Wednesday, December 30, 2015

ज़िंदगी इत्तफ़ाक है


जाते हुए वर्ष में सोचा कुछ तो मन की कर ही ली जाए। वर्षों से मन था हाथ में एक टैटू बनवाना था। इसके लिए ग्रेटर कैलाश पार्ट -2 में devil'z tattooz पहुँच गई। वहाँ मुझे आर्टिस्ट मिले हेंड्री लामा। एक प्यारे इंसान, महत्वाकांक्षी। ऐसे लोगों की जीवन कहानी में मुझे बेहद दिलचस्पी होती है। 

" कुछ डिज़ाइन है मन में ?" उन्होंने जिज्ञासा वश मुझसे पूछा। 

"हाँ....बिलकुल है। एक सुन्दर सा ॐ और उस पर त्रिशूल बना दो। शिव भक्त हूँ, सबको पता चलना चाहिए न।" हेंड्री ठठाकर हँस पड़े। 

मुझे हेंड्री एक मृदुभाषी और शांत व्यक्ति लगे इसलिए टैटू बनवाते हुए मैं उनका जीवन भी टटोलती रही। होंगे करीब तीस वर्ष के। दार्जिलिंग के रहने वाले। मैंने एक सवाल पूछा। "हेंड्री टैटू कैसे हुआ? इसके अलावा कुछ और चाहा नहीं या फिर इत्तफ़ाक से यही।" 

मुस्काते हुए झट बोले। "येस्स... इत्तफ़ाक से यही हुआ। मेरी माँ चाहती थी कि मैं कैमिस्ट्री पढूं और प्रोफेसर बन जाऊँ। इसलिए माँ की खुशी के लिए मैंने पढ़ी कैमिस्ट्री। बेमन से पढ़ी। पढ़ाई पूरी होते ही सोचा अब क्या? और एक दिन कहीं पर टैटू बनाने वाले को काम करते देख मंत्रमुग्ध हो गया। तो अचानक लगा। मुझे ये करना था। एकदम यही। बस फिर किसी की नहीं सुनी। मेरी दो बड़ी बहने हैं उनकी शादी हो गई। तब केवल माँ की जिम्मेदारी थी सो किस्मत आजमाने दिल्ली चला आया। अब यहाँ पर बारह वर्ष हो गए।"

हेंड्री अध्यात्म से भी प्रेरित लगे। उनका एक वाक्य कमाल का लगा। कहने लगे। "हम पूरी ज़िंदगी अपनी खुशी के लिए कितने ही काम करतें हैं। गहना, कपड़ा, घर, गाड़ी, पैसा न जाने क्या -क्या.....परन्तु जब हम संसार छोड़ते हैं तब, सब यहीं रह जाता है। केवल एक टैटू है जिसे हम अपनी खुशी के लिए बनवाते हैं और कमसकम वह हमारे शरीर के साथ अंतिम यात्रा तक तो रहता है।" 

"आर यू ऑलराइट मैम? चाय या पानी कुछ चाहिए?" काम करते हुए बीच -बीच में थोड़ा चिंतित स्वर में पूछ लेते थे। मुझे बड़ी हैरानी हुई। 

"हेंड्री मुझे कुछ होना चाहिए था क्या?" मैंने सवाल किया। 

"नो - नो इट्स ग्रेट " मेरी बात पर हँस कर बोले ।

भगवान जाने क्या होना था मुझे, जो नहीं हुआ। बाहर आने पर किसी अन्य से पूछने पर उसने बताया। टैटू बनवाते हुए कुछ लोगों को चक्कर आ जातें हैं। इतनी बारीक सुई के प्रिक से चक्कर ? बड़े बहादुर लोग होते होंगे वे। किसी की भी जीवन कहानियाँ सुनते हुए वैसे भी मुझे परम आनंद के सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता। 

"अपने को दस वर्ष बाद कहाँ पर देखते हो हेंड्री ?" मेरा टैटू लगभग बन चुका था। इसलिए झट एक आखिरी सवाल फिर पूछा। 

"अपने गाँव में, दार्जिलिंग। हम सब अपने गाँव के अपनी जन्मभूमि के कर्ज़दार होते हैं। इसलिए हर हाल में इस क़र्ज़ को चुका कर ही मन को शांति मिलेगी। आज़मा के देख ले..हर कोई। पराया शहर हमें रोटी दे सकता है, ऐशो -आराम दे सकता है परन्तु अपनापन और सुकून नहीं दे सकता। मैं वापस अपने गाँव जरूर जाऊँगा। जल्द ही। वहाँ पर बहुत टेलेंट है। वहाँ मैं एक इंस्टीट्यूट बनाऊंगा। जब वहाँ जाता हूँ लोग मेरा इंतज़ार करतें हैं। मुझे खूब प्रेम मिलता है। बस कुछ पैसा और....इंस्टीट्यूट बन जाने तक।" बहरहाल हेंड्री ने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया है। उनकी माँ अब अपने बेटे से बहुत खुश हैं। 

बन गया मेरा खूबसूरत टैटू.....हो गई मेरे मन की। 

तुम्हारा खूब धन्यवाद हेंड्री। तुम गज़ब के आर्टिस्ट हो। तुम लोगों की मनोकामनाएं पूरी करते हो, ईश्वर तुम्हारी हर मनोकामना पूरी करे भाई ।

http://www.tattootradejournal.in/artists/hendry-lama/

अब अगले वर्ष कुछ और नया..... 


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