Saturday, December 31, 2016

अलविदा और स्वागत की बंदिश


इस सफ़र में नींद ऐसी खो गयी, 
हम न सोये, रात थक कर सो गयी।
 (राही मासूम रज़ा)

यूँ तो किसी को अलविदा कहना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है। इसलिए जाते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी...गुनगुना लेते हैं। कुल मिला कर जाता हुआ वर्ष -2016 खूब उलझने, पशोपेश, जद्दोजहद, शक़, कशमकश, गिले -शिकवे और मौज- मस्ती वाला सतरंगा वर्ष साबित हुआ। तमाम हलचलों के बीच जब आदमी मन बहलाने के साधनों को ईज़ाद करने में लगा रहे और ऊपरवाला अपनी नई बिसातें बिछाने में, तो क्या कीजे। 

इस दौरान देश को गर्म -सर्द होता रहा, मोदी चमकते गरजते रहे, राहुल के तरकश के शिकायती तीर ख़तम ही नहीं हो सके। केजरी भय्या को लगा जंग को विदा करके कमसकम एक जंग तो जीत ली। माया का मायावी संसार भूकंप सा डोलता रहा। जयललिता बिना शिकवे शिकायत के चुपचाप अपने ज़न्नत से ऐशो आराम वाले संसार को यहीं छोड़कर खाली हाथ ही चिर सफर पर चल दीं। तैमूर द्वितीय के आगमन का भव्य नवाबी स्वागत हुआ। कुछ पुरस्कार पाकर भी 'चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया' गाते हुए नाखुश ही रहे और कुछ खाली हाथ भी मस्त फ़कीर। 

FAR FROM THE MADDING CROWED की तर्ज़ पर गांव, देश, विदेश घूमने के बाद भी अपने सफर की न शाम आई न ठहराव। बहरहाल सब कुछ हुआ किन्तु जिस लेखन को अति प्रेम और शिद्दत से करती थी बस वही न हो सका, कलम की धार कुंद हो गयी। कुछ लिखा भी तो ऐसा कि बस....कलम चल जाने के बाद अपना कुलेख मैं खुद ही नहीं पढ़ सकती। अब इस बात का मलाल करें या फिर नए साल में कुछ नए शब्दों को हलाल करें सब गडमड है। ऊपरवाले वाले तेरा भी जवाब नहीं। 

जाते जाते हुए वर्ष के साथ - अख़्तर नज़्मी के एक उम्दा शेर का मतला और दुआ.....  

तुम जियो आम आदमी की तरह, 
ये दुआ आज तक किसी ने न दी। 

खास बनने की चाहत ही बड़े दुःख का कारण है। इसलिए या रब इस आने वाले वर्ष में सभी को खुश रहने की ताब दे। देश के तारनहारों को अमन चैन, प्यार -सौहार्द फैलाने की तहज़ीब दे, सभी को कुछ पल आराम और सुकून के मिले। उनके दिलों को प्यार मिले, क़रार मिले... 

शुभकामनाएं, आमीन !
 


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