाषा मानते हुए हमें इसके सम्मान में लिख कर गौरवान्वित होना चाहिए। यहाँ युवाओं का योग की शक्ति से भी परिचय करवाया गया है। भाषा पर अपनी मज़बूत पकड़ और गांभीर्य को बनाए रखते हुए बहुत से अन्य मुद्दों पर भी लिखा है। लेखक की गहरी अध्ययन-शीलता के दर्शन कई जटिल मुद्दों पर लिखे लेखों को पढ़ते हुए बखूबी किए जा सकतें हैं। 

तीसरा गीति खंड - विशेषकर बिहारियों, बिहार प्रेमियों और देश प्रेम को समर्पित करते हुए पाटलिपुत्र, नालंदा, चन्द्रगुप्त, चाणक्य, पुष्यमित्र, बुद्ध आदि को याद करते हुए लिखा गया है। इसमें देशभक्ति से सराबोर और मज़हबी एकता के गीत भी लिखे हुए हैं। 

'जिस धरती पर बुद्ध चलते थे / हम भी उस पर चलते हैं / गुरु गोविन्द जहाँ खेले / हम वहीं कुलांचें भरते हैं '

पुस्तक के अंत में आज़ाद भारत की खुशबू से महकते हुए 'मेरा भारत सबसे प्यारा ' लिखा गया है। 

प्रेम, स्नेह, तंज, व्यंग, व्याकुलता, दुःख, चिंता, खुशी, संशय, आशा, विश्वास, देश- प्रेम, मज़हब -प्रेम आदि अनेक भावों से रची बसी यह पुस्तक 'स्वप्न और यथार्थ ' अपनी गूढ़, गंभीर और ज्ञान वर्धक लेखन से बहुत कुछ कह - समझा देती है। 

इस पुस्तक में लेखक द्वारा किया गया ज्ञानार्जन आनंदित करता है। जिस तरह ज्ञान की बूँदें समेट -सहेज कर रखी गयीं हैं, वो काबीले -तारीफ़ है। यदि कहा जाय कि कर्म क्षेत्र में अपनी लगन, ईमानदारी, मेहनत और सच्चाई से सफलता के मुकाम पर अग्रसारित रहते हुए श्री अरविंद पांडेय ( पुलिस महानिरीक्षक ) निश्चय ही एक सफल लेखक भी हैं, तो इसमें लेशमात्र भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

( पुस्तक समीक्षा - कलरव पत्रिका के मई-अगस्त  अंक २०१३ में प्रकाशित )


'सत्साहित्य प्रकाशन' और प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ये पुस्तक मुझे भेंट स्वरूप प्राप्त हुई है - 

बिहार -भक्ति -आंदोलन 
४०१ , श्रीगणेश अपार्टमेंट 
कवि रमण पथ 
नागेश्वर कॉलोनी 
पटना - ८०० ००१