Thursday, December 3, 2015

तमाशा - ज़िंदगी जीने का नाम


दुनिया का तमाशा हर दिन देखतें हैं। सोचा आज रजत पट वाला तमाशा भी देख लिया जाय। बहुत देखा पेड़ों के इर्द -गिर्द चकराता हुआ रोमांस। थोड़ा हट कर कुछ देखने को मिलेगा की चाहना में ' तमाशा' देखी। कभी आर्ट फिल्म देखते थे और उसके प्रभाव में कई दिनों तक रहते थे। फिर दौर आया कॉमर्सिअल सिनेमा का और सजे -धजे नाचते -गाते , रोते, बाँहों में सिमटते, इश्क़ करने का। निहायत अज़नबी सी प्रेम कहानियां। बीमारी में हो या अति संताप में नायिका का मेकअप जस का तस। अब असल ज़िंदगी में इतना भी नहीं होता। 

अमूमन परदे की दुनिया में रोमांस हो या फिर रोजी -रोटी के लिए मशक्कत। अज़नबीयत से भरा होता है, काल्पनिक सा। जीवन ऐसा हो जैसे हमारे मन में चलता है। हमारे मनमुताबिक। तब है बात। जैसा हर कोई करना चाहता है परन्तु कर नहीं सकता। तब फिल्मों में उसे होता देख दिल को बहला लेते हैं। परिवार, समाज, संकोच, भय, परिस्थितियाँ, हालात। रोमांस के पनपने से पहले ही न जाने कितने ही भाव बिन बुलाये चले आते हैं। ऐसे में हो लिया रोमांस। अब कुछ अच्छी फ़िल्में बनने लगीं हैं। बिना मेकअप वाली नायिकाएं मुझे खूब पसंद हैं। सादगी में रहती हैं परन्तु कला में कमाल। 

तमाशा फिल्म कुछ ऐसी ही। अच्छी है। पीकू फिल्म के बाद से मुझे दीपिका खूब पसंद आने लगी है। सादगी से भावों को बखूबी अभिव्यक्त करती हुई। 

तमाशा में रणबीर की कशमश और छटपटाहट बखूबी दीखती है। अक्सर ऐसा ही होता है। बहुत कुछ जीवन में करना नहीं चाहते परन्तु परिवार, हालात या परिस्थिती के चलते वही करना पड़ता हैं। फिर ज़िंदगी जीने जैसा कुछ नहीं रह जाता। भीतर छटपटाहट बनी रहती है, घुटन और उदासी का पक्का पता व्यक्तित्व पर अपनी छाप दिखाने लगता है। करना कुछ और चाहते हैं कर कुछ और रहे होतें हैं। ऐसे जीवन को जीना नहीं ढोना कहतें हैं। 

कुल जमा ये कि दिल -दीमाग की सुनों और मस्त जियो। मन मार कर कुढ़ते हुए, बेमन से काम करते हुए जीना भी कोई जीना हुआ? बेकार हुआ.....कई वर्षों की एक छोटी सी इच्छा थी। अब पूरी करूंगी। अब चाहे कोई कुछ भी कहे। 




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