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Wednesday, April 29, 2020

चश्म -ए -नम मुस्कुराती रही - (अलविदा इरफ़ान)


बिना किसी से मिले भी क्या उससे मोहोब्बत हो सकती है? 'लंच बॉक्स' फिल्म देखते हुए सोच रही थी। कुछ ख्याल आते-जाते रहे। संजीदा होते हुए सोच भटक जाती थी।फिल्म जितनी धीमी गति से चलती है, उसके लंच बॉक्स में प्यार उतनी ही तीव्र गति से पनपता रहा। पूरी फिल्म अंत तक बांधे रखती है। टोटल पैसा वसूल फिल्म। अपनी हर फिल्म की तरह 'लंच बॉक्स' में भी इरफ़ान मियाँ धमाल हैं, साथ में निम्रत कमाल। 

सवाल फिर भी वहीं था। क्या असल ज़िंदगी में ऐसा होता है? बिना किसी से मिले प्यार जैसा कुछ…? नहीं होता। तभी तो हम फिल्म देख कर कल्पनालोक में विचरण करते हुए उन पलों को जी लेते हैं। या शायद हो जाता होगा, आधा -अधूरा सा, याने की एक तरफ़ा जैसा…अमूमन इन्फ़ेचुयेसन जैसा कुछ....जिसमें दूसरे पक्ष को पता भी नहीं चलता होगा। समय के साथ वही प्यार दोस्ती में बदल जाता होगा, और कुछ समय बाद दम तोड़ देता होगा। ऐसे प्रेम का अंजाम यही होता है। तब भी क्या फर्क गिरता है। इसी का नाम ज़िंदगी है। 

अब यदि किसी से वर्षों तक भी मिलना न हो सके और रिश्ता बना रहता है। तब निश्चित ही कुछ तो बात होती है ऐसे रिश्ते में। एक फील बनी रहनी चाहिए। सब कुछ उसी फील का कमाल होता है। वही फील जो पूरी फिल्म के दौरान ईला और फर्नेंडीस को महसूस होती रही। वही फील जो उन दोनों के साथ हमको होती रही। इरफ़ान ऐसे अद्भुत कलाकार हैं जिनके साथ हर चरित्र को बखूबी जिया जा सकता है। अलविदा कलाकार! यादों में रहोगे, हमेशा...

https://en.wikipedia.org/wiki/Irrfan_Khan

Monday, February 10, 2020

जीवन में पंगा ले ही लेना चाहिए ( पंगा फिल्म देखते हुए )


"बच्चों को पति के भरोसे छोड़ दो और पति को भगवान् के" उसकी मित्र द्वारा ऐसा जया से उस समय कहा गया जब वह जीवन में कमबैक करने के बारे में सोचते हुए फिर से पति, बच्चा, घर परिवार के गुंजलक से बाहर नहीं निकल पा रही थी। मुझे कंगना खूब पसंद है। अपनी अदाकारी से किसी भी चरित्र को जीवित कर देतीं हैं। 

यूँ तो हर औरत बिंदास जीना चाहती है। देखती है खूबसूरत सपने और भरना चाहती है अपनी स्वच्छंद उड़ान। किन्तु लाख चाह कर भी वह उस ऊंचाई पर नहीं उड़ पाती जहाँ के सपने देखती है। उसके आड़े आ जाता है बहुत कुछ। जया जैसा पति, बच्चा कितनों को मिलते हैं? गर मिल भी गए तो कितनी हैं जो अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकल कर ज़िंदगी से पंगा लेने को कमर कसतीं हैं? परिवार का सपोर्ट मिल भी जाए तब भी दिल मजबूत करके, अपनी शर्तों पर आगे बढ़ कर अपने सपने जीने की हिम्मत कितने प्रतिशत औरतें रखतीं हैं? बात चाहे शादी के पहले की हो या बाद की। स्थिति जस की तस। फलस्वरूप पंगा न ले सकने के हालात पर औरत के पास रह जाता है अवसाद, दुःख, बहाने, आरोप -प्रत्यारोप और शिकायतें जैसी कई एक्सक्यूसिस। सही मायने में दोष किसका हुआ? 

