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Saturday, March 7, 2020

उत्तराखंडी पहाड़ी होली की बहार - स्वाँग ( Mimicry )


इस स्वाँग शब्द से बचपन में कभी दोस्ती हुई थी मेरी। उत्तराखंड के पहाडों में पली बड़ी हुई हूँ। वहाँ पर होली के त्यौहार की बहुत धूम मचती है। ४-५ दिन तक पुरुष व महिलाओं की  बैठकें लगती हैं और खूब नाचते -गाते, खाते- खिलाते मनाया जाता है ये मस्ती भरा त्यौहार। इसी के बीच में ये स्वाँग रचने का सिलसिला भी चलता है।

स्वाँग का मतलब होता है...जो बात हम सीधे न कह पाते है उसे नक़ल करके कहना। किसी की खिंचाई करनी हो या मस्ती मजाक में बहुत कुछ लेकिन बुरा न मानो होली है की आड़ में। कोई भी किसी का वेश बनाकर आता है और फिर धमाल, खिचाई, मस्ती और अंतहीन ठहाके लगते थे।

उन दिनों मैं नवीं कक्षा में थी। हमारे स्कूल में चालीस बसन्त देख चुकी, ममता विहीन ,हँसी से कोसो दूर रहने वाली प्रधानाचार्या थीं। छोटी सी बात पर भी लड़कियों की चोटी खीच देना, प्रताडित करना, कटाक्ष रूपी शब्दों का भरपूर प्रयोग करना, विद्यार्थियों के सामने भी अध्यापिकाओं को अपमानित करना उनके लिए साधारण सी बात होती थी। आँखों में आँसू लिए अध्यापिकाएँ व सह्पाठियों को देखकर मेरा मन अन्दर तक अवसादित हो जाता था। कभी - कभी तो निर्दोष भी उनके कोप का प्रसाद पा जाते थे। हम सभी के अन्दर गरल रूपी कुछ एकत्रित हो रहा था।

स्वभाव से मैं थोड़ा अन्तर्मुखी थी और अपना पूरा ध्यान सिर्फ पढ़ने में ही नहीं लगाती थी...ज़िंदगी में और भी बहुत से क्रियाकलाप थे करने को...सो सभी करती थी। उसके चलते उनकी अंशमात्र सी कृपादृष्टि मुझ पर थी। लेकिन आँखें अक्सर तरेरी जाती थी। जिनसे मैं सहम भी जाती थी ।

उस बार होली की बैठक जोशी मैडम (हिंदी अध्यापिका) के घर पर थी। प्रधानाचार्या महोदया का आना तय था ही। अब भुक्तभोगी अध्यापिकाओं व लड़कियों ने मिलकर उनका स्वाँग करने की योजना बनाई। लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे? इस दिलेर कार्य को अंजाम देने का सौभाग्य या दुर्भाग्य जो भी था मुझे मिला। मैं आज तक हैरान होती हूँ की मैने इसे स्वीकार कैसे किया? बिना सोचे समझे बहुत तीव्र गति से धड़कते दिल से बस स्वीकार कर लिया था।

तयशुदा दिन साड़ी पहन कर नकली बालों का जूड़ा बनाया, उन पर जहाँ- तहाँ पेंट से सफेदी झलकाई। आँखों पर काले बैकेलाइट का चश्मा लगाया। चेहरे की सारी हँसी छिपाकर उस पर एक अक्खड़ और सडू सा भाव चिपकाया। जैसे ही हम किसी चरित्र को निभाने के लिए ड्रेसअप होते हैं तो अन्दर से वो पात्र स्वयं ही जी उठता है। अब तक मेरा सारा डर व घबराहट समाप्त हो चुका था।

कुछ सहपाठियों व अध्यापिकाओं के साथ मिलकर, शालीनता के दायरे में रहकर जो दर्पण दिखाया उन्हें वो सब आज तक मुझे बखूबी याद है और ताउम्र याद रहेगा। करीब आधे घंटे तक दिल के सभी दबे अरमान व गुबार निकाले। अंजाम गुलिश्तां क्या होगा की तर्ज़ पर सभी के निर्दोष आंसुओं का हिसाब पूरा किया

उस दौरान उनके चेहरे पर कई भाव आए और गए। स्वाँग की आड़ में हम सभी का मकसद पूरा हो गया था। सभी अति प्रसन्न थे। परन्तु मेरे मन के किसी कोने में ग्लानी का भाव रह -रह कर टीसने लगा...होली की उन छुट्टियों के बाद उन्होंने मुझे अपने कक्ष में बुलाया। क्या हुआ होगा अनुमान लगाया जा सकता है। मस्त झाड़ पड़ी।

"यही सीख रही हो यहाँ पर ,गुरुजनों का निरादर करना, कल जब हमारी उम्र में आओगी तब मालूम होगा..." वगैरह -वगैरह।

आँखों में आँसू लिए मैं ज्यादा कुछ सुन- समझ नहीं सकी। वरन सोचने लगी 'यदि मैं अध्यापिका या प्रधानाचार्य बनी तो मुझे क्या क्या करना चाहिए और क्या नहीं। वैसे आज भी वे मेरी प्रेरणास्रोत जरूर हैं। अनजाने में भी किसी से कितना कुछ सीखा जा सकता है। अपना आकलन करना आ जाता है। बहुत कुछ सीखा उनसे भी।

उस स्वाँग का ज़िक्र जीवन में सिर्फ एक बार और हुआ। जब लगभग बीस वर्ष बाद उनसे दुबारा मुलाकात का अवसर मिला। तब वे मुस्कुरा कर बोलीं...

"एक बात बताओ, तुम जैसी कक्षा में कम बोलने वाली और ज्यादा किसी से मतलब नहीं रखने वाली लड़की कैसे कर गुज़र गई थी वो सब...?"



Sunday, February 23, 2020

दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते है कहाँ

दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते है कहाँ / कैसे ढूंढे कोई उनको, नहीं क़दमों के भी निशां 
नेताजी भवन में 23 जनवरी 2018 का वह दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती पर शिरकत कर पाने का उत्साह भरा दिन था। मेरी कोलकाता यात्रा का हासिल। वे प्रेम और ममत्व से भरे पल थे। कृष्णा जी का कुछ पलों का साथ, दुलार एवं स्नेह मेरे हिस्से में भी आ गया। अनजाने में हुई वो मुलाक़ात बेशकीमती थी, अनमोल थी। यादों तुम बने रहना। कृष्णा जी विनम्र श्रद्धांजलि एवं नमन ! 


Sunday, August 6, 2017

बुरा जो देखन मैं चला, मुझसे बुरा न कोई


"दूसरों के गुणों की तरफ देखो और अपने दोषों की तरफ।" माँ हमेशा कहती है।

"तो माँ, कुल जमा ये कि सारी दुनिया बेहद अच्छी और मैं ?"  माँ हंस देती है। "इस फ़लसफ़े से तो मैं हमेशा अपने आप को दोषों से परिपूर्ण ही देखती रहूं?"

"माँ केवल हंस कर बात मत टालो। क्या सच में मुझे अपने आप को इसी नज़र से देखना चाहिए? आजकल इस कलयुग में कहते हैं अपने आप से प्यार करो अपनी इज़्ज़त करो तभी दुनिया का रुख भी तुम्हारे प्रति अच्छा रहेगा ? ऐसा।"

"हे ईश्वर कौन कहता है ऐसा..?"  माँ असमंजस में दिखी।

"सब कहतें हैं मदरलैंड।"

"कौन सब ?"

"माँ तुम सतयुग की बात कर रहे हो। आजकल अपने को गुणवान और दूसरों को गलत और बुरा समझना चाहिए। ऐसा रिवाज़ है और वो ही ठीक है।"

"हाय.. ऐसा कब से हो गया? ऐसा कभी भी नहीं होता। पता नहीं कहाँ सुनके आती है ऐसा गन्दा।  छी...बेकार हुयी तू सच्ची।" माँ स्तब्ध।

"कतई बेकार हुए यार माँ मैं।  सभी कहते हैं।"



Wednesday, December 30, 2015

ज़िंदगी इत्तफ़ाक है


जाते हुए वर्ष में सोचा कुछ मन की कर ली जाए। वर्षों से मन था। हाथ में एक टैटू बनवाना था। इसके लिए ग्रेटर कैलाश पार्ट -2 में devil'z tattooz पहुँच गई। वहाँ मुझे आर्टिस्ट मिले, हेंड्री लामा। एक प्यारे इंसान, महत्वाकांक्षी। ऐसे लोगों की जीवन कहानी में मुझे बेहद दिलचस्पी होती है। उनसे खूब बातें कीं। 

"कुछ डिज़ाइन है मन में?" उन्होंने जिज्ञासा वश मुझसे पूछा। 

"हाँ...बिलकुल है। एक सुन्दर सा ॐ और उस पर त्रिशूल बना दो। शिव भक्त हूँ, सबको पता चलना चाहिए न।" हेंड्री ठठाकर हँस पड़े। 

