Wednesday, March 18, 2015

मैं रोज़ उदित होती हूँ ( माया एंजेलो का विद्रोही जीवन ) कथादेश पत्रिका के मार्च अंक 2015 में प्रकाशित आलेख



​"एक स्त्री को अद्भुत औरत बनने के लिए मजबूत होना पड़ता है। और उसके लिए एक स्त्री को वित्तीय, मानसिक और सामाजिक जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर न होकर खुद ही इन सबके लिए संघर्ष करना पड़ता है।" ( फेनोमेनल विमेन कविता में माया एंजेलो ) 

​माया एंजेलो अद्भुत जीवट की महिला थीं और उनकी जीवन कहानियाँ खूब पढ़ी जाती हैं। आज भी संसार भर में उनके करोड़ों प्रशंसक हैं। संसार को देने के लिए उनके पास इतना कुछ था कि अपने अन्य लेखनों के अलावा उन्होंने सात आत्मकथाएं भी लिख दीं। अपने छियासी वर्ष की जीवनावधि में उनके पास अनुभवों और ज्ञान का एक समृद्ध भण्डार था। जिसके लिए वे बहुत से सम्मानों से नवाजीं गईं। जब उन्होंने अपनी तीसरी आत्मकथा 'सिंगिंग' एण्ड स्विंगिंग' एण्ड गेटिंग' मैरी लाइक क्रिसमस' लिखी, तब वे अफ्रीकन- अमेरिकन पहली आत्मकथा लेखिका बनी जिन्होंने अपनी जीवन यात्रा के तीन खंड लिख डाले थे। यह तीसरी आत्मकथा सन उन्नीस सौ छियत्तर में छपी थी। जिसमे उनके शुरुआती बीस वर्ष के जीवन का लेखा -जोखा है। 

कहीं पर उनके पुत्र ने ज़िक्र किया था कि 'अपने जीवन के आखिरी के दस वर्षों में, जब वे लगातार नृत्य द्वारा दिए गए दर्द और स्वांस की बीमारी से जूझ रहीं थीं तब भी उन्होंने चार पुस्तकें लिख दीं थीं। अपनी सातवीं आत्मकथा 'मॉम एण्ड मी' उन्होंने २०१३ में लिखी जब वे पिच्चासी की वय में थीं और शारीरिक तकलीफों से गुज़र रहीं थीं। इसमें उन्होंने अपनी माँ के साथ बिताए पलों को जिया है। कमाल की जिजीविषा वाली उन महिला का कथन था। "जहां मुझे लेखन से ज्यादा कोई और बात नहीं डराती वहीं इसके अलावा कोई और बात संतुष्ट भी नहीं कर सकी।" 

'मैं रोज़ उदित होती हूँ''  पुस्तक विपिन चौधरी द्वारा संकलित माया एंजेलो की जीवन यात्रा है। यह पुस्तक ' दख़ल प्रकाशन' के अंतर्गत ​प्रकाशित हुई है। 
लेखिका ​द्वारा प्रथम पृष्ठ पर लिखा ​हुआ वाक्य - 'उन स्त्रियों के नाम जिन्होंने अपनी भाग्य रेखा खुद उकेरी' ​ ​पढ़ते ही निस्संदेह पाठक संवेदना और हौसले से भर उठें। 'आई नो वाई द केज्ड बर्ड सिंग्स ' नामक अपनी पहली आत्मकथा से मशहूर होती अश्वेत अफ़्रीकी -​अमेरिकी लेखिका माया एंजेलो ​भी ​एक ऐसी ही स्त्री साबित हुईं हैं।​ ​लेखिका ने आगे के पृष्ठों में माया एंजेलो ​के जीवन के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है। वे लिखतीं हैं। नस्ल भेदी समाज की नज़रें उन्हें लगातार चुभती रहीं थीं​। फिर भी वे कभी डगमगाईं नहीं और   न ही उनका संघर्ष कभी कमजोर पड़ा। ​बेबाक माया एंजेलो ने अपने सभी रिश्तों को ईमानदारी से जिया लेकिन उनके जीवन में आने वाले रोमांटिक और निजी सम्बन्ध भी उन्हें ​कभी ​सुकून नहीं दे सके। बल्कि उन रिश्तों ने भी माया को चोट ही पहुँचाई थी​। बावजूद इसके माया कभी ​टूटी नहीं ​​और न ही उनके संघर्षों में किसी तरह की निराशा और शिथिलता आई। ​

