Tuesday, February 23, 2016

कहानी अंश - सम्बोधन पत्रिका के स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर प्रकाशित - प्रेम -कथा अंक ( अक्टूबर -जनवरी 2016 ) में प्रकाशित कहानी - सरल समर्पण

संपादक - श्री क़मर मेवाड़ी 




......बरसात अब भी नहीं थमी थी। उसने चाय का प्याला उठाया और बाहर बालकनी में रखी आराम कुर्सी पर ढह गई। उसे वाहियात बैठने की आदत नहीं थी परन्तु दिन में सोना भी उसे कभी ठीक नहीं लगता। शरीर और टूट सा जाता है। जैसे किसी ने उसके शरीर से सारी ऊर्जा निचोड़ दी हो। चाय पीते हुए वह लगातार टपकते हुए आसमान को देखती रही। देवदार और चीड़ पर बरसती बूंदें और टिन की छतों पर पड़ती उनकी आवाजों से संगीत सा बजता मालूम हो रहा था। बारिश न जाने उसे कैसे भावों से भर देती थी। ठंडा, भीगा हुआ.....देवत्व और रुमानियत से भरपूर अद्भुत संसार।

"बारिश मन को कितना हल्का कर देती है न काका?" चाय समाप्त हो गई थी। उसने कप लेने आए और खिड़की बंद करते बद्री काका से कहा। वह कुछ नहीं बोल सके थे। जानते थे हिमंती के भीतर भी बादलों सा कुछ घुमड़ता रहता है जो कभी -कभी एकांत पाते ही बरसात की तरह उसकी आँखों से बरस जाता होगा। किसी दिन जब वह सारा दुःख बारिश बन कर बाहर बाहर निकल जाएगा तब शायद वह सरल हो जाएगी। घुटन से बने हुए तनाव ने उसे बेरुखा और अक्खड़ बना दिया था। 

अकेलेपन से जूझती कभी -कभी वह सोचने लगती थी। 'क्या मां की बात न मान कर उसने गलत किया?' हिमंती को मां की वह बात याद आने लगी। जब कई वर्ष पूर्व उन्होंने कहा था। "हेम....वह डॉक्टर दुहाजू है तो क्या हुआ? हीरे जैसा है। अभी तेरी सारी उम्र पड़ी है। अकेले चलना बहुत कठिन होता है। एक उम्र के बाद अकेलापन काटने को दौड़ता है। ठंडे दिमाग से सोच ले बेटी।" परन्तु तब वह आदित्य की यादों को गले से लगाये घूमती रहती थी। उस के अलावा वह और कुछ कहाँ कुछ सोच पाई थी। शरीर की टूटन को दूर करने के लिए वह छाता लेकर टहलने के बहाने नीचे उतर गई। खूब दूर तक टहलती रही। फुहारें अब भी झर रहीं थीं। 

वापस कमरे में लौटते समय अचानक गलियारे में प्रोफ़ेसर दीक्षित मिल गए थे। उनका कमरा उसी गिलयारे में बना सबसे कोने वाला कमरा था। "मिस हिमंती....कल सुबह डॉक्टर नतालिया भी जा रहीं हैं। इसलिए आज शाम सब मेरे कमरे में खाना खाएंगे। कुछ नहीं.....बस यूँ ही कुछ वक्त साथ बैठ जाएंगे। आप भी आएंगी तो बहुत अच्छा लगेगा।" उन्होंने उसे देखते हुए सौम्यता से कहा। अपने अकेलेपन से निजात पाने की कोशिशों में इस तरह स्टाफ के लोग एक -दूसरे के कमरे में खाना -पीना करते रहते थे। अक्सर हिमंती इन सब से दूर ही रहती थी। पहले- पहल सविता मैडम और डॉक्टर नतालिया ने उसे खूब समझाया था। परन्तु वह इस आदत के साथ सामंजस्य नहीं बैठा सकी। न जाने प्रोफेसर के आग्रह में कुछ था या फिर उसके भीतर का अकेलापन था, वह कुछ देर खामोश रह कर बोली। "ठीक है सर। परन्तु कुछ ही देर ठहरूंगी। मुझे यूँ हंसना, बोलना भाता नहीं है।" 


"शुक्रिया। हम आपका इन्तजार करेंगे।" कह कर प्रोफेसर प्रसन्नता से नीचे सीढ़ियां उतरने लगे। रसोई में जाकर खाने के बारे में बद्री काका को समझाना था। बद्री काका अपनी अनुभवी आंखों से प्रोफेसर के मन के भाव समझ रहे थे। वे खुश थे। काश हिमंती के जीवन का अकेलापन कुछ कम……

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