मुझे हेंड्री एक मृदुभाषी और शांत व्यक्ति लगे इसलिए टैटू बनवाते हुए मैं उनका जीवन टटोलती रही। होंगे करीब तीस वर्ष के। दार्जिलिंग के रहने वाले। मैंने एक सवाल पूछा। "हेंड्री टैटू कैसे हुआ? इसके अलावा कुछ और चाहा नहीं या फिर इत्तफ़ाक से यही हुआ।" 

मुस्काते हुए झट बोले। "येस्स... इत्तफ़ाक से यही हुआ। मेरी माँ चाहती थी कि मैं कैमिस्ट्री पढूं और प्रोफेसर बन जाऊँ। इसलिए माँ की खुशी के लिए मैंने पढ़ी कैमिस्ट्री। बेमन से पढ़ी। पढ़ाई पूरी होते ही सोचा अब क्या? और एक दिन कहीं पर टैटू बनाने वाले को काम करते देख मंत्रमुग्ध हो गया। तब अचानक लगा। मुझे ये करना था। एकदम यही। बस फिर किसी की नहीं सुनी। मेरी दो बड़ी बहने हैं उनकी शादी हो गई। तब केवल माँ की जिम्मेदारी थी सो किस्मत आजमाने दिल्ली चला आया। अब यहाँ पर बारह वर्ष हो गए।"

हेंड्री अध्यात्म से भी प्रेरित लगे। उनका एक वाक्य कमाल का लगा। कहने लगे। "हम पूरी ज़िंदगी अपनी खुशी के लिए कितने ही काम करतें हैं। गहना, कपड़ा, घर, गाड़ी, पैसा न जाने क्या -क्या...परन्तु जब हम संसार छोड़ते हैं तब, सब यहीं रह जाता है। केवल एक टैटू है जिसे हम अपनी खुशी के लिए बनवाते हैं और कमसकम वह हमारे शरीर के साथ अंतिम यात्रा तक रहता है।" 

"आर यू ऑलराइट मैम? चाय या पानी कुछ चाहिए?" काम करते हुए बीच -बीच में थोड़ा चिंतित स्वर में पूछ लेते थे। मुझे बड़ी हैरानी हुई। 

"हेंड्री मुझे कुछ होना चाहिए था क्या?" मैंने सवाल किया। 

"नो - नो इट्स ग्रेट।" मेरी बात पर हँस कर बोले।

भगवान जाने क्या होना था मुझे, जो नहीं हुआ। बाहर आने पर किसी अन्य से पूछने पर उसने बताया। टैटू बनवाते हुए कुछ लोगों को चक्कर आ जातें हैं। 'इतनी बारीक सुई के प्रिक से चक्कर? बड़े बहादुर लोग होते होंगे वे।' मुझे हैरानी हुई। 

किसी की भी जीवन कहानियाँ सुनते हुए मुझे परम आनंद के सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता। 

"अपने को दस वर्ष बाद कहाँ पर देखते हो हेंड्री?" मेरा टैटू लगभग बन चुका था। इसलिए झट एक आखिरी सवाल पूछा। 

"अपने गाँव में, दार्जिलिंग। हम सब अपने गाँव के अपनी जन्मभूमि के कर्ज़दार होते हैं। इसलिए हर हाल में इस क़र्ज़ को चुका कर ही मन को शांति मिलेगी। आज़मा के देख ले..हर कोई। पराया शहर हमें रोटी दे सकता है, ऐशो -आराम दे सकता है परन्तु अपनापन और सुकून नहीं दे सकता। मैं वापस अपने गाँव जरूर जाऊँगा। जल्द ही।वहाँ पर बहुत टेलेंट है। वहाँ मैं एक इंस्टीट्यूट बनाऊंगा। जब वहाँ जाता हूँ लोग मेरा इंतज़ार करतें हैं। मुझे खूब प्रेम मिलता है। बस कुछ पैसा और...इंस्टीट्यूट बन जाने तक।" बहरहाल हेंड्री ने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया है। उनकी माँ अब अपने बेटे से बहुत खुश हैं। 

बन गया मेरा खूबसूरत टैटू..हो गई मेरे मन की। 

तुम्हारा खूब धन्यवाद हेंड्री। तुम गज़ब के आर्टिस्ट हो। तुम लोगों की मनोकामनाएं पूरी करते हो, ईश्वर तुम्हारी हर मनोकामना पूरी करे भाई ।

http://www.tattootradejournal.in/artists/hendry-lama/

अब अगले वर्ष कुछ और नया...


Saturday, November 22, 2014

मैं पल दो पल का शायर हूँ


​कुछ दिन पूर्व एक आलोचक महोदय का टेक्स्ट आया ​- "राजस्थान से एक आलोचक हूँ। स्त्री -पुरुष का भेद नहीं करता। इसलिए बख़्शी आप भी नहीं जाएंगी। 'कथाबिंब पत्रिका' में आपकी कहानी 'सर्पदंश' पढ़ी। हट कर कुछ नहीं था। आप ने भी अन्य महिला लेखिकाओं की ही तरह लिख दिया।"

टेक्स्ट के उत्तर में मैंने यह लिख कर इतिश्री कर दिया। -"अच्छा लिखा, उम्दा कहानी, जैसे टेक्स्ट और मेल पढ़कर चट जाती हूँ। जीवन में पहली आलोचना पढ़कर आनंदित हूँ। खूब धन्यवाद!"

शायद उन्होंने मुझे कुछ और सुनाना था या फिर उनके अंदर का आलोचक इतने मात्र से ही शांत नहीं हो सका होगा। शाम करीब आठ बजे उनका हैरानी भरा फोन आ गया। फ़ोन उठाते ही झट बोले। 

"आज तक किसी ने आपके लेखन की आलोचना नहीं की? इसका मतलब आपने अभी तक कुछ शानदार लिखा ही नहीं। आप अन्य महिला लेखिकाओं से अलग लिखिए।"

"कैसे लिखूं?"

"आप कुछ इस तरह के मुद्दों पर लिख सकतीं हैं, मसलन..." उन्होंने कुछ विषय सुझाए।   

"पुरुषों वाली सोच कहाँ से लाऊंगी? ऐसा तो मैं कतई पढ़ती भी नहीं, लिखूंगी खाक।"

"फिर कब लिखेंगी ऐसा?"

"शायद कभी नहीं। मेरी सोच वहां तक जाती ही नहीं। मेरी लेखनी मेरी कल्पनाओं के साथ खिलवाड़ करते हुए क्या गढ़ देती है वो मुझे भी बाद में मालूम पड़ता है। खैर आप मार्गदर्शन करते रहें, शायद कभी ऐसी कोई कहानी बन जाए।"

"अजी साहब! मैं आप का क्या मार्गदर्शन करूंगा, मैं तो अभी खुद एक विद्यार्थी हूँ।" वे हंस कर बोले।  

"कमाल है.. परन्तु  आवाज़ से तो आप उम्रदराज़ लग रहें हैं।" मैंने सपाट कहा। 

"अरे बुद्धू...वैसा विद्यार्थी नहीं…मेरे पास डॉक्टर की उपाधि है, कई पुस्तकें लिख चुका हूँ और कई सम्मान भी हैं मेरे खाते में। परन्तु सीखना चलता रहता है।"

"ऐसे विद्यार्थी तो सभी होते हैं। मेरे अनुसार जो ऐसा विद्यार्थी नहीं वह जड़ है, वह ज़िंदगी को जीता नहीं, ढोता है।"

"अब झटपट महिला सोच से अलग कुछ लिख डालिए। खुशी हुई आपसे बात करके।" फोन कट गया।  

मैंने सोचा क्या उन आलोचक महोदय को मेरे से बात करके सच में खुशी हुई होगी? मैंने ऐसा अच्छा लगने जैसा क्या बोला होगा? मेरी बालसखा 'अंजू' आज भी अक्सर मुझसे कह देती है। "मेरी जान, बचपन से देख रही हूँ, तुझे पुरुषों से ढंग से बोलने की तमीज़ कब आएगी?" 

"अब कब आएगी फिर? शायद कभी नहीं। प्रिय दोस्त मैं अभिशप्त हूँ इस तरह ढंग से न बोल पाने की तमीज़ के लिए।" 

इसके बाद मैंने नई कहानी लिखी 'रहमत चूड़ी वाला' जो 'जनसत्ता के वार्षिक अंक २०१४' में छपी है। अब…क्या होगा आगे...? वैसा ही कोई फोन आएगा। आलोचक का?या फिर पाठकों का?


