Wednesday, November 25, 2009

आच्छादित आकाश

सुबह से ही आकाश बादलों से घिरा था..... उसके मन की तरह कितने ही डगमगाते भावों से आच्छादित ...बालकनी से एकटक बाहर देखती हुयी.... बहुत देर तक कल कही गयी संजोग की बात पर मनन करती रही -"ज़िन्दगी की किताब को सीधी पकडो सुमिता... "।

"कैसे , कहाँ क्या उल्टा हो गया ...??" सोचती रही वो ...
स्थिर बुद्धी से सहज होकर देखती, सोचती वो कुछ और उलझ जाती है -"इतना उलझा हुआ क्यूँ है संजोग का व्यक्तित्व? इतनी कडुवाहट, समाज के प्रति, देश के प्रति, लोगों के प्रति, यहाँ तक की कभी -कभी अपने प्रति भी...."

रोज की दिनचर्या से खीजता ,झुंझलाता , परिस्थितयों से समझौता ना बैठा पाता संजोग ...अक्सर सुमिता पर ही खीजता ।
लम्बे समय से सुमिता चुपचाप सब कुछ समझने का नाटक करती हुयी उस दिन का इंतज़ार कर रही थी की कब संजोग के अन्दर का हहराता हुआ, अवसाद का सागर बाहर निकल कर शांत हो जायेगा, वक्त के साथ थम जायेगा और वो उसके प्रेम को समझ पायेगा ...

इसी बीच सहज सरल, सुलझाव लिए, अपनापन जताते कब अनिमेष के प्रति आकर्षित हो गयी पता भी नहीं चला सुमिता को .....

पिता के शादी के लिए बारबार कहने पर अब वो जीवन के दोराहे पर भौचक्की सी खड़ी सोचती रही....जीवन की लम्बी दौड़ कहाँ से शुरू करे .....व्यथित करता प्रेम....?? या सहज करता अपनापन ....??

Saturday, November 7, 2009

प्रेमवर्षा



शायद तुमको याद होगा
ऐसी ही बरसात के बाद
एक प्रेमगीत
मेरे जीवन सुर पर
लहराया था
बहा था
झर झर निर्झर
इन नयनों से
बिना रुके
तुम्हारे समक्ष

एक बरसात के बाद
इन आँखों मैं
ना दामिनी थी
न थी गर्जना
थी तो केवल वेदना
व्याकुल ह्रदय की चेतना
आतुर थी जो
बह जाने को
कुछ अधरों से
कुछ नयनों से

प्रेम तुम्हारे नयनों मैं
स्नेह तुम्हारे शब्दों मैं
अश्रु मेरी आँखों मैं
कुछ इस तरह
प्रेम वर्षा
परिभाषित हुयी
याद होगी तुम्हें

वो बरसात !!!!

Saturday, October 31, 2009

अपनी ही तलाश ! पॉङ्वखोली, Uttarakhand Part -2

दूसरे दिन सुबह हमने द्वाराहाट से दूनागिरि मंदिर की तरफ प्रस्थान किया ....कहानी है की...जब लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे और हनुमान जी उनके लिए संजीवनी बूटी लेकर वापस आ रहे थे, तब द्रोणॉचल पर्वत का एक हिस्सा यहाँ पर टूट कर गिर गया था.....फिर बारहवी शताब्दी में कत्यूरी राजाओं ने यहाँ पर माँ भगवती की मूर्ति स्थापित कर दी।
यहाँ पर मनोकामना पूरी होने पर घंटी चढाने का रिवाज है...और हजारों की संख्या में घंटिया देखकर उसके आगे हम नतमस्तक हो गए। दूनागिरि से लगभग १७ किलोमीटर दूर है पॉडवखोली......कहते हैं अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहाँ पर आखिरी का एक वर्ष व्यतीत किया ....
(हर सिंह शिकारी के साथ भाई )
जहाँ तक सड़क बनी हुयी है उस स्थान का नाम कौरवछावनी था...जो कालांतर में बदल कर कुकुछीना हो गया कथा है की कौरवों ने यहाँ तक पांडवों का पीछा किया था ....यहाँ से ऊपर घने जंगलों में है पॉडवखोली....समुद्र तट से ८,८०० फीट की ऊंचाई पर स्थित साढे तीन किमी का पैदल ट्रैक....नीचे कुकुछीना पर 'हर सिंह शिकारी' से मुलाकात हुयी ९० वर्ष के श्री हर सिंह..चुस्त दुरुस्त.... दूर के गाँव व गुफाएं दिखा कर बता रहे थे की क्या क्या देखना है ...और मैं हैरान होकर उनकी आँखों को देखती..... बिना चश्में के भी वो साफ़ देख पा रहे थे ....छोटी छोटी मासूम आँखें जिन में अपार ख़ुशी व स्नेह भरा था...

