Thursday, April 24, 2014

आल्प्स की हसीन वादियां ( Switzerland ) ( यात्रा वृत्तांत 'दृष्टिपात पत्रिका में दिसंबर २००९ में प्रकाशित )


"सभी अपनी सीट बेल्ट बाँध लें " 

विमान परिचारिका की मधुर आवाज पर मेरी भी आँख खुली। सुबह के सात बज रहे थे। जब मुझे लगा हम आल्प्स के ऊपर से गुजर रहें हैं, तो अति उत्सुक व रोमांचित होकर नीचे झाँका, चकित कर देने वाली खूबसूरती चारों ओर बिखरी हुई थी। दूर- दूर तक पहाड़ियों पर फैली हरियाली और उस पर छिटकी हुई बर्फ ऐसा आभास दे रही थी- जैसे चित्रकार ने सारे जहाँ में बहुत ही करीने से हरा रंग भर दिया हो। अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य ! ये थीं आप्लस की हसीन वादियां। स्विट्ज़रलैंड की छटा। 

कुछ पलों के बाद हमारा विमान वहाँ की धरती पर उतरा। अपने सामान को सहेजती मैं ज़्यूरिख़ एयरपोर्ट से बाहर निकली। विदेशी धरती पर पैर रखने का और यूरोप एस्कॉर्ट लीडर होने का ये मेरा पहला अनुभव था। मुझे लगभग एक महीना यही करना था। यहाँ की हवा में अलग ही ताज़गी थी। सब कुछ साफ़ -सुथरा , धुला -धुलाया। नीली झीलों का शांत शहर। एयरपोर्ट पर प्रियजनों ओर उनके मित्रो का असीम प्रेम स्वीकारती घर (लूसर्न) की तरफ रवाना हुई। सारा कमरा फूलों व चॉकलेट से सजा हुआ था। काली काफी, चॉकलेट और मेरी प्रिय देसी चाय के साथ-साथ सभी मित्रों के साथ मस्ती, प्रेम व अपनेपन से मैं आनंदित हो उठी थी। 

मैं उन फिरंगियों की साफ़ दूध सी गुलाबी रंगत लिए हुए चेहरे और सुनहरे बालों की ओर आकर्षित होती थी तो वो मेरे काले बाल व सांवली रंगत पर आश्चर्य करते थे। बाबा (भाभी की माताजी) और उनकी बहिन तो बड़े स्नेह से पता नहीं कितनी बार मेरे चेहरे व बालों को छूती की कैसे मैंने ये श्यामल वर्ण पाया ....कौन सी क्रीम से इतना सनटैन हुआ ?? इतना अपनापन भारतीयों के प्रति देखकर मन गदगद हो गया और मैं अपनी सारी थकान भूल गयी। 

लुसर्न स्विट्जरलैंड का सबसे खूबसूरत शहर है। रॉस नदी की कल-कल से गूंजता हुआ ये और भी खूबसूरत लगता है। यहाँ की मुद्रा स्विस फ्रैंक है व भाषा स्विस जर्मन प्रयोग में लायी जाती है। यहाँ केवल लुसर्न की कुछ ख़ास जगहों के बारे में बात करेंगे। 

डाइंग लायन-   फ्रेंच क्रांति के समय जब कई सौ स्विस सैनिक मारे गए थे तो उनकी याद में ये स्मारक बनाया गया था। इतनी बारीकी से इसे तराशा है की मरती हूए शेर की ये कलाकृति देखते ही बनती है। चारों तरफ से खूबसूरत साफ़ तालाब से सजा व भरपूर हरीतिमा से घिरा ये सैलानियों का बहुत प्रिय स्थान है ।

वाटर टैक-   नदी पर बनी ये अष्टाकार आकृति तेरहवी शताब्दी में बनी थी। तब इसमें खजाना रखा जाता था। आज वाटर टैक, डाइंग लायन और चैपल ब्रिज स्विट्जरलैंड के मशहूर लैंडमार्क है।

चैपल ब्रिज-   १३३३ में लकडी से बना हुआ ये यूरोप का सबसे प्राचीन पुल है, जिसके भीतर १७वि शताब्दी की बहुत सी पेंटिंग्स लगी थीं। १८ अगस्त सन् १९९३ में इसमें आग लग जाने से बहुत नुकसान हुआ था, लेकिन आज भी इसमें बहुत उम्दा पेंटिंग्स देखने को मिल जाती हैं। इसके दोनों तरफ टोकरियों में लटकें रंगबिरंगे फूलों की छटा कमाल की दीखती है। रॉस नदी के ऊपर बना ये पुल पुरातन कला का बेजोड़ नमूना है। 