Tuesday, February 4, 2014

रंगीला बसंत है आया


बचपन में मेरे ऊपर बसंत रानीखेत ( उत्तराखंड ) में बरसा था।

उस दिन स्कूल की छुट्टी होती थी। पंडितजी सुबह सवेरे ही आ जाते थे। पंडितजी का आना ही अपने आप में उत्सव होता था। या तो किसी का जन्मदिन है या फिर कोई त्यौहार। 

उत्साह से बहुत सवेरे उठ कर नहा -धोने के बाद मुझे पीले रंग की सुन्दर फ्रिल और लेस वाली फ्रॉक मिलती थी और बालों पर लगाने को बसन्ती रंग का रिब्बन। और भाईयों को पीली बुशर्ट। सभी के घरों के बाहर बसन्ती रंग में रंगे रुमाल तार पर सूखते दीखते थे और आस-पास के सारे पेड़ों पर पीले फूलों की बहार। अद्भुत नज़ारा होता था। 

पूजा के बाद हलवा - पूड़ी, मिठाई और ये पीले रुमालों वाली थाली का एक - दूसरे के यहाँ आदान -प्रदान होता था। पंडितजी सरस्वती की पूजा और हवन कराते थे। पूजा में हम बच्चों की एक -एक पुस्तक भी रखी जाती थी। तब लगता था शायद यही एकमात्र बजह है जो हम हर वर्ष शराफत से अच्छे नम्बरों से पास हो जाते हैं। रेडियों पर बसंत के गीत पूरे दिन बजते रहते थे। हम किसी आलोकिक बासंती दुनिया में मदमस्त रहते थे। 

आज न पंडितजी हैं न पूजा है। न पीले रुमाल हैं न पीले फ्रॉक। न चोटी न पीला रिब्बन और न वक्त। मालूम ही कहाँ होता है कब बसंत है। कल शाम माँ का फोन आ गया था।  

" मन्नू कल बसंत है सरस्वती का पाठ और हवन करा ले। "

"मदरलैंड टाईम नही है कब कराऊँ ? कुछ शोर्टकट जैसा बताओ वो क्या बताया था पिछले साल ,भूल गई……वैसा ही  "

"छि तू भी कैसी हो गई है कहा.…ढंग ही खराब हो गया तुम बच्चों का तो "

"माँ मुझ बेढंगी को ये तो बता दो करना क्या है इस बसंत का? कुछ लाना है तो बाज़ार अभी खुला होगा। "

" अब कैसा बसंत करोगे तुम लोग और क्या अपने बच्चों को सिखाओगे। अनाड़ी हुए तुम लोग सच्ची। छी.…  "

"यार माँ अब ये कोसना छोड़ कर जल्दी बता भी दो। "

"पीले मीठे चावल और हलवा बनवा लेना और एक पीली अच्छी साड़ी -जोड़ा और दक्षिणा मंदिर में पंडिताईन को दे देना। पैर भी छू लेना बाबू। बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते रहना चहिए। "

माँ की आवाज सुनकर तभी से रुलाई सी कहीं पर अटकी हुई है। वो अकेले में रोने का आनंद ही कुछ और है न इसलिए। 

अब आज के दिन का सफ़र शुरू करने घर से निकलूँगी तो सब कुछ करती हुई जाउंगी। फिर बचपन को याद करती हुई आँखें नम करूंगी। पंडिताईन हर बार की तरह मुझे मायूस देख कर अपने खुरदुरे हाथों से मेरे गाल और सर को सहला देगी और में आगे के सफ़र में कुछ देर सब कुछ को याद करते हुए अंजुरी भर जल और छल्काउंगी। बस फिर इस वर्ष का भी बसंत पूरा हो जायेगा ……… 

ये बचपन इतना सुन्दर क्यों होता था ? ये मुझे ही याद आता है या फिर सभी को ? 

छी अनाड़ी ही हुई मैं तो सच्ची ……………।  

Sunday, September 29, 2013

ये वादियाँ ये फिज़ाएं बुला रही हैं हमें ( The hills are alive )


दिल्ली एक खूबसूरत, जगमगाता हुआ शहर है और इसने पिछले पच्चीस वर्षों में मुझे बहुत कुछ दिया है फिर भी मैं अहसान फरामोश पहाड़ों का मोह कभी छोड़ नहीं सकी। दिल्ली से अब मन ऊबने सा लगा है और पहाड़ अति याद आने लगे हैं। जानती हूँ दिल्ली कभी नहीं छोड़ पाउंगी, यहीं रहना होगा, दूर-दूर तक भी जाने का कोई चांस नहीं है फिर भी उम्मीद करने में क्या बुराई है। उम्मीद पर तो दुनिया कायम है। इतने वर्षों में भी ये शहर मेरा मन नहीं बहला सका। काश ये शहर मुझे रास आ पाता तो मैं दिल्ली को लिखती……. 

पिछले दिनों नैनीताल में घूमते हुए सोच रही थी कितना कुछ है यहाँ सुकूनों आराम पाने के लिए। रोप वे, हनुमान गढ़ी, ठंडी रोड, किलबरी, कैमल बैक, गवर्नर हाउस, केव गार्डन, चाइना टाउन, तिब्बती मार्किट , नैना देवी मंदिर, माल रोड, हरे - भरे जंगल, टूरिस्ट से भरी व्यस्त सड़कें आदि।

फिर वहां की संस्कृति, तीज-त्यौहार, शरदोत्सव, नंदा देवी मेला। गर्मियों में शीतल हवा और बौछारें और उनके बीच अचानक ही सर उठता हुआ इन्द्रधनुष, सर्दियों में अभिभूत करती बर्फ से ढकी वादियाँ, मकान, दरख़्त, पहाड़ आदि और सबसे शानदार शहर के बीचों - बीच बना आलीशान ताल जिसमें कभी उगते और डूबते सूरज की आलता लगाए किरणे झिलमिलाती हैं तो कभी रंगबिरंगी नौकाएँ और उन पर बैठे सैलानी खिलखिलाते हैं।

रस्किन बांड ने सारा मसूरी लिख दिया, मैं भी वहां पर रह कर सारा नैनीताल लिखना चाहती हूँ। एक घर हो वहां पर छोटा सा, कालीनों से सजा हुआ आरामदायक। जिसमें बहुत पूराना फर्नीचर हो, ज्यादा कुछ नहीं बस एक छोटा सा टेबल, कुर्सी, ढेर सारी किताबों से अटा हुआ बहुत बड़ा सा बुक रैक, कमरा गरम रखने के लिए अलाव, सोने के लिए छोटा सा दीवान, स्नोवाईट जितना छोटा नहीं, उससे थोडा बड़ा। और हाँ एक रॉकर झूलने के लिए, उसके बगैर तो अपना गुजारा नहीं है।

कोई मेरे लिए वहां पर ऐसा वाला घर ढूंढ़ दो…… पलीज्ज्ज्ज़। 

Thursday, June 13, 2013

ये कौन सा दौर है उम्र का


चार्मिंग वीमेन क्लब ऑफ़ फोर्टी प्लस....हाँ यही तो नाम दिया था सरिता ने हम सभी बचपन से साथ में पढने वाली और इत्तफाक से ज़िंदगी के इस मोड़ पर एक -एक कर मिली हुई सहेलियों के ग्रुप को।

कहतें हैं 40 वर्ष के होने पर इंसान समझदार हो जाता है। इस तरह पिछले कुछ वर्ष से में भी समझदार की सूची में स्वतः ही आ गई हूँ। अब मुझे इस बात का पता नहीं चला या फिर किसी ने कहा नहीं..वो अलग मुद्दा है। बेवकूफ हो तुम....ये यदा - कदा सुनने को आज भी मिल जाता है। 

बहरहाल अब मुझे पता है कि उम्र के हिसाब से मैं भी समझदार हो गई हूँ...कहा था मैंने मित्रों से - "अब तुम सभी को मेरी बात माननी चाहिए और मुझ से राय मशवरा लेते रहना चाहिए, मैं समझदारी की उम्र में जी रही हूँ।"

"ओए चुप कर...तू निराली समझदार नहीं हुई है समझी...हम सभी उम्र के इसी दौर से गुजर रहें हैं। आई बड़ी समझदार..." पहली आँखें तरेर देती है। 

"हम सब हमउम्र हैं...इसलिए उम्र के हर पहलू पर हमारा सामान अधिकार है, तू समझदार हुई तो क्या हम नहीं हुए, बात करती है" दूसरी घुड़क देती है। 

"ओ हेलो...तू किसी गलफहमी में मत रहना....तुझे क्या लगता है तू 40 पार करके समझदार हो गई है और हम अभी तक यौवन की अंगड़ाईयां ले रहे हैं। बेवकूफों वाली बात मत किया कर तू .." तीसरी गरजी। 

ये दोस्त लोग भी न कितने गंदे होते हैं....फ्री में समझदार भी नहीं होने देते....छि। लव यू बाल सखियों। 

Tuesday, November 27, 2012

आवाज़ दो कहाँ हो ( Nostalgia )


बचपन में जब हम समाचार की सार्थकता समझते भी नहीं थे तब सुबह-सुबह घर पर चल रहे रेडियो में जैसे ही भजन की स्वरलहरिया समाप्त होतीं थीं अचानक से धीर-गंभीर, मिठास और अपने सारे सम्मोहन के साथ एक आवाज़ आकर्षित कर लेती थी।

' ये आकाशवाणी है, अब आप देवकी नंदन पाण्डेय से समाचार सुनिए  ......'

स्कूल के लिए तैयार होते रहते थे परन्तु कान उस आवाज़ के मोह से दूर नहीं जाना चाहते थे। देवकी नंदन पाण्डेय जी को जानते नहीं थे कभी रु-ब -रु भी नहीं हुए थे परन्तु काफी बड़े हो जाने तक भी जब-जब उस आवाज़ को सुनते थे मन श्रद्धा और प्रेम से भर उठता था। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं, परन्तु अपनी शहद से मीठी अद्भुत आवाज़ की उन यादों के साथ वे कई दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।      

इसी तरह की एक और आवाज़ जिसने मुझे उद्वेलित किया वो थी।

'गणतंत्र दिवस की इस पावन बेला में ... आप सभी का स्वागत है ......'

