Sunday, July 5, 2015

खुद से मिलकर बातें करना अच्छा लगता है


मुझ पर तुम्हारी शामों की 
चाय उधार रही 
तुम पर मेरी रातों की 
नींद उधार रही 
अब फैसला तुम पर छोड़तें हैं 
या तो हम ये उधारी चुका लें 
या फिर बने रहें कर्ज़दार 
एक दूसरे के 
मिलते रहें यूँ ही 
एक दूसरे से 
तगादे करने के बहाने 
और इस के अलावा 
जीवन में रखा भी क्या है 
बातें मुलाकतें सभी के लिए 
बहाने ही तो चाहिए 
वरना बैठे नहीं रह जाते 
हम दोनों अक्सर 
इस बहती नदी के किनारे 
और बहते रहते इसी के साथ 
यूँ ही, चुपचाप खामोशी से 
धड़कनें गिनते हुए 


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