Tuesday, January 7, 2014

वक्त ने किया क्या हंसी सितम


न खोजो बातों में अर्थ 
न सोचो कुछ करने से पहले 
होने दो दिल को पागल 
और जी लो आनंद से 

उस पेड़ के नीचे बैठे 
अस्त-व्यस्त चीथड़े पहने  
उलझे बालों वाले 
पागल से सीखा मैंने 
न ठण्ड उसे रोकती है 
न होश उसे टोकते हैं 

कभी देर तक हँसता है 
प्रेम की बातें करता है 
अपनी प्रेमिका से 
चूमता है माथा उसका 
और लगाता है गले 

अगले ही पल रो देता है 
सिसकियाँ भरता हुआ 
रखता है सर माँ के पैरों में 
और माँगता है माफ़ी 
दुःख से कराहता कह उठता है 
न आ सका काम तेरे 
न बचा सका तुझको 
मेरी माँ भारती 

सुना है युद्ध में गया तो था 
अन्य सिपाहियों के साथ 
परन्तु तब वापस न आ सका  
वर्षों बाद अब वतन आया है 
अपनी जान बचा कर 
और सारे होश गवाँ कर
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