और जसदेव सिंह जी की इस बुलंद आवाज़ मात्र से ही दिल में देशभक्ति का ज़ज्बा हिलोरे मारने लगता था। जनवरी माह की मीठी ठण्ड, प्रकृति और दिन विशेष का जो आँखों देखा हाल अपनी जोश और जुनून से भरी दमदार आवाज़ में जसदेव सिंह जी सुनाते थे वो भावविव्हल कर जाता था और आँखे नम करता बच्चों और बड़ों सभी में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जोश भरता अभिभूत कर देता था। 

इसी श्रृंखला में आगे याद आते हैं अपने मनमोहक, निराले अंदाज में बोलते।

'नमस्ते बहनों और भाइयों मैं ..... आपका दोस्त ...... अमिन ....... सयानी ......'

सीलोन रेडियो से बिनाका गीतमाला प्रस्तुत करते अमिन सायानी अपनी आवाज़ के जादू से सबको बाँधें रखते थे। रात्रि आठ बजे आता था शायद ..(बिनाका गीतमाला जो-1952 से शुरू होकर-1988 तक चला उसके बाद ये विविध भारती के नाम से चला)....... और हम सब बेसब्री से उसका इंतज़ार करते थे। उनकी आवाज़ की खनक, ताज़गी और जिंदादिली श्रोताओं को बांधे रखती थी। उनकी ज़िंदगी से भरपूर आवाज़ से रात्रि के उस प्रहर में भी नहाई-धोई सी सुबह की खुशनुमा ताज़गी का अहसास होने लगता था। 

तब उस समय के मीठे और कसक भरे गीतों को पिरोती उस अद्भुत आवाज़ से हमें प्यार हो गया था। लगता था वही एक आवाज़ है जिसने हमारे मन को खूबसूरत ख्वाब दिखाने शुरू किये। गीतों में भी कितनी ताकत होती है। वो दिलकश आवाज़ हमें गीत सुनाती रही और हम बचपने को पीछे धकेलते गुड़ियों का ब्याह रचाना छोड़कर अचानक सपनो के राजकुमार की तमन्ना करने लगे। काल्पनिक संसार में दिवास्वप्न देखते, बेपंख उड़ने का भी अपना ही आनंद होता है।  

गुज़रते वक्त के साथ -प्रोग्राम्स बदल गए, गीत बदल गए, रेडियो का साथ देने टेलीवीज़न भी आ गए फिर वक्त और हालात बदल गए। इसी तरह और भी कितना कुछ बदल गया।  

इन सभी लोगों ने तो आवाज़ की दुनिया से लगभग अवकाश (जसदेव सिंह जी और अमिन सायानी जी आज भी कुछ सक्रीय हैं) ले लिया परन्तु इस तरक्की के दौर में इतनी स्पर्धा और टी आर पी की दौड़ में अत्यधिक मानसिक और राजनैतिक दबाव के चलते इन आज की आवाज़ों के लिए क्या रेडियो और टी वी के द्वारा दर्शकों के दिलो-दीमाग तक पहुँच पाना आसान रह गया होगा .........?

Wednesday, October 31, 2012

तुम याद आए बहुत याद आए


गाँव की सैर पहाड़ों का ठंडा हवा पानी और साफ़ शुद्ध वातावरण। उस पर ताईजी की ममता और उनकी केतली में पकी चाय की बात ही कुछ और है। जर्सी गाय के खालिश दूध और लकड़ी के धुंए की खुश्बू से मिलीजुली अपने विशेष स्वाद के साथ बनी इस चाय का आनंद में बहुत उठा चुकी हूँ। कितनी ही बातों और मुलाकातों की गवाह है ये चाय। कभी अकेले तो कभी दुकेले। 

ताई आज भी काफी स्वस्थ्य, जिंदादिल और जीवट वाली महिला हैं। अपनी निराली गणित समझाती हुई कहतीं हैं।

"तेरी सबसे बड़ी बुआ की और मेरी शादी दस दिन के आगे पीछे हुई थी। उनका बेटा अब कितने साल का हो गया होगा? मैंने तो स्कूल पढ़ा नहीं अब तू हिसाब लगा तो। " और मैं हिसाब लगाती हूँ अस्सी वर्ष। 

"ताई जब आप मरोगे ना तो अपनी ये केतली मुझे दे जाना। इसका निराला स्वाद और बचपन से लेकर आज तक की बहुत सी यादें हैं इसमें बनी चाय के साथ।"

माँ मेरे इस तरह बोलने पर नाराज़ हो जातीं हैं। परन्तु ताई बहुत जोर से हंस देतीं हैं।

"बाबु तू भी, कुछ और मांग तो।"

"नहीं ताई कुछ और नहीं, मुझे बस यही केतली चाहिए। "

"हाँ हाँ तेरे नाम कागज लिख दूंगी इसका। " वो हंसती हुई स्नेह से मेरा सर सहलाने लगती हैं। 

"ताई मेरे बाल तो खराब मत करो। " मैं उँगलियों से अपने बिखरे बाल सवांरती हुई उन्हें फिर छेड़ती हूँ।

"ये बाल बनाए ठहरे तूने ? कैसे कर रखें हैं झाड़ जैसे......तेल क्यूँ नहीं डालती इनमें? तुम आजकल के बच्चे लोग भी ठीक नहीं हो। "

"आजकल बालों में तेल नहीं डालते ताई ऐसा ही फैशन है। "

"तेरा सर है फैसन आ इधर। " कहकर वो ढेर सारा संरसों का तेल मेरे सिर में उड़ेल देती है। धीरे-धीरे सर की मालिश करती हुई गाँव भर की बातें बताने लगती है और मैं पानी में भीगे पिल्लू जैसी शक्ल बनाकर रसकिन बॉन्ड की कहानियों में सर डुबाए रखती हूँ।

पहाड़ों की जाड़ों की गुनगुनाती धूप और सर की मालिश, कब आँख लग गई पता ही नहीं चला। चेहरे पर किताब का शामियाना लगाकर खूब सोई थी शायद। ठीक से याद नहीं पड़ता पिछली बार इतने चैन की नींद कब आई थी। 

सोचती हूँ इतना सुकून और शांती कैसे महसूस कर रही थी? महानगरों की तेज रफ्तार ज़िंदगी में परेशानियाँ, शोर, प्रदूषण, घुटन, व्यस्तता और उलझन से खुश्क होते दिमाग पर तेल की तरावट का असर था या फिर ताई के स्नेह का.........?  



Saturday, September 15, 2012

'सभी को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं ' ( 2012 )

"हवाओं के विपरीत चलने की आदत है मुझे 
तुम हवाओं के साथ चल लो तो भी कोई बात बने "

हर छोटे बड़े अवसरों को पकड़ कर आनंद से जिया जाए तो हर दिन एक उत्सव बन जाएगा। फिर उत्त्सव मनाना किसी को बुरा लगता हो । ऐसा तो नहीं देखा ज़माने में...

जब लोगों को कहते सुनतीं हूँ हिन्दी दिवस ढोंग है, ढकोसला है तो सोचती हूँ रोने से तो अच्छा है कमस कम एक दिन ही सही होली, दीवाली की तरह इसे भी त्यौहार समझ कर ही मना लें। वैसे ही ज़िंदगी देश के अलग-अलग मुद्दों से बेरंग हुई जाती है....

मैं विज्ञान की विद्यार्थी रही हूँ। हिन्दी मेरा विषय नहीं रहा परन्तु हिन्दी से लगाव हमेशा से था, है और रहेगा। बचपन में जब कॉन्वेंट में पढ़ते थे तब हमें हिन्दी में बोलने पर फाइन देना पड़ता था। आसपास और घर पर हम सब हिन्दुस्तानी और देशभक्ती के ज़ज्बे से ओत-प्रोत होते थे और स्कूल में हम अंग्रेज़। हुआ यूँ कि जितना फाइन देते गए उतना हिन्दी से प्रेम बढ़ता गया। तब तो लगता था कि अँगरेज़ तो चले गए और पता नहीं क्यूँ ये बवाल हमारी जान को छोड़ गए। 

फिर मित्रों के साथ सलाह बनाई..जब भी सिस्टर कोई बात समझाए तो ऐसे स्वांग करेंगे जैसे उनकी बात पूरी तरह से समझ ही नहीं आ रही है। हमारी इस हरकत पर वे प्यारी सी सह्रदय ममतामयी सिस्टर कभी -कभी खीज भी जाती थी। वक्त के साथ नैतिक शिक्षा की उन सिस्टर ने हमें अपनी बात समझाने के लिए हिन्दी सीखनी शुरू कर दी टूटी फूटी हिन्दी में वे हमें अपनी बात समझाती थीं। 


"तुम लोग बिग मैन बनेगा, डीसेंट ,वैल मैनर्ड बनेगा...इंग्लिश पढ़ेगा, समझ गया?" प्यार से अपनी बात समझाती सिस्टर इसलिए मुस्कुराती कि हम बच्चे ध्यान से उनकी बात सुन समझ रहें हैं। कनखियों से एक दूसरे को देखते, नासमझ बनते मुस्कुराते तो हम शैतान बच्चे भी थे परन्तु इसलिए कि सिस्टर अच्छी हिन्दी सीख रहीं थीं...

