Monday, May 18, 2015

कहानी अंश - बोलती खामोशियां (हिन्दी अकादमी की पत्रिका 'इन्द्रप्रस्थ भारती' के अंक अप्रेल -जून २०१५ में प्रकाशित )


उस वर्किंग वुमैन हॉस्टल में युवतिओं के दो ग्रुप्स बन गए थे। अपने को बुद्धिजीवी समझने वाले इस ग्रुप में अक्सर टीवी और अखबारों की दुनिया की जानकारियाँ रखते हुए उन पर खूब चर्चाएं होतीं थीं। वे राजनैतिक उठा-पटक और साजिशों की आशंकाओं पर घंटों बहस करतीं थीं। बड़े-बड़े अंग्रेजी और हिंदी के लेखकों की रचनाओं की चीर -फाड़ करती। थिएटर में क्या लगा है? कौन सी फ़िल्म समाज को क्या परोस रही है? किस सेलीब्रिटी का किस के साथ अफेयर चल रहा है या फिर किस का किस से ब्रेकअप हो गया है? इसके अलावा फैशन की दुनिया में क्या हो रहा है? कौन सी लिपस्टिक और कौन सा रंग लेटेस्ट है? कौन सा केश विन्यास चल रहा है? किट्टी पार्टी की कौन सी थीम्स टॉप पर हैवगैरह। साथ ही फैशन से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी बातें होतीं थीं। 

इस ग्रुप में ज्यादातर लड़कियाँ कुँवारी थी जो शादी के नाम से बिदक जातीं थीं। इनमें जो शादीशुदा थीं उनको भी पति, घर -गृहस्थी, बच्चे, नाते-रिश्ते, खाना पकाना आदि से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं होता था। वे सब हमेशा चौकस रहती, करीने से सजी सँवरी, अंग्रेजी ज्ञान से एक-दूसरे को रंगती हुई और अन्य को बहनजी टाईप बताते हुए हेय दृष्टि से देखतीं थीं। अपने आप को बुद्धिमान दिखाने और साबित करने की होड़ में वे सब मुझे हमेशा तनी हुई दिखतीं थीं। किसी बेवजह के तनाव से कसी हुई सी। मैं ये नहीं समझ पा रही थी कि ये सब ढोंग की मायावी और छलावे वाली दुनिया में जी रहीं हैं या इनके लिए यह सब कुछ बहुत सहज है या फिर ऐसा ही होता है। शायद मेरी समझ में न आ रहा हो। नारी हो कर भी इनमें नारी सुलभ गुणों की स्वाभाविकता कहाँ लुप्त हो गई थी? कभी एक ग्रुप मेस में होता तो दूसरा ग्रुप कॉमन रूम की कुर्सियाँ घेर लेता।

 --------------------------------------------------------------------------------------------------

"चलो कोई नहीं जी। आज आपको सब कुछ बता कर बची - कुची कड़ुवाहट भी ज़िंदगी से निकल गई। बुआ का घर छोड़ने के बाद से आज तक मैंने जो भी चार छह बार आँसूं बहाए हैं न सब याद हैं मुझे। कब और क्यों बहाए? कितनी देर बहाए? अब आज पिछले चार साल बाद बहाए हैं। वह फिर से संजीदा होने लगती है। ये आँसुओं का भी न मैडम एक रिश्ता होता है जो हर किसी के साथ नहीं बनता..।" कुछ देर तक फिर एकदम चुप हो गई।

"अच्छा अब चलती हूँ यदि बोलने बतियाने में कोई गलती हो गई हो तो माफी मांगती हूँ। सड़कों पर पली हूँ न, वो तहज़ीब, तमीज जो भी है वो ज़रा मुझ में आ नहीं सका।"

अब तक मुझे उस पर इतना प्यार आ चुका था कि उसे गले से लगा लेने को मन कर रहा था। इतनी छोटी सी ज़िंदगी में ये लड़की कितना कुछ झेल गई। फिर भी बिना किसी शिकायत और नकारात्मकता के कितनी हिम्मत से और किस शानदार तरीके से जी रही है। कमरे से बाहर निकलते हुए मैं………. 


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...