अपने कई निशान दिखा कर बड़ी सहजता से (जैसे खिलोनो से खेला हो) हँसते हुवे बता रहे थे कहॉ- कहॉ बाघ ने उन पर हमला किया....लगभग १५० के करीब नरभक्षी बाघ मारे उन्होंने सन् १९९० में आखिरी आदमखोर बाघ द्वाराहाट में मारा था .....उत्तराखंड में बाघों का आतंक यदा-कदा बना ही रहता है जो मवेशियों के साथ साथ इंसान पर भी हमला कर देते हैं... कहते हैं -"१० - २० रूपये में बाघ की खाल बेच देते थे ...बाद में सरकार के पास जमा करानी होती थी ..."थोडा गर्वित होकर बोले -"जब कोई बाघ को नहीं पकड़ पाता था तो 'डी एम् साहब' कहते थे ...'हर सिंह 'को बुलाओ..मेरे पास घर पर कुछ फोटो भी हैं (जो वहाँ से कुछ किमी की दूरी पर था) अगली बार जब आप लोग आएंगे तो दिखाऊंगा .."

जिस व्यक्ति ने एक बार शोहरत का जरा सा भी अंश यदि महसूस किया हो वो गुमनामी में थोड़ा मायूस हो जाता है....जब मैंने उनकी एक फोटो लेने की इजाज़त माँगी तो जोश, ख़ुशी और उत्साह से भर कर झट पट नेमप्लेट जो दुकान की दीवार पर टंगी हुयी थी निकाल कर पोज देने लगे .....अब हम पाँडवखोली की ओर चल पड़े .....

प्राकृतिक सौन्दर्य तो जैसे चारों ओर बिखरा हुआ था ...अति खूबसूरत मार्ग, जंगली वनस्पतियाँ,जड़ी बूटियाँ, फर्न बाँज व बुरांश के घने वृक्ष..... मार्च -अप्रैल में जब बुरांश का लाल फूल खिलता है तो जैसे बहार अपनी ही सुन्दरता पर रीझ उठती हो .....रेड कारपेट पर चलने का आभास ......

एक घंटे में स्वर्गपुरी पाँडवखोली द्वार दिखलायी दिया उसके अन्दर प्रवेश करते ही एक विशाल बुग्याल (meadow )था जिसके चारो ओर घना जंगल और इस बीच के क्षेत्र में एक भी वृक्ष नहीं...सिर्फ सफ़ेद फूलों वाली मखमली हरी घास ..इसे 'भीम की गुदड़ी' ..या 'भीम का गद्दा' कहा जाता है... करिश्मा कुदरत का ......
(भीम की गद्दी )
उसके आगे महंत श्री श्री १०८ बलवंत गिरी (नागा बाबा) जी का मंदिर परिसर है उन्होंने वहाँ पर ३८ वर्ष तक तपस्या की थी १3 दिसम्बर १९९४ मोक्षदा एकादशी को उन्होंने महाप्रयाण किया ....यहीं लाहिरी महाराज ने भी ७ दिन तपस्या की थी व पास में ही महाअवतार बाबा की भी गुफा है.....