'सभी को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं '


Monday, July 30, 2012

हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती संभाल के

 


 कुछ दिन पूर्व नैनीताल में घूम रही थी, मई जून वहाँ पर टूरिस्ट सीज़न होता है। सभी प्रान्तों के सैलानी घूमते दिख जाते है शाम के वक्त नैना देवी मंदिर, तिब्बती बाज़ार और ताल के किनारे माल रोड पर लोग एक दूसरे को धकियाते चलतें हैं। 

रोपवे जाना, बोटिंग करना, तिब्बती बाज़ार में खरीददारी करना, ताल के किनारे टहलना, मोमो, चाट-पकोड़ी, गर्म चाय, भुट्टा, मौसमी फल आदि खाते-पीते और ठंडी हवाओं का आनंद लेते रहो। वर्षों बीत गये, बचपन से नैनीताल में यही सब देख कर रही हूँ , कहीं कोई बदलाव नही।  इतना मशहूर टूरिस्ट प्लेस है फिर भी उत्तराखंड सरकार ने पता नहीं इसके सौन्दर्यीकरण के लिए अब तक क्या किया। 

दुसरे दिन बहुत सुबह अपनी खिड़की से ताल की खूबसूरती को देख रही थी| हो चुकी बारिश की वजह से हल्की धुंध थीl ताल के किनारे पम्प हॉउस के पास कुछ हलचल दिखी। कुछ लोग ताल में उतरे हुए से दिखे | सोचा सैलानियों के लिए कोई स्विमिंग क्लब बन गया होगाl उत्त्सुकता वश नीचे पहुँच जाती हूँ, और माहौल का जायजा लेती हूँ। भीड़ में खड़े कुछ नवयुवकों से बात करके बेहद आनंद आया। 

कुछ वर्ष पूर्व बनी नासा एक स्विमिंग एसोसिएसन है जो इन नेशनल लेवल तक खेले हुए लोगों के स्वयं के प्रयास से बनाई गई है। बहरहाल सरकार उनकी मदद के लिए तो कुछ नहीं कर सकीं हाँ थोड़ा रोड़ा अटकाने का उनका प्रयास जारी रहता था।  ऐसा उनका कहना है। वहाँ पर उसी पर मीटिंग भी हो रही थी। 

उन्ही में से एक जोशीले नेशनल लेवल तक खेले हुए नवयुवक ने बताया की- "यहाँ पर बच्चे और बड़े सभी सीखते हैंl पूरी देख-रेख के अन्दरl  हमारे सबसे अधिक उम्र के कोच देखिये वो रहे ७५ वर्ष के जो देखने में सिर्फ ५५-६० के आस -पास के लग रहे थे | हम ही मेम्बेर्स इस ताल के इर्द-गिर्द सफाई का भी ध्यान रखते हैंl  सैलानियों द्वारा फैलाया कबाड़ इकठ्ठा करवाते है और उसे बेच कर महिने में एक बकरा पार्टी का आयोजन हो जाता है " हँसते हुए बताता है l

"हमेशा तो कबाड़ फ़ैलाने के लिए सैलानी नहीं होते ना तो उस महिने तो बकरे की अम्मा खैर मनाती होगी ?" मज़ाक में पूछ लेती हूँ।

"हम तो खुद उस दिन का इंतज़ार कर रहें हैं, इतना मशहूर टूरिस्ट प्लेस है साफ़ रहेगा तो हमारा ही नाम होगा, मगर ऐसा होता नही पार्टी हो ही जाती है " थोड़ा मायूस होकर कहता है | 

"सरकार को तो तुम्हारी मदद करनी चाहिए। टूरिस्म प्रमोट होगा तो उन्हें भी तो फायदा है ?"

"इसी बात का तो रोना है ना खुद करतें हैं ना हमें करने देते हैं| कुछ दिन पहले किसी आफिसर ने शिकायत कर दी थी, कि बच्चों के डूबने का खतरा है, तब से बंद हो रखा है, अभी हमने स्टे ले लिया है, कोई मदद को आगे नहीं आता " थोड़ा परेशान होकर कहता है | 

"यदि आज तुमने यहाँ पर नहीं सीखा होता तो नेशनल कैसे खेलते ?"

"मैम हमारी तो छोडिये, तैरने का जुनून था हम सबको| पहले आस-पास सीखते रहे जब लेंथ और विड्थ करने का समय आया तो यहीं आये| तब यहाँ पर बोटिंग पुलिस वालों की निगरानी में होती थी| हम कुछ दोस्त मिलकर एक बोट किराये पर ले लेते थे और बीच ताल में जाकर उसे पलट देते थे फिर वहाँ से खूब प्रैक्टिस कर के ही किनारे पर लौटते थे " हँसते हुए पूरे जोश से बताता है |

अगर जोश और ज़ज्बा हो तो कामयाबी ख़ुद ब ख़ुद रास्ता देती है। कुछ पंक्तियाँ उन नवयुवकों के जुनून और उत्साह को समर्पित करती हूँ l

"हमने कागज़ की कश्तियाँ नहीं पलटीं हैं 
मुकद्दर के सिकंदर है 
ज़िंदगी की बाजियां पलटते हैं "

Monday, January 23, 2012

'संस्कार' ने मनाया सरस्वती पर्व

"हर दिन उत्सव का दिन है, एक- एक दिन आनंदमय जीते-जीते पूरा जीवन ही उत्सव सा जिया जाता है"
डॉ हेम भटनागर जानकी देवी महाविद्यालय की सेवानिवृत प्रधानाचार्या रही हैं, उन्होंने 1981 में हिन्दी को बढ़ावा देती 'संस्कार' नामक स्वैच्छिक संस्था की नीव रखी, कई पुस्तकों की लेखिका व वृषभदेव पुरस्कार, निष्काम सेवी पुरस्कार, बाल और किशोर साहित्य सम्मान और हिन्दी के क्षेत्र में विशेष योगदान के अनेकों पुरस्कार इनके हिस्से में हैं...84 वर्ष की अवस्था में आज भी उतनी ही सक्रीय हैं। 

22 जनवरी रविवार को संस्कार'  की सभा अनुभव आनंद ने सरस्वती पर्व मनाया। ठंडे दिन के बावजूद भी बहुत से उत्साही मित्रों की उपस्थिति बनी रही। इस बार सभा का आयोजन अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर के घर पर ही किया गया। 

स्वागत और परिचय के बाद शुरू हुआ सरस्वती पूजन और बसंत के मधुर गीत, जो अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर द्वारा लिखे और लयबद्ध किये गये थे। उन्हें मधुर स्वर दिया, संगीत साधिका श्रीमती प्रमिला भटनागर, अनिता चुघ, श्रीमती मधुलिका अग्रवाल व अन्य सभी साथियों ने। 

 यहाँ पर उम्र का अंतर नहीं होता संस्कार का यही एक ज़ज्बा मुझे बेहद आकर्षित करता है। सभी मस्ती में, मिल- जुल कर गाते और खुशियाँ बिखेरते हैं। 
संगीतमय सफ़र के बाद संस्कार सचिव श्रीमती मधुलिका अग्रवाल के द्वारा संस्कार की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई.....बीते माह और संस्कार गोष्ठियों का लेखा जोखा। उसके बाद संस्कार अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर ने की कुछ बात मित्रों से। इस बार गोष्ठी का विषय था ' काव्यमयी,पौराणिक या साहित्यिक अपने परिचित फूलों की कहानियां। 
सभा को आगे बढ़ाते हुए फिर कुछ सदस्यों द्वारा वासंती सुगंध लिए कविता पाठ, फूलों पर लघु कहानियां और आलेख प्रस्तुत किये गये। श्रीमती मीना जैन (उपाध्यक्ष संस्कार)  श्रीमती इंदु जैन, कौसल्या गुप्ता (सेवानिवृत प्रोफ़ेसर मिरांडा हाउस), अनुराधा गुप्ता( समाज सेविका), कई पुस्तकों के लेखक व लेखिकाएं श्री धर्मप्रकाश जैन, जनक वैद, विभा जोशी (बाल भारती प्रकाशन), अंशु जैन, इंदु जैन, प्रकाश जी और श्री अर्जुन पांचोली आदि सदस्यों ने भी अपने विचार रखे। 
 अंत में सभी ने स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया। सभा के साथ ही पुस्तक प्रदर्शनी भी लगी थी, संस्कार की चतुर्मासी पत्रिका 'कलरव'  संस्कार का वार्षिक केलेंडर 'बारामासा' बाल लेखन और व्यस्क लेखकों द्वारा रचित पुस्तकें भी यहाँ पर उपलब्ध थीं। 

बसंत की आहट पहचानती बसन्ती बयार सी सुगन्धित,  आपसी मेल- जोल, लेखन और ज्ञान को बढ़ावा देती 'अनुभव आनंद' की ये सभा सरस्वती जी का आशीर्वाद लेती फिर मिलने तक संपन्न हुई।