'आँचल में दूध, आँखों में पानी' मैथिली शरण गुप्त ऐसे ही थोड़े लिख दिए। जया कबड्डी की ट्रेनिंग लेने चली गई। उसके जाने के बाद घर का खालीपन साफ़ दिखता है। औरत घर को घर बना देती हैं, रहने लायक सजा देती हैं। अमूमन यह बात उसके घर पर नहीं रहने के बाद ही मालूम पड़ती है। घर के दैनंदिन कार्यों और बच्चे को न संभाल पाते पति की बेचारगी वाली हालत देख कर सिनेमा हॉल में बैठी महिलाएं दर्द और प्रेम से कसमसा उठीं। "ओह बेचारा।" उसका परांठा जला, सब्जी में तेल ज्यादा हुआ, घर भर में कपड़े फ़ैल गए। "च्च्च, ओह! आह ' उच्चारती औरतों का प्रेम, स्नेह, ममता छलक -छलक का बाहर हॉल में आता रहा। उनका बस चलता तो झट उठ कर उस पत्नी विहीन घर को सँवारने चल पड़तीं। ये ऊपरवाले ने 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' को कमाल का बनाया है। उसका दिल बेमिसाल बनाया है।

कर गुजरने वालों के लिए असंभव कुछ नहीं। कम बैक कोई भी कर सकता है। यह किसी भी समय, किसी भी उम्र में संभव है। अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना इसकी पहली शर्त होती है। अब जिनमें पंगा लेने की हिम्मत है, किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने का जुनून है, हौसला है। वे पंगा ले ही लेते हैं। खूब सफल भी होते हैं। यह बात सिर्फ औरत तक ही सिमित नहीं है वरन हर वर्ग के स्त्री -पुरुष दोनों के लिए है। जीवन से पंगा हर किसी को लेना चाहिए। कोई नहीं जो है सो है। 'कल करे सो आज कर।' 

अब जिसे भी स्व -प्रेरणा, सेल्फ मोटिवेशन चाहिए वह 'पंगा' देख आएं। ज़िंदगी हर कदम एक नई जंग है। इसलिए बिंदास, बेझिझक पंगा लें और जीवन में जबरदस्त कम बैक करें। जीना इसी का नाम है। 

Thursday, December 22, 2016

डिअर ज़िंदगी (आय लव यू डिअर) - फिल्म देखते हुए


मैंने ज़िंदगी में बहुत से काम अकेले किये और खूब किये। हर काम के लिए साथी चाहिए बड़ा बेईमाना सा लगता है। लेकिन कभी फिल्म अकेले नहीं देखी थी। एक भी नहीं। अव्वल तो मैं फिल्म कम ही देखती हूँ। किन्तु कोई ज्यादा रोमांचक हो अपने उम्दा रीव्यू के साथ, तो जरूर देखना चाहती हूँ। किसी बेहतर को यूँ बेमतलब जाने देना, मेरी फितरत नहीं।

हफ्ते भर से सहेलियों से पूछ रही थी, सब व्यस्त। तब लगा जैसे दुनिया की सभी फ़ुरसतें मेरी ही मुठ्ठी में हैं। लकी मी...न जाने कितनी ही देखी जाने योग्य फिल्म इन सभी बातों के चलते नहीं देख सकी थी।

उस दिन सोचा 'डिअर ज़िंदगी' देखी जाय। मॉल मेरे घर से पैदल दूरी पर है। ऑनलाइन देखा शो का टाइम गयारह बजे का था। ग्यारह बजने में दस मिनट शेष थे। शनिवार की आराम फरमाती सुबह  थी। छुट्टी वाला दिन। अभी पजामा में ही थी। दो डिओ के स्प्रे किये और बिना नहाये ही चल दी। थोड़ा झिझक थी , अज़ीब लगा।  मेरे लिए कोई भी नया  काम पहली बार करना कभी सहज नहीं होता।

बहरहाल मैंने रिसेप्शन पर बैठी बालिका से कहा - "एक टिकट. सबसे पीछे.. हम्म"

उसने इधर -उधर देखा। शायद मेरा साथी देखने की उत्सुकता में हो। उधर खिलखिलाते जोड़े,  चहकतीं महिलाएं और लडकिया थीं। अच्छी रौनक थी।

उस दिन तसल्ली से बैठ कर फिल्म देखी। पहली बार कोई फिल्म खूब अच्छे से समझ आयी। अन्यथा मित्रों या पति के साथ बैठ कर बातें होनी बाजिब हैं। खूब आनंद आया। फ़िल्में अकेले ही देखनी चाहिए। सच..