महन्त बलवंत गिरी जी की एक भव्य मूर्ति भी स्थापित है व उनका गुफानुमा धूनीस्थल आज भी वैसा ही है जैसा मैंने 8-9 वर्ष की अवस्था में देखा था। तब से अब तक वो धूनी भी लगातार जल रही है ...
वर्षों पहले तब पिताजी इन बड़ी सी जटाओं वाले बाबा जी को हमारे घर रानीखेत लेकर आ गए थे....शाम को पूजा के वक्त उन्होंने एक अलग ही तरह का वाद्य बजाया ...कुछ कुछ सींग से अकार का.....
तब आस-पास के लोग उनके दर्शन के लिए एकत्रित होने लगे ....विचलित हो कर उन्होंने पिताजी को कहा की उन्हें दूसरे ही दिन वापस उनके जंगल में जाना है। इस पर मैंने तब एक सवाल कर दिया था उनसे ....-"क्यूँ आप उस बिना लाइट, पानी के.... बिना साधन वाली जगह पर वापस जाना चाहतें हैं....?" (आज वहाँ पर खाने व रहने की पूरी व्यवस्था है )
कम बोलने वाले, मृद भाषी बाबाजी तनिक मुस्कुराकर कुमाउनी भाषा में बोले -" तू भी एक दिन इन साधन ,सुविधाओं से ऊबकर एकांत ढूढती जंगल की ही ओर जाना पसंद करेगी...."
तब मुझे उनकी बात समझ में तो नही आयी.... पर जितनी समझ आयी वो अच्छी नहीं लगी....परीलोक के सपने जो सजाती थी तब ......
तब अगले दिन उन्हें छोड़ने हम सभी पाँडवखोली आये ....बीहड़ जंगल व केवल बाबाजी की एकमात्र कुटिया ...जिसमें बीच में धूनी जल रही थी, पीने को मटमैला प्राकृतिक पानी व दिए की माध्यम रौशनी॥ उस दिन वहीं रहना था साधनों की आदत के बावजूद भी कोई कष्ट हुआ था बिलकुल याद नही पड़ता .....महापुरुषों की भी अपनी ही शक्ति व उर्जा होती है शायद ....आज वहाँ धूनी के आस-पास बैठकर आह्लादित होकर कुछ देर ध्यान लग गया, फिर बाबाजी की कही वर्षों पुरानी वो बात भी याद आ गयी।
आज सच्चाई यही है कभी -कभी इन सुविधाओं व आडम्बर से भरपूर दुनिया से ऊब सी जाती हूँ और मन होता है दूर कही जाने को...... शांति व मौन को तलाशती बहुत ........ दूर.......

Thursday, October 22, 2009

बेचारा बचपन


उस रोज़ .......
सड़क किनारे बने ढाबे पर
चुपचाप चाय का ज़ायक़ा समझ रही थी
अचानक नज़र पड़ी बचपन... बेचारे बचपन पर
उम्र शायद दस वर्ष
गंदे हाथ पैर, बिखरे बाल
दुबली काया पर फटी कमीज़
पैबंद लगी हाफ पैंट
चप्पल रहित पैर
मानो धरती के स्पर्श से आनंदित हों
कुछ गुनगुना रहा था
शायद मुस्कुरा भी रहा था
बहुत देर एकटक देखती रही सोचा
ये भी एक जीवन है
संघर्षमय !!!!
कर्मण्ये वाधिकारस्ते को सार्थक करता हुआ
चाय समाप्त हो चुकी थी
मेरे इशारे पर वो कप लेने आया
सहानुभूतिवश मैंने एक नोट बढ़ाया
बचपन... वो बेचारा बचपन

दो आँसू उन आँखों से टपके
शायद ख़ुशी और उम्मीद के आँसू
दो आँसू इन आँखों से टपके
कुछ ना कर पाने का अफ़सोस
कुछ बेबसी के आंसू

तभी छोटू की आवाज़ का उद्‌घोष
वो हड़बड़ाया, चौंका और पलटा
छोटा अस्पष्ट सा कुछ बोलकर चला गया
दूर से एक बार फिर पलट कर देखा
बचपन... उस बेचारे बचपन ने ....

