Monday, April 25, 2016

खुदा भी आस्मां से जब ज़मीं पर देखता होगा


तू दोस्त थी आशिक़ थी मेरे दिल का मलाज़ / मनूसी खुश्बू तेरी सांसों के महाज़ 
दिन में कभी हंस देता हूं भूले से मगर / बेरोए मैं सो जाऊं वो रातें हुईं शाज़  

'कई चांद थे सरे- आसमां' - शम्सुर्रहमान फ़ारुक़ी द्वारा कलमबद्ध की हुई और नरेश 'नदीम' द्वारा अनुवादित 748 पृष्ठ की बजनदार पुस्तक मेरे बुक शेल्फ में पिछले एक वर्ष से है। बड़े मन से खरीदी थी। तब मुझे सिर्फ इसका टाईटल बेइंतहा पसंद आया था। बेशक बाद में इस पुस्तक की मशहूरियत का मालूम हुआ। 

मैं इस पुस्तक को पहली बार पढ़ने पर कोई खास समझ नहीं सकी फिर भी सरसरी तौर पर पूरी पढ़ी थी।किसी जगह का इतिहास ठीक परन्तु राजा -महाराजाओं के बारे में जानना मुझे बहुत आकर्षित नहीं कर पाता। कितने राजा, कौन किसका बेटा -बेटी....कन्फ्यूजिया जातीं हूँ। इतिहास का ऐसा हिस्सा आठवीं तक अनिवार्य था सो पढ़ना पढ़ा। फिर तौबा करते हुए इन सब से बचने के लिए विज्ञान पढ़ने चल दी थी। 

कोई भी पुस्तक पढ़ने के लिए अमूमन मेरे पास रात का खामोश समय होता है। हर पुस्तक का अपना एक अलग तरह का सफर होता है। कोई पुस्तक दिमाग से सोचने पर मजबूर कर देती है और कोई दिल से।मेरे साथ ऐसा ही होता है। किसी पुस्तक को पढ़ते हुए उनींदी हो जाती हूँ और किसी को पढ़ते हुए समय का पता ही नहीं चलता। सुबह खिड़की से जब चिड़िया की चह -चह और आस -पास की हलचल शुरू होने लगती है तब ध्यान आता है। गड़बड़ हो गई। अब ये नया दिन अलसाते हुए बीतेगा। 

वैसे भी सप्ताह में दो दिन मेरा मन मौन व्रत रखने का होता है। मेरे हालात और बहुत जरूरी नहीं हुआ तो मैं इस पर अमल भी कर लेती हूँ। संगी साथी कुछ देर मसखरी करेंगे, फिर से पूछेंगे। "क्या हुआ ? आज फिर राजदरबार में सन्नाटा है"। कोई नी, खुश रहो भाइयों। हम भी खुश और तुम भी खुश। ठठा कर हंसना मेरी फितरत है। वो मौन व्रत की केटेगरी में नहीं आता। इसलिए सदाबहार रहता है। उत्तर देना आवश्यक न हुआ तो किसी की बातों पर केवल हंस देने से भी विराम लगाया जा सकता है। 

मेरी खिड़की के सामने वाले पेड़ पर एक सफ़ेद रंग का प्यारा सा उलूक महाराज रहता है। छत पर घूमते हुए रात -बेरात उससे अक्सर मुलाक़ात होती रहती है। बड़ी टकटकी लगा कर प्रेम से अपनी विशाल आँखों से मेरी तरफ देखता है। मैं उसकी और वो मेरा पक्का दोस्त है। रात के मुसाफिर। 

बहरहाल 'कई चांद थे सरे- आसमां' में वज़ीर ख़ानम, जहांगीरा बेगम आदि ..कुछ अन्य खूबसूरत खातूनों और नाज़नीनों के फ़रिश्ते से हुस्न की चर्चा और मर्दों का अदबीपन इस पुस्तक को पढ़ने का उत्त्साह बनाए रखता है। बहुत पहले पढ़ी एक उक्ति याद आ जाती है। 

' खुदा गर हुश्न देता है, नज़ाकत आ ही जाती है ' 

अब पुस्तक दुबारा हाथ में ली। हाल फिर वही है....समझ नहीं आता इस पुस्तक को किस मनोदशा के चलते पढ़ना चाहिए? समझ आएगी तो समझाऊँगी। तब तक खुदाया खैर....

  

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