दूसरी फिल्म देखने गयी।  'बेफिक्रे'  तब वो बालिका मुझे पहचान गई। मेरे कुछ कहने से पहले  ही बोली। "मैम एक टिकिट, सबसे पीछे... है न?" हम दोनों ही हंस दिए। ये नए ज़माने की बालिकाएं शानदार होतीं हैं। बिना संकोच, खुल कर जीतीं हैं। अब मैं अकेले फिल्म देखना ज्यादा पसंद करती हूँ।

वैसे किसी का भी हो, इंतज़ार बुरी शै है....परेशानियों और बेचैनी के सिवा कुछ हासिल नहीं होता। सुन रहे हो...सभी बेमतलब की व्यस्तता में फंसे हुए लोगों। तुम सब बेकार लोग हो।



Thursday, December 3, 2015

तमाशा - फिल्म देखते हुए ( ज़िंदगी जीने का नाम )


दुनिया का तमाशा हर दिन देखतें हैं। सोचा आज रजत पट वाला तमाशा देख लिया जाय। बहुत देखा पेड़ों के इर्द -गिर्द चकराता हुआ रोमांस। थोड़ा हट कर कुछ देखने को मिलेगा की चाहना में 'तमाशा' फिल्म देखी। कभी आर्ट फिल्म देखते थे और उसके प्रभाव में कई दिनों तक रहते थे। फिर दौर आया कॉमर्सिअल सिनेमा का और सजे -धजे नाचते -गाते, रोते, बाँहों में सिमटते, इश्क़ करने का। निहायत अज़नबी सी प्रेम कहानियां। बीमार हों या अति संताप में नायिका का मेकअप जस का तस। अब असल ज़िंदगी में ऐसा भी कहीं होता है? 

अमूमन परदे की दुनिया में रोमांस हो या फिर रोजी -रोटी के लिए मशक्कत। अज़नबीयत से भरा होता है, काल्पनिक सा। जीवन ऐसा हो जैसे हमारे मन में चलता है। हमारे मनमुताबिक। तब है बात। जैसा हर कोई करना चाहता है परन्तु कर नहीं सकता। तब फिल्मों में उसे होता देख दिल को बहल जाता हैं। परिवार, समाज, संकोच, भय, परिस्थितियाँ, हालात। रोमांस के पनपने से पहले ही न जाने कितने ही भाव बिन बुलाये चले आते हैं। ऐसे में हो लिया रोमांस। अब कुछ अच्छी फ़िल्में बनने लगीं हैं। बिना मेकअप वाली नायिकाएं मुझे खूब पसंद हैं। सादगी में रहती हैं परन्तु कला में कमाल होतीं हैं।  

तमाशा फिल्म कुछ ऐसी ही। अच्छी है। पीकू फिल्म के बाद से मुझे दीपिका खूब पसंद आने लगी है। सादगी से भावों को बखूबी अभिव्यक्त करती हुई। 

तमाशा में रणबीर की कश्मकश और छटपटाहट बखूबी दीखती है। अक्सर ऐसा ही होता है। बहुत कुछ जीवन में करना नहीं चाहते परन्तु परिवार, हालात या परिस्थिती के चलते वही करना पड़ता हैं। फिर ज़िंदगी जीने जैसा कुछ नहीं रह जाता। भीतर छटपटाहट बनी रहती है, घुटन और उदासी का पक्का पता व्यक्तित्व पर अपनी छाप दिखाने लगता है। करना कुछ और चाहते हैं कर कुछ और रहे होतें हैं। ऐसे जीवन को जीना नहीं व्यतीत करना कहतें हैं।

कुल जमा ये कि दिल -दीमाग की सुनों और मस्त जियो। मन मार कर कुढ़ते हुए, बेमन से काम करते हुए जीना भी कोई जीना हुआ? बेकार हुआ...कई वर्षों की एक छोटी सी इच्छा थी। अब पूरी करूंगी। अब चाहे कोई कुछ भी कहे।