Friday, October 28, 2011

Dedicated to that care n concern


उस दिन कुछ विशेष करने को था नहीं, सुबह से ही अजीब सी उदासी घेरे हुए थी।  शनिवार वैसे भी विदेशों में बड़ा सुस्त दिन होता है। चाय समाप्त करके ओर सेंडविच हाथ में लिए ही अपने अपार्टमेंट से नीचे उतर आई थी। अपनी बोरियत दूर करने के लिए मुझे दूर तक चलते रहना और रास्ते भर कुकम्बर और चीज़ सेंडविच कुतरते रहना अच्छा टाइम पास लगता है। 

हर मूड के लिए मेरी कुछ ख़ास जगह बन जाती हैं ओर उन जगहों की पुनरावृत्ती मुझे उस मूड से काफी हद तक उबार भी लेती है। कुछ देर बाद मैं हरी घास और रंग-बिरंगे फूलों से सजी लेक के किनारे लगी बेंच पर बैठ गई थी। लेक में बतखें पूरी स्वछंदता से तैर रही थीं।

पार्क में छोटे-छोटे गुलाबी सफ़ेद प्यारे से बच्चे भी खेल रहें थे। मज़ाक में एक दिन किसी हिन्दुस्तानी मित्र से मैंने कहा। "ये अंग्रेज बच्चे इतने साफ़ सुथरे और प्यारे से कैसे होते हैं?" वो भी शरारत से आँख दबाता हुआ बोला "उनकी मम्मियां भी तो वैसी ही होती हैं"

मुझे इन गोलू से, डाइपर से उठे हुए  हिस्से को मटकाते हुए, बतख की तरह चलते, लुढ़कते, उठते बच्चे, बड़े प्यारे लगते थे। उनके पास जाकर उनसे बातें करती, सहलाती, पुचकारती हूँ, तब वो खिलखिलाते, मचलते, खुशी से किलकारियां भरते मुझे और अपने आप को पार्क की रेत से नहला देते थे। बीच-बीच में पानी पर तैरते जहाज़ होर्न बजाते शोर करते साइड में खड़े मुसाफिरों को लेने आ जाते थे और उसमें सवार लोग हम जैसे तट में बैठे लोगों को हाथ हिलाते, मुस्कुराते आगे बढ़ जाते थे।

मन तब भी नहीं बहल पाया तो वापस घूम कर हौलीहौक की सुर्ख लाल फूलों से लदी डाली के नीचे हरी घास पर आकर बैठ गई। जुलाई के महिने में भी स्विट्ज़रलैंड के लुसेर्न की बर्फीली ठंडी हवा में मुझे सूरज की तापिश महसूस नहीं हुई और कुछ देर बाद अचानक ही बारिश की फुहारें भी शुरू हो गयीं। उसी तरह भीगते हुए मैं अपनी सोचों को आकाश की ऊंचाई तक पहुंचा देती हूँ। तभी कंधे पर किसी के हाथों का स्पर्श महसूस होता है।

"What the hell..... तुम यहाँ पर क्या कर रही हो?" वो मेरे सर के ऊपर छाता करता हुआ बोला।

"बैठी हूँ...... सोच रही हूँ आज इस पेड़ की सारी पत्तियां गिन दूँ कैसा रहेगा?" मैं मुस्कुराकर कहती हूँ।

"इसे बैठना नहीं कहते, अपने आप को सब से दूर रख कर छुपना कहते हैं, you mad girl.... सब तुम्हारा उधर सेटरडे गेदरिंग में इंतज़ार कर रहे होंगे और एक तुम हो। "

"एलेक्स तुम जानते हो ना मुझे पार्टी और भीड़ में रहना अच्छा नहीं लगता। "

एलेक्स अच्छी कद-काठी का, हमेशा हरी -वरी में रहने वाला, थोड़ा बडबोला, हाजिर जवाब, जल्दी गुस्सा करने वाला मगर बहुत ही कैरिंग इंसान था। वैसे वो मुझे कोई खास पसंद नहीं करता था क्योंकि मैं उसकी कभी कोई बात जो नहीं मानती थी।

"यु सिली गर्ल, कल तुमने वादा किया था तुम वहाँ आओगी। "

"अब अंकल सेन्द्रो और एमिला आंटी के सामने क्या कहती? उन सभी से कई बार मिल चुकी हूँ ना। तुम जानते हो न एलेक्स अक्सर काफी, वाईन, बीयर, सिगरेट, केक, सुगन्धित मोमबत्तियां आदि की मिलीजुली महक से मेरा सर चकरा जाता है। "

"नो वे..... अभी चलो मेरे साथ। " मेरा हाथ पकड़ कर वह मुझे लगभग खींचता सा है।

"देखो एलेक्स तुम पहुँचो.....मैं झटपट कुछ फोटो क्लिक कर के ३० मिनट में पहुँचती हूँ हम्मम्। " परन्तु मैं उसे बहलाने की कोशिश में कामयाब नहीं हो पाती हूँ।

"कैसा रहेगा,  इफ आई विल हिट ओन यौर हेड? तुम सीधी बात करना तो जानती ही नहीं हो। वाई डोंट यु बिहेव लाइक एन ओर्डीनेरी गर्ल?"

मेरे ज़ोर से हंस देने पर वो और भी गुस्से में आ जाता है। मैं जल्दी से अपना बैग उठाती हूँ। मुझे ओल्ड टाउन जाना था। मित्रों के लिए कुछ सोविनियर और गिफ्ट्स खरीदने थे।

वो मेरा हाथ पकड़ कर मायूस होकर कहता है -" सो कल वापस इंडिया जा रही हो?"

"..........."

"मिस करोगी मुझे?" वह प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखता है।

"कह नहीं सकती, कुछ काम होगा तो कहूंगी।" मैं हंस देती हूँ। मित्र लोग कहते हैं वो गज़ब का फ्रेंड इन नीड है....... और मैं... बहुत जरुरत होने पर भी किसी से मदद लेना मुझे बेहद संकोच से भर देता है।

" फ़ोन करोगी ?"

"नहीं.....मेरा कितना बड़ा बिल आ जाएगा। " फिर से उसे छेड़ती हूँ। मुझे मेरे आड़े-टेड़े जवाबों से मायूस हो जाते लोगों पर बहुत दया आ जाती है, और ढेर सारा प्यार भी......इतने संजीदा होने से भला दुनिया चलती है क्या?

"अगर मैं फोन करूँ तो पिक तो करोगी ना?" वो अपनी ही रौ में आगे बोलता है।

"बहुत ज्यादा चांसेस हैं ना उठाऊं, रोज- रोज क्या बात करेंगे हम?" वो मेरे थोड़ा और करीब आ जाता है। अब उसका मस्क डीओ तेजी से महकने लगता है।

"तुम्हे अपने आप को ठगना बहुत अच्छा लगता है ना? पता नहीं किस झूठे भरम में जीती हो। इससे ज़िंदगी आसान लगने लगती होगी,  है ना?"

"..............."

"कभी फुर्सत में उन लोगों के बारे में सोचना जो तुम्हे प्यार करते हैं। तुम्हारे हर दुःख-सुख में तुम्हारे साथ बने रहना चाहते हैं, और तुम्हारी केयर करना पसंद करते हैं......इतना तो कर पाओगी ?"

"हाँ ये ठीक रहेगा एलेक्स, ये मैं जरुर करूंगी, वादा। " भावुकता को अच्छी तरह सँभालते हुए थोड़ा बेफिक्री से कह देती हूँ। वो जल से भरे बादल की तरह मुझे देखता है और पार्टी में आने की याद दिलाता हुआ चला जाता है। मैं आँखों में नमी को महसूस करती हूँ। क्योंकि जानती हूँ कुछ घंटों के बाद मुझे इंडिया वापस चले आना था और उससे ये ज़िंदगी की आखिरी मुलाकात साबित होगी। दो दिन बाद उसे भी हमेशा के लिए बड़ी जिम्मेदारी सँभालने न्यूयोर्क चले जाना था। उसके बाद एक बेहद साफ़ दिल का कैरिंग इंसान केवल एक याद बनकर रह जायेगा........जानती हूँ मैं।

इंडिया में लैंड करते ही सबसे पहला फ़ोन उसी का आ जाता है......जिसे मैं चाह कर भी नहीं उठाती हूँ। वो मेरी भीगी आवाज़ को झट पहचान जो लेता है। फिर शोर करता हुआ एस एम् एस आ जाता है।

"बने रहना हमेशा "

"रिगार्ड्स एलेक्स"


Tuesday, September 8, 2009

संस्कार ने 'अनुभव आनंद' की सभा में मनाया 'हिंदी दिवस'

"अपने जीवन को किसी एकांत क्षण में बटोर कर वर्तमान के बीते हुए दिनों की स्मृर्तियों से छू कर देखने पर हमारे भीतर एक प्रकाश की लहर दौड़ती है। वही तो हमें ठहराव की स्थिति में ला सकती है"
6 सितम्बर, रविवार को प्रातः का समय, सभी अति प्रसन्न। हिन्दी मातृभाषा के देश में हिंदी प्रेमियों का एक जगह पर एकत्रित होना सुखद क्षण था...प्रातः 10 . 45  पर मैं वहाँ पहुँची। संस्कार की संस्थापिका हेम भटनागर जी कुछ सहयोगियों की साथ वहाँ पहले से ही उपस्थित थीं। अपनी वही चिरपरिचित मुस्कराहट व सादगी से सुशोभित सभी कुछ व्यस्थित करवा रहीं थीं। दिखावे व आडम्बर से दूर एक हस्त लिखित व हस्त निर्मित बेहद खूबसूरत बैनर व संगीत वाद्य यंत्रों से सजा ये हाल एक अलग ही आभा बिखेर रहा था।

