Wednesday, September 25, 2013

फिर छिड़ी रात बात फूलों की


बिना किसी से मिले भी क्या उससे मोहोब्बत हो सकती है?…. लंच बॉक्स देखते हुए सोच रही थी। कुछ ख्याल आते-जाते रहे। अपने आप पर ही मुस्कुरा दिए। फिल्म जितनी धीमी गति से चलती है, उसके लंच बॉक्स में प्यार उतनी ही तीव्र गति से पनपता रहा। पूरी पिक्चर अंत तक बांधे रखती है.… टोटल पैसा वसूल फिल्म। इरफ़ान मियाँ तो बस धमाल हैं, साथ में निम्रत कमाल। 

सवाल फिर भी वहीं असल ज़िंदगी में क्या ऐसा होता है? बिना मिले प्यार जैसा  …… ? नहीं होता, तभी तो हम फिल्म देख कर कल्पनालोक में विचरण करते हुए जी लेते हैं...... या शायद हो भी जाता होगा, आधा -अधूरा, याने की एक तरफ़ा जैसा…अमूमन इन्फ़ेचुयेसन जैसा कुछ  .....  जिसमें दूसरे पक्ष को पता भी नहीं चल पाता होगा ……. समय के साथ फिर वो प्यार दोस्ती में बदल जाता होगा,  और कुछ समय बाद दम ही तोड़ देता होगा ….परन्तु तब भी क्या फर्क गिरता है....इसी का नाम ज़िंदगी है.... 

हाँ यदि कई वर्षों तक भी मिलना न हो सके और रिश्ता बना रहता है तो निश्चित ही कुछ तो बात है रिश्ते में.… बस एक फील बनी रहनी चाहिए …… सब कुछ उसी फील का तो कमाल है…….  

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