Sunday, October 4, 2009

रंगरंगीला उत्तराखंड ! Part - 1

कल ही उत्तराखंड यात्रा से वापिस आयी हूँ सबकुछ अभी आँखों में बखूबी समाया हुआ हैं इसलिए यूरोप अगली पोस्ट में लिखूंगी.....ले चलती हूँ आप सभी मित्रों को उत्तराखंड की सैर पर .......

रानीखेत - बेहद खूबसूरत, भरपूर हरियाली व भाँति भाँति की वनस्पतियों व फूलों से महकते हुवे सर्पिलाकार रास्ते, ठंडक का अहसास कराती हुयी हिमालय की स्वच्छ हवा व चीड़ के पेड़ों की छटा .......
दोपहर ४ बजे यहाँ पर पहुँचते ही बिना देर किये बचपन को पुनः जीने के लिए, यादों को जीवंत करने निकल पड़ी बहुत कुछ बदला- बदला लेकिन बहुत कुछ बिलकुल वैसा ही...वो गलियां, सड़कें, रास्ते, दुकाने, लाइब्रेरी, स्कूल, सब कुछ थोड़ा संकरे से लगे ...शायद आँखों को दिल्ली के विस्तार की आदत हो गयी....

रानीखेत मेरी जन्मस्थली भी है जीवन के शुरूआती कुछ वर्ष यहाँ पर जीने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.....



दुसरे दिन सुबह अपना पहला व प्रारंभिक स्कूल 'कनोसा कॉन्वेंट' देखने का लोभ नहीं छोड़ पायी...नर्सरी से पांचवी तक यही सिस्टर्स के सानिध्य में रही.....वही गेट, झूले, कक्षा, खेल के मैदान, बिल्डिंग..सब कुछ एकदम वैसा ही साफ़ सुथरा, मनभावन ......सब कुछ देखकर प्रेम आँखों के रस्ते उमड़ पड़ा था..अति सुखद क्षण ...

गॉधी चौक से लेकर मालरोड तक कितना धमाल मचाते थे हम सभी सहेलियाँ ....अभी भी २ मित्र मिले और चाय के साथ जी भर कर यादों को जिया फ़िर ........


द्वाराहाट -अगले दिन प्रस्थान किया द्वाराहाट के लिए ..जहाँ पर कुमाउँ इन्जिनेरिंग कोलेज, स्वामी योगदानंद का योगदा आश्रम, व प्राचीनतम ग्यारहवीं,बारहवीं शताब्दी के बने मंदिर अवशेष भी .....


जिन्हें देखकर पता लग रहा था की अक्रमणकारियों ने हमारी इन धरोहरों को कितनी निर्ममता से ध्वस्त किया ....

द्वाराहाट अति हरा-भरा मानसिक शांति देता मनोरम स्थान, गाँव व कसबे का मिला जुला रूप अपनी इक अलग ही कहानी कह रहा था......

सुंदर मंदिरों का समूह देख कर मन अति आनंदित था तो वहीं पर इस धरोहर को न संभल पाने से मन तीस्ता भी है .....उचित देखरेख के अभाव में जल्दी ही आने वाली पढी इन सब से वंचित हो जायेगी .......


राकृतिक मीठे पानी का श्रोत (नोहोला ) भी दिखा पानी से लबालब..अन्यथा बाकी जगह अब ये श्रोत लगभग सूख चुके हैं ....


