Sunday, January 25, 2015

रहमत चूड़ीवाला- कहानी अंश ( जनसत्ता २०१४ के वार्षिक अंक में प्रकाशित )


रहमत के पास चूड़ियाँ पहनाने का हुनर कमाल का था। हाथों की कौन सी हड्डी और कौन से जोड़ पर कितना दबाव डालना है, उसे खूब आता था। मुलायम,-खुरदुरे, बड़े - छोटे, मोटे- पतले हर हाथ पर ऐसी नफासत से चूड़ियाँ फिट बैठा देता कि देखने वाले दंग रह जाते थे। हैरान होते थे कि इतनी छोटी माप की चूड़ियां आखिर उसने उनके हाथों में चढ़ाई किस तरह? उन्हें चढ़ाते वक्त मजाल उससे एक भी चूड़ी मैोल जाए। किसी का हड्डियों वाला सख्त हाथ देखता था तो दबता और जांच करता हुआ मश्वरा दे डालता था। 

"दीदी, अब, ये देखो……कैसा सख्त हाथ हो रखा है? घर -गृहस्थी तो ज़िंदगी भर की हुई। काम - धंधों से निबट कर इन पर थोड़ा घी -तेल और बोरोलीन लगा लिया करो। देखो तो कैसे मर्दाना हाथ हो रखें हैं। जनानियों को जनानियों वाली लोच -लचक और नाज़ -नखरों से ही रहना चाहिए। तभी वे खूबसूरत लगतीं हैं।"


"तुझे कैसे पता है रे ये सब? तेरा न घर न जनानी। आया बड़ा।" औरतें शरमाते हुए झूठे रोष से कहतीं। तब मज़ाकिया अंदाज में वह ठहाका लगा कर फिर बोलता। "मान जाओ बहना......आखिर......" 

  

( जनसत्ता २०१४ के वार्षिक अंक में प्रकाशित कहानी - 'रहमत चूड़ीवाला' से ) 



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