Monday, January 19, 2026

एक राह तो वो होगी तुम तक जो पहुँचती है

शाम के साढ़े छह बजे थे। दोनों मेट्रो स्टेशन की बेंच पर बैठे एक दूसरे को पहचानने की कोशिश कर रहे थे। दोनों खामोश। सर्द दिल्ली ने शाम की धुंध ओढ़ ली। दिन भर के काम के बाद घर जाने की जल्दी दोनों को थी। 

"हे कामिया, अभी तक यही बैठी हो?" ऑफिस का साथी रितेश था। 

'हम्म कामिया... "तो आप कामिया हैं। हिन्दू कॉलेज से? 2010  के एम ए इंग्लिश बैच से। राइट फ्रेंड?"

"अब्सॉल्युटली करेक्ट, और तुम अभिनव, सेम बैच से, है ना? दोस्त मेरे दिमाग की चिप अभी सही काम कर रही है मतलब।" दोनों हंस दिए। बीच में था पंद्रह वर्ष का लंबा अंतराल। कॉफी के साथ अतीत को गुनगुनाने का वादा अगले दिन के लिए तय हुआ। 

नियत समय पर अगले दिन टेबल पर दो गर्म कॉफी थी, मफ़िन थे और साथ में थी ढेरों बेवजह बातें। मसलन कॉलेज के बाद क्या किया? शादी, बच्चे, नौकरी का क्या बना? कौन अब किस पद पर आसीन है, कौन सी गाड़ी, अपार्टमेंट आदि। कौन कितना ऊपर? कितना समृद्ध? 

कॉफी समाप्त होने तक बातों का सिलसिला भी पूरा हुआ। अपनी -अपनी सम्पन्नता बखानते हुए दोनों प्रसन्न हुए। वक्त के साथ दोस्ती की सुगंध उड़ चुकी थी। शेष रही दोस्ती पर पड़ी धुंध। वैसी ही अनजानी धुंध जैसी पिछली शाम मेट्रो स्टेशन पर थी।