ग्रामवासियों का अति प्रेम व आदर सत्कार स्वीकारते उन्हें धन्यवाद देते वापस आ गए ......

अगला पड़ाव था दूनागिरी माता का मंदिर(द्वाराहाट से 15 किलोमीटर ) व पांडवों के अज्ञातवास के दौरान का स्थान पॉडवखोली( द्वाराहाट से 17 किलोमीटर ) ..........










Saturday, September 19, 2009

लुसर्न के इर्द गिर्द

लुसर्न रौस नदी की कल-कल से गूंजता और भी खूबसूरत लगता है। यहाँ की मुद्रा स्विस फ्रैंक है व भाषा स्विस जर्मन प्रयोग में लायी जाती है। मैं आप सभी लोगों को इन जगहों का बहुत इतिहास नहीं बताउँगी वो गूगल सर्च पर भी मिल जायेगा। कुछ ख़ास जगहों के बारे में बताउँगी व कुछ संस्मरण भी ह्म्म्म...
वैसे भी चित्र कम ही हैं क्यूँ की उस समय वीडियो पर जोर था। अब अगर अपलोड करना आया तो कुछ अंश जरूर करुँगी। और कुछ चित्र एलबम में लैमिनैट हैं सो फोटो की फोटो ली है जो साफ़ नहीं आ पायी । लुसर्न की महत्वपूर्ण जगहों में हैं ......... डाइंग लायन- फ्रेंच क्रांति के समय जब कई सौ स्विस सैनिक मारे गए थे तो उनकी याद में ये बनाया गया था। इतनी बारीकी से इसे तराशा है की कलाकृति देखते ही बनती है। खूबसूरत साफ़ तालाब से सजा व भरपूर हरीतिमा से घिरा ये सैलानियों का बहुत प्रिय स्थान है ।
वाटर टैक- ये अष्टाकार आकृति तेरहवी शताब्दी में बनी थी। तब इसमें खजाना रखा जाता था। आज वाटर टैक, डाइंग लायन और चैपल ब्रिज स्विट्जरलैंड के मशहूर लैंडमार्क है.......
शीर्ष चित्र में आप देखें चैपल ब्रिज और पीछे अष्टाकार वाटर टैक।

चैपल ब्रिज- १३३३ में लकडी से बना हुआ यूरोप का सबसे प्राचीन पुल है जिसके भीतर १७वि शताब्दी की बहुत सी पेंटिंग्स लगी थीं. १८ अगस्त सन् १९९३ में इसमें आग लग जाने से बहुत नुकसान हुआ था, लेकिन आज भी बहुत उम्दा पेंटिंग्स देखने को मिल जाती हैं। रौस नदी के ऊपर बना ये पुल पुरातन कला का बेजोड़ नमूना है.........

नेचर संग्रहालय- यहाँ पर बहुत सी प्रजातियों के जीव व सुन्दर रंगबिरंगी तितलियों व बीटल्स की इतनी प्रजातियाँ हैं की आर्श्चय होता है। शोध करने वाले छात्रों के लिए ये अति उत्तम जगह है .......

मनोर, एपा, बुकॅरर, वगैरह कुछ शानदार बड़े शौपिंग स्टोर हैं जहाँ पर से सोविनियर (यादगार वस्तुवें ) खरीद सकतें हैं। स्विट्जरलैंड अपनी चौक्लेट्स के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इसके अलावा काऊ बेल, स्विस चाकू वगैरह भी खूब बिकते हैं .........
ऊपर पहाड़ पर चढ़ कर कई बार मैं सारे लुसर्न का नज़ारा देखती थी। कभी कभी र्रौस नदी का साफ़ चमकता पानी, उसके इर्द गिर्द बाहर खिली हुयी धूप में रेस्तरां के बाहर बैठे लोग खाते -पीते गपशप व मस्ती करते समय बिताते ....कहीं भी चले जाओ नैसर्गिक सौन्दर्य तो जैसे सम्मोहित सा करता है.......