नेचर संग्रहालय-    यहाँ पर बहुत सी प्रजातियों के जीव व सुन्दर रंगबिरंगी तितलियों व बीटल्स की इतनी प्रजातियाँ हैं की आर्श्चय होता है। शोध करने वाले छात्रों के लिए ये अति उत्तम जगह है। 

मनोर, एपा, बुकॅरर, वगैरह कुछ शानदार बड़े शौपिंग स्टोर हैं जहाँ पर से सोविनियर (यादगार वस्तु ) खरीद सकतें हैं। स्विट्जरलैंड अपनी चॉक्लेट और घड़ियों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इसके अलावा काऊ बेल, स्विस चाकू, कुकू क्लॉक वगैरह भी खूब बिकते हैं। 

अक्सर वक्त मिलते ही ऊपर पहाड़ पर चढ़ कर मैं कई बार सारे लुसर्न का नज़ारा देखती थी। स्विट्जरलैंड के सौंदर्य को निहारते हुए ठगे से रह जाते हैं। रॉस नदी का साफ़ चमकता पानी, उसके इर्द गिर्द बाहर खिली हुई धूप में रेस्तरां के बाहर बैठे लोग खाते -पीते गपशप व मस्ती करते समय बिताते हैं। कहीं भी चले जाओ नैसर्गिक सौन्दर्य जैसे सम्मोहित सा करता है। कुछ अन्य बातों के अलावा इस संस्मरण का ज़िक्र किये बगैर तो लुसर्न का वर्णन अधूरा रह जाएगा। 

वहाँ पर बुजुर्गों का इतना ध्यान रखा जाता है कि देखकर मन आह्लादित हो गया था। 

शनिवार या रविवार को हर हफ्ते उनसे मात्र दस स्विस फ्रैंक ( उनके दस रूपये ) लिए जाते थे। और उससे पूरे दिन उन बुजुर्गों का खाने पीने से लेकर सारा मनोरंजन तक का ख्याल रखा जाता था। एक दिन बाबा (भाभी की 70 वर्षीय माताजी ) ने जाने का मन बनाया और मुझसे भी पूछा, यदि मैं भी देखना चाहती हूँ तो चलू उन के साथ। उत्सुकता वश- कि कैसे रखते होंगे ये ६० -८५ वर्ष तक की उम्र के और करीब ४० बुजुर्गों का ध्यान सोच कुछ कौतुहल हुआ। अतिथी के तौर पर मुझे भी इजाज़त मिली। 

शानदार लग्जरी कोच, जितनी सीट उतने लोग। खड़े होकर लटक- अटक जाओ और घूम आओ का कोई रिवाज़ नहीं। प्रातः ६ बजे सभी एक जगह पर इकट्ठा हो गए। ठीक समय पर बस आई , नौजवान ड्राइवर.... माफ़ करें ड्राइवर नही कहते वहाँ.....कप्तान ने सभी बुजुर्गों को फ़िल्मी अंदाज़ में बड़ी शालीनता से एक हाथ से सहारा देकर एक -एक कर ऊपर कोच में चढाया। मेरी बारी आने पर उसने भवों को कुछ इस तरह सिकोड़ा......मानो पूछ रहा हो- कितने वर्ष की बुढिया हो ?  अपनी -अपनी भाषा में हम दोनो ने बात की। कुछ उसने कहा, कुछ मैंने कहा। उसे अंग्रेजी समझ नही आई और मुझे जर्मन समझ नही आई। हिसाब बराबर। 

फिर बाबा ने उसे अपनी भाषा में कुछ समझाया। जिससे उसकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। उसने बड़े अदब के साथ अपना हाथ मेरी तरफ भी बढाया। और मुझे अपना जवान होना और भारतीय नारी होना याद आ गया। झट से हाथ पीछे खीच लिया और झट- पट लगभग दौड़ती हुई सी बस में चढ़ गयी। उसके जोरदार ठहाके ने मेरा पीछा किया। 

बस शानदार सड़क पर हरे -भरे खूबसूरत फूलों व जंगल की मिली जुली खुशबू से महकती हुई चलने लगी। ऐसा लग रहा था मानो जंगल के भीतर प्रवेश करते जा रहे हों। वहीं कप्तान की ड्राइविंग सीट पर माइक भी लगा हुआ था, जिससे वो यात्रा का वर्णन बड़ी ही जीवन्तता से कर रहा था। बीच - बीच में गाना भी सुना रहा था। मेरी समझ में गीत के बोल तो नहीं आ रहे थे लेकिन उसकी आवाज़ बहुत मधुर व साफ़ थी ये पक्का था। सभी यात्री खुशी से चहक रहे थे जिससे उनके गुलाबी गालों की लाली बढती ही जा रही थी। 

बाबा हँसते हुए बोली -"ये कप्तान इस गाड़ी में अक्सर आता है, बहुत ही खुशमिजाज़ व अच्छ लड़का है। आज ज्यादा ही खुश लग रहा है। गाना भी इसने पहली बार सुनाया। मैंने दबी आवाज़ में कहा। 

"बाबा आज ये और भी बहुत काम करेगा पहली बार ....." 