करीब 80 की वय का ये व्यक्तित्व व हिंदी प्रसार को अपने बेशकीमती 28  वर्ष देती हुयी, प्रेम बिखेरती, उत्त्साह वर्धन करती हेम जी आज भी ३० की वय के उन युवाओं को भी कहीं पीछे छोड़ देती है जो ज़िन्दगी की दौड़ में सामंजस्य ना बैठाता हुआ थका, हारा प्रतीत होता है।

जानकी देवी महाविद्याल में प्राचार्या पद को सुशोभित करती वे सादगी से भरपूर और हमेशा अनुशासन प्रिय रहीं। उनकी ठहराव ली हुयी, हौसला बढाती हुयी, सत्यता का पुट लिए बातें भीतर एक हलचल छोड़ जाती हैं व बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती हैं। उनका कहना है।


और आगे कहती हैं। -"किसी की सहमती हो या असहमति, दोनों स्थितियों में उनके भीतर सोच जन्म लेती है"


हेम जी संगीत को जीवन का अभिन्न अंग मानती हैं व समस्त प्रवीणता के साथ निभातीं भी हैं...अनुभव आनंद की कोई सभा बिना संगीत के हुई  हो मुझे ज्ञात नहीं। बहुत ही मधुरता से सभी साथी राग, भजन व गीत गाते हुए वातावरण को संगीतमय व हर्षित कर देतीं हैं।

सर्वप्रथम हेम जी ने संस्कार के समस्त परिवार व छात्राओं के साथ अपने अनुभव बाँटें व बीते दिनों की सुन्दर यादों को संजोया। जिनमें हमेशा की तरह अच्छा जीवन जीने के सन्देश भी समाहित थे। 'कलरव' पत्रिका का उद्देश्य भी यही रहता है।

"कोई अच्छा विचार अधिक से अधिक पाठकों तक पहुँचे, कोई संवेदनशील क्षण भावुक हृदयों में हलचल मचा सके " और इसमें वे अक्षरशः सफल भी रहती हैं। थोडा विचलित होकर कह उठती हैं।

"मीडिया,टी वी, अखबार, नित्य भ्रष्टाचार की ख़बरों में चारों ओर शोर के बीच अपने को, व अपने बच्चों को, अपने आस-पास को कैसे बचायें रखें? यह प्रश्न कठिन से कठिनतर होता जा रहा है.."

उनकी पुस्तक 'समर्पित अमृत पुत्रियों को' का भी लोकार्पण श्री अजित सिंह (किरोड़ीमल कॉलेज) के कर कमलों द्वारा हुआ। सभा का इस बार का विषय था - 'अध्ययन व अध्यापन के अनुभव' , सभी ने अपने अपने विचार रखें जो आगामी 'कलरव' पत्रिका में प्रकाशित होंगे।



धन्य हैं वो अमृत पुत्रियाँ जिन्हें हेम जी जैसी गुरु का सनिद्धय व वरद हस्त प्राप्त हुआ। वक्त हाथों से छूटा जा रहा था और कहने सुनने को बहुत कुछ था , उनकी छात्राओं ने भी गुजारिश की दो शब्द बोलकर वो अपने गुरु के चरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहतीं हैं। गुरु के महात्म्य को व्यक्त करते समय शब्द कितने कम पड़ जातें हैं ..



छात्राओं ने जब बोलना शुरू किया तो सिलसिला चलता ही गया...कितने ही भाव बहे, स्नेह, श्रद्धा, आदर, मुस्कुराहटें, प्रेममयी अश्रुजल कितना कुछ था की समय को अनदेखा करना ही उचित जान पड़ा...

बहुत से पुरूस्कार अलग -अलग क्षेत्रों में योगदान के लिए अजीत जी के कर कमलों द्वारा दिए गए, अंत में मनभावन संगीत व प्रसाद स्वरुप स्वादिष्ट भोजन कर मीठी यादें लिए सभी एक बार फिर बिछुड़ गए पुनः एकत्र होने के लिए....



Friday, July 31, 2009

अनुभव आनंद के पल !


कुछ दिन पूर्व डाक द्वारा खूबसूरत , हस्तलिखित निमंत्रण पत्र प्राप्त हुआ अनुभव आनंद की मीटिंग का था। फिर मित्र का फ़ोन आया -"कैसा लगा अनुभव आनंद का निमंत्रण पत्र? हस्तलिखित, कंप्यूटर की दुनिया से दूर...चल कर देख लें आप को अच्छा लगेगा। वैसे तो अनुभव आनंद नाम ही बहुत था आकर्षित होने के लिए।


नियत समय 10.30 बजे प्रातः रविवार को हम नियत स्थान पर पहुँचे। रंगबिरंगी साड़ीयों में संजीदगी से सँवरी लेखिकाएँ व बहुत कम संख्या में लेखक भी उपस्थित थे लगभग 50 - 60 के करीब। मित्र द्वारा परिचय करवाने पर सभी का गर्मजोशी व अपनत्व से मिलना मन को अति भा गया। ये थी संस्कार की सभा।

'संस्कार' का जन्म 1981 में हुआ व इसका उद्देश्य बच्चों व वयस्कों में नैतिक मूल्यों का प्रतिस्थापन करना है। साहित्यिक तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पुस्तक प्रकाशन करके सौन्दर्य बोध की पहचान कराना अहिंसा, प्रेम, तथा औचित्य का वातावरण बनाना इस का संकल्प है। इसके साथ ही पक्षियों के कलरव के सामान अत्यंत सहज, सरल व सुंदर चतुर्मासिक पत्रिका 'कलरव ' का भी सम्पादन हुआ।

उसी दिन उनके द्वारा लिखित पुस्तक 'पाँचों नौबत बाजती 'का लोकार्पण भी था। इस पुस्तक को उन्होंने अपनी छात्राओं को समर्पित किया है। कितना मधुर नाता व स्नेह रखतीं हैं वे सभी से। इस पुस्तक में उन्होंने कबीर को अलग-अलग रूप में देखा है। उन्होंने कबीर को शिक्षाविद ,संगीतज्ञ ,लोक गीतकार ,योगी ,साधक और भी बहुत से रूपों में ढाला है।

पुस्तक के मुख्य पृष्ठ पर हेम दी का एक मनोहारी चित्र है जिसे देखकर लगता है जैसे वे कबीर के दोहों में तल्लीन होकर भाव -विभोर हो उठी हों। किन्तु पुस्तक के अन्दर उन्होंने बताया है कि वह नियाग्रा फाल्स के तुषार कणों के स्पर्श से अभिभूत क्षणों में लिया गया चित्र है। 

अभी ये सब सुन समझ ही रही थी, तभी सामने से सौम्य,शान्त, सादगी की मूर्ती सी दिखलाई दी। वे थीं हेम दी, डॉ हेम भटनागर..'संस्कार' की संस्थापिका।

लगभग ८० वर्षीय अनुभवों का समृद्ध कोष लिए हुए। उनके बारे में कुछ कहना दीये को रौशनी दिखाने जैसा है। जानकी देवी महाविद्यालय में कई वर्षों तक प्राचार्या पद को सुशोभित कर ( तत्पश्चात प्रधानाचार्या ) अध्यापन के अनुभवों (इस नाम से पुस्तक भी प्रकाशित ) को निष्ठा पूर्वक निभाती हेम दी आज भी कई संस्थाओं व हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार को बढावा देती व्यस्त रहतीं हैं। हिंदी भाषा की अमूल्य साहित्यिक धरोहर व निधि को भली भांति संरक्षित करती दूसरों को भी उत्त्साहित करती रहतीं हैं। 

कार्यक्रम के द्वितीय चरण में कुमार गन्धर्व जी के पौत्र भुवनेश कोमकली जी ने अपने गायन -अवधूता 'युगन युगन हम योगी ' व कुछ अन्य रगों से सभी को मंत्रमुग्ध किया। कुछ गायन अपनी मधुर आवाज़ में महिला सदस्यों ने भी प्रस्तुत किया।

अंतिम चरण में शुद्ध ,सात्विक , स्वादिष्ट भोजन का आनंद लेते हुए हम सभी परिचय को और बढाते हुए हास -परिहास व पुस्तक -चर्चा करते व्यस्त थे तब...सभी पर अपनी स्नेह वर्षा करती हुई हेम दी मेरे निकट पहुँची। मेरा हाथ पकड़कर स्नेहिल हो बोली -

 "सब कुछ ठीक रहा ना? आगे तुम्ही लोगों को संभालना है।"

उनकी ज्ञान भरी ममतामयी बातों व स्नेहिल स्पर्श से मैं आह्लादित हो उठी। अति आनंद का अनुभव करते हुए मैंने सभी से अगली गोष्ठी तक के लिए विदा ली। 




Thursday, July 16, 2009

तुम सीता बनना



उन दिनों रामलीला का एक अलग आनंद होता था चैपाइयों में संवाद होते थे ।
सभी अपनी पंक्तियाँ कंठस्थ करते और फिर मधुर स्वर में गाते थे ।

तब मैं पाँच वर्ष की थी , एक बार इजाज़त मिली रामलीला देखने की ....कुछ सहेलियां ,दादी और पारिवारिक सदस्य । लक्ष्मण मूर्छा का दृश्य था..... वो नीचे मुर्छित पड़े थे और राम विलाप कर रहे थे । उनके उस करुण विलाप से हमारी आँखों में अश्रु भर आते थे ...