कुछ अन्य बातें याद करते हुवे इस संस्मरण का ज़िक्र किये बगैर तो लुसर्न का वर्णन अधूरा रह जायेगा ......वहाँ पर बुजुर्गों का इतना ध्यान रखा जाता है की देखकर मन आह्लादित हो गया था ........

शनिवार या रविवार को हर हफ्ते मात्र दस स्विस फ्रैंक (दस रूपये ) जमा किये जाते थे और पूरे दिन उन बुजुर्गों का खाने पीने से लेकर सारा मनोरंजन तक का ख्याल रखा जाता था। एक दिन बाबा (भाभी की 70 वर्षीय माताजी ) ने जाने का मन बनाया और मुझसे भी पूछा यदि मैं भी देखना चाहती हूँ तो चलू उन के साथ ......उत्सुकता वश कि कैसे रखते होंगे ये ४० -५० और ६० -८५ तक की उम्र के बुजुर्गों का ध्यान सोच कुछ कौतुहल हुआ....अतिथी के तौर पर मुझे भी इजाज़त मिली .....
शानदार लग्जरी कोच, जितनी सीट उतने लोग....... खड़े होकर लटक अटक जाओ और घूम आओ का कोई रिवाज़ नहीं। प्रातः ६ बजे सभी एक जगह पर इकट्ठा हो गए। ठीक समय पर बस आई , नौजवान ( ड्राइवर.... माफ़ करें ड्राइवर नही कहते वहाँ..... )कप्तान ने सभी बुजुर्गों को फ़िल्मी अंदाज़ में बड़ी शालीनता से एक हाथ से सहारा देकर एक एक कर ऊपर बस में चढाया .....मेरी बारी आने पर उसने भवों को कुछ इस तरह सिकोड़ा......मानो पूछ रहा हो- "कितने वर्ष की बुढिया हो ? " कुछ उसने कहा, कुछ मैंने कहा .....उसे अंग्रेजी समझ नही आई.....मुझे जर्मन समझ नही आई.....हिसाब बराबर...........
बाबा ने उसे अपनी भाषा में कुछ समझाया जिससे उसकी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा फिर.........
उसने बड़े अदब के साथ वो हाथ मेरी तरफ भी बढाया .....और मुझे अपना जवान होना और भारतीय नारी होना याद आ गया .....झट से हाथ पीछे खीच लिया और झट पट लगभग दौड़ती हुयी सी बस में चढ़ गयी....उसके जोरदार ठहाके ने मेरा पीछा किया और मैंने कहा "तू रुक अभी बच्चू ......."जो उसकी समझ में फिर से नहीं आया........
बस हरे -भरे खूबसूरत फूलों व जंगल की मिली जुली खुश्बू से महकती हुयी चलने लगी.....वहीं कप्तान की सीट पर माइक भी लगा होता है........जिससे वो यात्रा का वर्णन बड़ी ही जीवन्तता से कर रहा था......बीच बीच में गाना भी सुना रहा था....मेरी समझ में गीत के बोल तो नहीं आ रहे थे लेकिन उसकी आवाज़ बहुत मधुर व साफ़ थी ये पक्का था ....सभी खुशी से चहक रहे थे जिससे उनके गुलाबी गालों की लाली बढती ही जा रही थी.....
बाबा बोली -"ये कप्तान अक्सर आता है, बहुत ही खुशमिजाज़ व अच्छ लड़का है .......आज ज्यादा ही खुश लग रहा है ....गाना भी पहली बार सुनाया ..." मैंने कहा -"बाबा आज ये और भी बहुत काम करेगा पहली बार ....." जो बाबा की भावभंगिमा देखकर मुझे लगा की शायद उनकी समझ में नहीं आया .....
इस तरह हँसते मुस्कुराते ...२ घंटे का सफ़र तय हुआ....और एक हाल्ट आया।चाय, काफ़ी ब्रेक.........