बाबा की भावभंगिमा देखकर मुझे लगा की मेरा कहा शायद उनकी समझ में नहीं आया। इस तरह हँसते मुस्कुराते दो घंटे का सफ़र तय हुआ। और फिर एक हाल्ट आया। घनघोर जंगल में। चाय, काफ़ी ब्रेक.....

काली काफ़ी का मोह छोड़ कर मैंने प्रकृति के अद्भुत रूप को निहारने का मन बनाया सो अपना कैमरा लेकर दूर जा निकली। कितना कुछ है इस संसार में सराहने व खुश रहने को। प्रकृति का सौन्दर्य जादू सा मदहोश करता है। आज भी वो यादें मेरे भीतर कही उतनी ही ताज़ा हैं, उस जंगली घास व फूलों की भीनी भीनी खुशबू के साथ। 

जिस काली काफ़ी को मैं दूर छोड़ आई थी, वो कप्तान महाशय उसे दो बड़े बड़े मग में लेकर मेरी तरफ आते नज़र आए। साथ में उसका एक मित्र भी था। जिसे अंग्रेजी भाषा भी आती थी। भाषा के आभाव में भी वो कैप्टन मुझे बहुत कुछ समझा पा रहा था। कोई भी फूल, वनस्पति, कीड़ा आदि कही भी इशारा कर दो। वो उसके बारे में बहुत कुछ बता देता था। किसकी दवाई बनती है या फिर कौन सा पौधा जहरीला होता है आदि......उसका मित्र मुझे ट्रांसलेट कर देता था। कुछ पौधें मैं नमूने के तौर पर मैं घर लायी और पुस्तक द्वारा व लोगो से पूछने पर पता लगा की उस कप्तान को अच्छा ज्ञान था। 

बुजुर्गो रूपी बच्चों का धमाल देखकर आनंद आ रहा था। उनका बॉल के पीछे भागना, नदी में भीगना, दूसरों को भिगाना, खाना, पीना, संगीत, नृत्य कितना कुछ........ . दूर बैठी मैं उन सभी को मस्ती करते व खिलखिलाते देखती रही। अनायास ही अपने हिन्दुस्तानी बुजुर्ग याद आ गए। आँखों में मायूसी लिए, असहाय, दुर्बल काया, बेबसी लिए, उपेक्षा से मुरझाये चेहरों के साथ वो मेरी आँखों के सामने तैर गए। रोकने की बेकार सी कोशिश के बावजूद भी आँखों से अंजुरि भर आँसू छलक ही गए। 

तभी एक स्नेहिल से हाथ का स्पर्श पाकर, थोडा चौंक कर पीछे देखा तो अंकल फेडरिक थे। हँसमुख, रिटायर डॉक्टर। मेरे व्यथित ह्रदय के भाव को भाँप कर दूर करने की कोशिश करते हँसते हुए मज़ाकिया अंदाज़ मेँ बोले। 

" Dun be sad my child, come n play with we all young boys.... " 

मैं उन्हें कैसे समझाती की जब तक हमारे बुजुर्ग घर और बाहर उपेक्षित हैं तब तक ये sadness तो छलकती ही रहेगी। 

उनके साथ खेलते कूदते समय अति तेजी से बीत गया। थक कर सभी शाम की आखिरी चाय, काफी पी रहे थे कि बुलावा आ गया। वापस जाने का समय हो गया था। जब वापसी के सफ़र के लिए कोच में चढ़े तो सभी की सीट पर गिफ्ट पैक रखे थे। कितना कुछ था उस बड़े से पैक के अंदर। मेरे पैकेट मैं अन्य वस्तुओं के अलावा एक सुन्दर सी गुड़िया भी थी। जो आज भी मेरे घर की शोभा बढा रही है। और साथ में थीं ढेर सारी मीठी यादें .....बहुत बाद तक जब भी बाबा के फ़ोन आते तो वो बताती थी की वे सब मुझे बहुत याद करतें हैं। 

"और देखो में भी तो कर रही हूँ। है न ....?"



( यात्रा वृत्तांत 'दृष्टिपात पत्रिका में दिसंबर २००९ में प्रकाशित )

      
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