लेखिका ने इस पुस्तक को एक अलग ही सज -धज के साथ प्रस्तुत किया है। पुस्तक को अलग -अलग शीर्षकों में विभाजित करके माया एंजेलो की उम्र के अलग -अलग पड़ावों में होने वाले उनके संघर्षों और जीवन के उतार -चढ़ावों का ब्योरा दिया गया है। मसलन ​कुछ शीर्षक हैं - ​संघर्षों का दस्तावेज़, बचपन की काली परछाइयाँ, अश्वेत काया का दर्द आदि। हर शीर्षक के नीचे लिखे गए माया के प्रेरणा दायक कथन उस अध्याय में और भी ​मायने जोड़ देतें हैं। ​एंजेलो के कुछ कथन ​दृष्ट्व्य है। 

'आप कई पराजयों का सामना कर सकते हैं। 
लेकिन खुद को पराजित नहीं किया जाना चाहिए।'

'यदि तुम किसी चीज़ को पसंद नहीं करते तो उसे बदल डालो और यदि 
ऐसा नहीं कर सकते तो अपना नज़रिया बदलो पर कभी शिकायत मत करो। '

​जब वे मात्र ​सात वर्ष की ​अबोध बालिका थीं तब ​उनकी माँ के प्रेमी ​ने उनका बलात्कार ​किया था। माया की शिकायत करने पर उनके रिश्तेदारों द्वारा उस व्यक्ति की ह्त्या करा दी गई थी। इस तरह हादसों की 
दहशत से माया करीब पाँच वर्ष तक मूक हो गईं थीं। उन्हें लगा उनकी ही शिकायत पर उस बलात्कारी को बाद में संदिग्ध रूप से मौत के घाट उतार दिया गया था। करीब पांच वर्षों तक खामोश बनी रहने के बाद जब माया इस दहशत से ऊबरी तो उन्होंने अन्य कार्यों के साथ ​ही अपने मनोभावों को भी प्रवाह देना भी शुरू कर दिया। वे शब्दों की कीमत पहचान चुकी थी। कविताएँ लिखने की शुरुआत कुछ ऐसे ही हुई। इसी पुस्तक के अनुसार - 'माया ने लेखन के लिए पॉल लारेंस से खूब प्रेरणा ली। उनकी कविता 'हमने मुखौटे पहने हुए हैं ' की पंक्तियाँ माया एंजेलो के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत रहीं। 

"हम उपहासी मुस्कुराहट वाला झूठा मुखौटा पहनते हैं 
जो हमारे गाल, आँख और रंग को छुपा लेता है

हम मानव छल के ऋण का भुगतान इस तरह करते हैं 
कि फटे और खून- रिसते हुए दिल से मुस्कुरा उठते है। "

'मैं रोज़ उदित होती हूँ' पुस्तक एक लय में चलती है। सिलसिलेवार और अनुशासित तरीके से रखे गए तथ्य इस पुस्तक को पठनीय और रोचक बना देते हैं। इस पुस्तक में माया के बचपन से लेकर जीवन भर के उतार -चढ़ाव, ख्याति, अपमान, दुःख -सुख और जीवन के सभी भावों को इतनी गहराई से से उकेरा गया है कि माया एंजेलो की हर मनोदशा के साथ पाठक अपना गहरा जुड़ाव महसूस करने लगते हैं। 

