Saturday, September 5, 2015

कई बार यूँ भी होता है


कौन बनना चाहेगा 
मात्र एक ऐसी नदी 
जो सुने अपनी ही कलकल 
अपनी धड़कनों के मानिंद 
बहे चुपचाप रवानगी से 
अपने विचारों की तरह 
उतर आए पहाड़ों से 
और खो जाए जंगलों में 
सबसे दूर 
अपने आप से दूर 
कुछ वक्त बाद 
ऐसा ही हो जाता है 
इंतजार का रूप 
कि सहसा एक दिन 
छा जाता है वह  
हमारे सारे वज़ूद पर 
तुम और मैं से ऊपर उठकर 
एकसार हो जाता है 
हमारी ही तरह 


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