तभी बड़ा सा द्रोनांचल पर्वत लिए भरमाये हुए विशालकाय हनुमान का प्रवेश हुआ .....उनकी लायी संजीवनी बूटी से लक्ष्मण सचेत हो गए , और सभी ने खुश हो कर खूब तालियाँ बजाई। तब से हनुमान मेरे लिए दुनिया के सबसे बहादुर एवं आदर्श चरित्र हो गए ।

मैंने माँ से आग्रह करके उनकी बहादुरी की कई और कहानियाँ सुनी.... और फिर सहेलियों से उसकी चर्चा करती थी ... कैसे उन्होंने इतना विशाल समुद्र लाँघ कर सीता को बचाया या फिर अपनी पूँछ से अहंकारी रावण की सारी लंका को जला दिया था ।

उन दिनों जब कभी कोई मुझसे पूछता।

"बड़ी होकर क्या बनोगी?"

तो मेरा सहज और गर्वित उत्तर होता था

"मैं हनुमान बनूँगी"

सभी मेरी इस बात पर खिलखिलाकर हँस देते और मैं रुआंसी होकर माँ से शिकायत करती थी। भी मेरी बात पर मुस्कराती और कहती थीं।

"लड़कियाँ हनुमान नही बनती , सीता बनती ....हैं इसलिए तुम सीता बनना "

लड़कियों को सीता का और लड़कों को राम का आचरण करना चाहिए इस बात पर उनका अटल विश्वास था।

मेरी मायूसी यथावत बनी रहती ... पता नही क्यों पर मैं सीता कभी नही बनना चाहती थी उनका वो रूप - ऋगार , चमकीले वस्त्र व गहने भी मुझे कभी आकर्षित नही कर पाए........ वो राजकुमारी थीं लेकिन राजकुमारी जैसा कोई वैभव नहीं था , ज्यादा समय दुख ही उनका भाग्य था आँसू ही उनके साथी ...तब मेरा बाल मन द्रवित और परेशान हो जाता था उनके आंसुओं को देख कर ........

सीता का वन प्रस्थान ,रावण द्वारा हरण, अग्नि परीक्षा व ऋषि बाल्मिकी के आश्रम में निष्कासन उस समय भी मेरे बाल मन को उद्वेलित कर जाता था .......

फिर कभी रामलीला जाने की इजाज़त तो नही मिली पर समय - समय पर रामायण की कहानियाँ सुनती रही थी।

आज के परिवेश में भी हनुमान बनना ही उचित जान पड़ता है ....किसी को किसी भी रूप में जीवन दान कर पायें , किसी का दुख दूर कर सकें , बुराईयों व कुरीतियों का बहिष्कार कर पायें तो समझो जीना सार्थक हुआ ।

आज की सीता पर समाज का निर्दयी प्रहार जो उसका कोख में आने मात्र से ही शुरू हो जाता है , देखकर मन अवसादित हो जाता है । दबाई गयी ,सताई गयी ,जलाई गयी ,दहेज़ प्रथा की कुरितियो से प्रताड़ित व भेद-भाव पूर्ण व्यवहार से कुंठित सीता को देख कर मन द्रवित हो तीव्र वेदना से भर उठता है ........

और माँ के ये शब्द बड़े बेमाने लगने लगतें हें ....

" लड़कियाँ हनुमान नही बनती सीता बनती हैं इसलिए तुम सीता बनना "



Wednesday, July 8, 2009

मुलाकात आचार्य बालकृष्ण से ( पतंजलि योग )


कुछ दिन पूर्व ही शाम को ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन की आरती देखने पहुंचे। छोटे छोटे गुरुकुल के पीत वस्त्रधारी बच्चे इतनी खूबसूरती से भजन गा रहे थे कि मन बिभोर हो उठा। गंगा की पावन लहरों पर विराजमान शिव की विशाल साक्षात् रूप दिखाती मूर्ति अत्यंत भव्य थी। 

शिव भक्त हूँ इसलिए मुझे यहाँ पर कुछ ज्यादा ही आनंद आता है । और यहाँ जाने का मैं कोई भी मौका नहीं छोड़ती हूँ। गंगा के पावन जल पर विराजमान शिव की ये भव्य मूर्ति आह्लादित कर देती है। भजन, कीर्तन और आरती करते हुए एक घंटे का ये समय कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। यह वहां  क्रम है। विदेशी भी सैलानी भी इसका खूब आनंद लेते हैं। इसके बाद हरिद्वार के पतंजलि योग को देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ। 

पतंजलि दिव्य योग मंदिर (ट्रस्ट ) हरिद्वार के योग गुरु बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्ण आज किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। इस योग मंदिर की स्थापना 5 जनवरी 1995 को हुई थी। स्वामी रामदेव के योग की अलख ने भारत को न केवल विश्व में गौरवान्वित किया बल्कि मानव सेवा की दिशा में स्वामी जी ने 'सर्वे भवन्तु सुखिनः ' और वसुधैव कुटुम्बकम ' के भारतीय दर्शन को भी विश्व पटल पर पुनः स्थापित किया है। 

मुख्य द्वार के अंदर प्रवेश करते ही बहुत सुकून का अनुभव हुआ। यहाँ पर चारो तरफ हरियाली, फूल, जड़ी बूटियाँ, बेहद साफ़ प्रांगण व जगह - जगह पर प्राणायाम करते व्यक्तियों को देख कर मन आह्लादित हो गया। भारतवर्ष में जहाँ बहुत जनता जनार्दन का हस्तक्षेप हो वहाँ पर इतनी साफ़ सफाई जरा कम ही देखने को मिलती है। परन्तु पतंजलि योग में अत्यंत साफ़ -सफाई का ध्यान रखा गया है। हरियाली चारों तरफ बिखरी हुई है। 

उस दिन स्वामी रामदेव डॉक्टर्स के प्रशिक्षण कैंप में व्यस्त थे व आचार्य बालकृष्ण एक मीटिंग में। उनके आने तक एक सहायक का सहयोग मिला जिसने 'अतिथि देवोभव ' को चरितार्थ करते हुए सारे क्षेत्र का दर्शन कराया। लैब, पंचकर्म, षट्कर्म, वगेरह.. सब आधुनिक मशीनों से युक्त , हर्बल तेलों, वनस्पतियों व जड़ी बूटियों से लाभान्वित प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सकों की देख- रेख में होता है।

कुछ देर बाद हमने आचार्य बालकृष्ण के कक्ष में प्रवेश किया। वे अपनी सरल मुस्कान के साथ बहुत ही सहजता से मिले। अपने उस भव्य कक्ष में कई ट्राफियों व पुस्तकों के बीच घिरा वह व्यक्तित्व मुझे बहुत ही सकारात्मक उर्जा व सोच से लबालब प्रतीत हुआ। बातें करते हुए इतना अपनापन था कि वह उनसे पहली मुलाकात नहीं लगी। 

विद्यार्थियों के लिए योग की कुछ अप्रकाशित पुस्तकें दिखाते हुए वे बहुत उत्त्साहित नज़र आ रहे थे। सभी कक्षाओं में योग कैसे सरलता से सिखाया जाय उन पुस्तकों में यही सब बखूबी वर्णित था। हर क्षेत्र में उनका योगदान , सोपान दर सोपान आगे बढ़ते चलना अद्वितीय  है। 



आचार्य जी से हमने उनके शुरूआती दिनों के कई किस्से सुने व इस महान उपलब्धि प्राप्त होने तक बीच - बीच में आए कुछ खट्टे -मीठे अनुभव भी सुने। इन को वे परेशानी न समझ कर किस्से के रूप में ही सुना रहे थे। जिस पर उनके साथ ही हम सब भी खूब दिल खोल कर हँस देते थे। 



उनकी इतनी सहजता व सरलता को देख कर लगा ही नहीं कि मैं विश्व भर में भारत का नाम रोशन करने वाले पतंजलि योग के महामंत्री के सामने बैठी हूँ । उनका व्यहार कुशल होना , विनम्र , सहज , सरल , अंहकार से दूर रहना अद्भुत है। उनका अनुसरण करने को सब लालायित रहते हैं। ये कुछ विषेश गुण है जो उन्हें महान व्यक्तियों की श्रेणी में विराजमान करते हैं।

विदा करते समय उन्होंने श्रीमद् भगवत् गीता ' गीतामृतम ' व उपहार देकर मुस्कुराते हुए हमसे प्रतिदिन योग करने का वादा लिया और हरिद्वार , औरंगाबाद व अन्य स्थानों पर भी पतंजलि योग पीठ देखने आने का  आमंत्रण दिया।