माया एंजेलो की उपलब्धियों और संघर्षों को पढ़ते हुए पाठक लेखिका विपिन चौधरी की सराहना इसलिए ​भी ​
कर सकते है क्योंकि उन्होंने माया एंजेलो के बारे ​में ​गहन अध्ययन ​किया और अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी प्राप्त ​की। फिर इन घटनाओं और उपलब्धियों को बड़ी सहजता से पुस्तक ​रूप में संजोकर पाठकों के सामने लाकर रख दिया। पुस्तक के आगे के पृष्ठों की तरफ बढ़ते हुए पाठक उसी जोश और ऊर्जा को अपने भीतर ​महसूसते हैं जैसी माया एंजेलो स्वयं थीं। माया ​हमारे लिए ​स्पष्टवादिता, कड़ी मेहनत, आत्मनिर्भर और आत्म सम्मान का पर्याय बनी। वे जीवन में आए संघर्षों से कभी ​​हताश नहीं ​हुईं बल्कि ​उनका ​मुकाबला करते हुए ​अपने मुकाम ​पर पहुंच कर सभी को प्रेरणा देती हुई प्रोत्साहित करती ​हैं। 'हरफनमौला और अलमस्त जीवन' शीर्षक के अंतर्गत देखें तो उसमे बताया गया है कि कभी छोटे से घर में रहने वाली माया एंजेलो बाद में अठारह ​कमरों के ​एक ​आलीशान घर में रहने लगीं थीं। वे बेहद निडर और जुझारू थीं और जीवन भर खासी सक्रिय रही थीं। उनके इसी जज़्बे ने उन्हें कभी अपने जीवन में समझौता नहीं करने दिया। इसी सब के चलते पूरे संसार ने उन्हें पहचाना और ​खूब ​सराहा। अपने व्यापक अनुभवों से ​माया  
कहतीं हैं। 

" लोग यह भूल जाते हैं कि तुम क्या करते हो लेकिन वे हमेशा यह याद रखते हैं कि आप उन्हें कैसा अहसास करवाते हो।"

​"​ प्यार आता है और अपनी गाड़ी में 
   खुशी की पुरानी यादें 
   दर्द के प्राचीन इतिहास को लाता है"
​​
 ( 'फ़रिश्ते की छुअन ' कविता इसी पुस्तक से  )
​ 

बेहतरीन कसाव लिए हुए यह एक शानदार पुस्तक है। छोटी -बड़ी बहुत सी घटनाओं को समेटती हुई ये माया एंजेलो के लगभग सम्पूर्ण जीवन दर्शन को समझने के लिए अपने आप में पर्याप्त है। पुस्तक की सार्थकता इस बात से भी आँकी जा सकती है कि मात्र 'मैं रोज़ उदित होती हूँ ' पढ़ने से ही माया एंजेलो को बहुत हद तक जाना जा सकता है। लेखिका ने एक सौ बीस पृष्ठों  की इस पुस्तक में उनके जीवन के बहुत से अनछुए पहलुओं को समेट कर माया एंजेलो के विराट दर्शन कराने में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। लेखिका का प्रयास उन्हीं के शब्दों में। "सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि यह किताब एक स्त्री की पीड़ा का रुदन बन कर न रह जाए बल्कि जिस तरह बुलंदी से माया ने पीड़ा को बुनते हुए अपनी उंगलियां मजबूत की, उसी तरह एक सशक्त पुस्तक हिंदी के पाठकों के लिए तैयार हो सके।" 

​भरपूर जीवन जीकर २८ मई सन २०१४ ​की सुबह ये  'आई नो वाई द केज्ड बर्ड सिंग्स ' रचने वाली खुद भी संसार के पिंजरे को तोड़ कर अपनी रूह को आज़ाद कराती हुई अपने शरीर से मुक्त हो गईं। सभी विचलित थे। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि देने वालों में अनेक नामचीन कलाकार, मनोरंजन जगत के हज़ारों लोग, बिल क्लिंटन, राष्ट्रपति बराक ओबामा, कई महान लेखक आदि शामिल थे और सभी जानते थे इस अक्षुण्ण क्षति की भरपाई कभी नहीं हो सकेगी। 

यह पुस्तक 'मैं रोज़ उदित होती हूँ ( माया एंजेलो का विद्रोही जीवन )' उनकी अंतिम विदाई से कुछ ही माह पूर्व प्रकाशित हुई थी। 


कथादेश पत्रिका के मार्च अंक २०१५ में प्रकाशित आलेख 



Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...