Thursday, August 4, 2016

कहानी अंश - समहुत पत्रिका के ( अप्रैल -जून 2016 ) अंक में प्रकाशित कहानी - और बर्फ पिघल गई

संपादक - डॉ अमरेंद्र मिश्र 



"आज यहाँ काल भी आ जाता न, तो मैं उसे ही खा लेती। इस तरह जीने से तो अच्छा....." 

कराहती हुई वह भूख से कुलबुलाती आँतों से उठती टीस को भरसक दबाने का निरर्थक प्रयास करने लगी। खिन्नता से उसे सब तरफ उदासी नज़र आ रही थी। शाम का समय था परन्तु आकाश बादलों से पटा हुआ था। घिर आए अंधकार की वजह से शाम रात का सा आभास दे रही थी। उसने चूल्हा समेटा। भगोना, कड़छी और थाली मांजने के लिए उसमे चूल्हे की राख डालने लगी। 

कठोर ठण्ड थी। बाहर सनसनाती हुई हवाएं चल रहीं थीं। पाँच दिन पहले गिरी बर्फ पिघली नहीं थी। जहाँ -तहाँ पाँच -छह इंच की बर्फ के सफ़ेद गलीचे से बिछे हुए थे। ठण्ड से सारा संसार अकड़ सा गया था। एक तो पहाड़ वैसे ही खामोश होते हैं फिर बर्फ से ढके हुए बिलकुल ही बेजान लगते हैं। मार्च का महीना समाप्ति पर था परन्तु रह -रह कर बर्फ फिर गिर रही थी। अन्य वर्ष मार्च अंत तक बर्फ पिघलने और धूप खिलने लगती थी। नए फूल -पौधे सर उठाने लगते थे। परन्तु इस बार अलग ही मौसम था। 

"पता नहीं ये बर्फ गिरनी कब बंद होगी?" उसने एक गहरी ऊंसांस भरी। उसे तीसरा दिन था जब........ 



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