काली काफ़ी का मोह छोड़ कर मैंने प्रकृति के अद्भुत रूप को निहारने का मन बनाया सो अपना कैमरा लेकर दूर जा निकली....कितना कुछ है इस संसार में सराहने व खुश रहने को.... प्रकृति का सौन्दर्य जादू सा मदहोश करता........आज भी वो यादें मेरे भीतर कही उतनी ही ताज़ा हैं उस जंगली घास व फूलों की भीनी भीनी खुशबू के साथ........

जिस काली काफ़ी को मैं दूर छोड़ आई थी, वो कप्तान महाशय उसे दो बड़े बड़े मग में लेकर मेरी तरफ आते नज़र आये ......भाषा के अभाव में भी बहुत कुछ सीख समझ लेते थे.......कोई फूल, वनस्पति, कीड़ा कही भी इशारा कर दो......वो बहुत कुछ बता देता था उन सब के बारे में.....किसकी दवाई बनती है या फिर कौन सा पौधा जहरीला होता है आदि......वो कुछ मैं नमूने के तौर पर मैं घर लायी और पुस्तक द्वारा व लोगो से पूछने पर लगा की कप्तान को भी अच्छा ज्ञान था.......

बुजुर्गो रूपी बच्चों का धमाल देखकर आनंद आ गया....बाल के पीछे भागना, नदी में भीगना, दूसरों को भिगाना, खाना, पीना, संगीत, कितना कुछ........ दूर से मैं इन सभी को मस्ती करते व खिलखिलाते देखती रही और अनायास ही अपने हिन्दुस्तानी बुजुर्ग याद आ गए......... आँखों में मायूसी लिए, असहाय, दुर्बल काया, बेबसी लिए, उपेक्षा से मुरझाये चेहरों के साथ मेरी आँखों के सामने तैर गए ........ रोकने की बेकार सी कोशिश के बावजूद भी अंजुरि भर आँसू छलक ही गए ..........

तभी एक स्नेहिल से हाथ का स्पर्श पाकर, थोडा चौंक कर पीछे देखा तो अंकल फेडरिक थे..... हँसमुख, रिटायर डोक्टर, मेरे व्यथित ह्रदय के भाव को भाँप दूर करने की कोशिश करते हुवे बोले - " Dun be sad child,come n play with we young boys.... " मैं उन्हें कैसे समझाती की जब तक हमारे बुजुर्ग घर और बाहर उपेक्षित हैं तब तक ये sadness तो छलकती ही रहेगी.......

उनके साथ खेलते कूदते समय अति तेजी से बीत गया.........थक कर सभी शाम की आखिरी चाय, काफी पी रहे थे तभी बुलावा आ गया वापस जाने का समय हो गया था। जब वापसी के सफ़र के लिए बस में चढ़े तो सभी की सीट पर गिफ्ट पैक रखे थे। कितना कुछ था उन सब के अन्दर .........मेरे पैकेट मैं एक सुन्दर सी गुड़िया भी थी .....जो आज भी मेरे घर की शोभा बढा रही है, और साथ में थीं ढेर सारी मीठी यादें .....

बहुत बाद तक भी बाबा के फ़ोन आते तो वो बताती थी की वो सब मुझे बहुत याद करतें हैं...."और देखो में भी तो कर रही हूँ है ना ....??"
आगे का सफ़र फिर कभी..........

Saturday, September 12, 2009

एल्प्स की वादियाँ

कुछ वर्ष पूर्व विदेश यात्रा ( स्वीज़रलैंड व यूरोप ) और एस्कोर्टिंग दोनों का पहला अवसर मिला जिसे मैंने बिना गवाएँ सहेज लिया...... पहली बार वो भी बिलकुल अकेले....... मैं अति रोमांचित हो उठी थी। तैयारी के तौर पर यूरोपा गाइड बुक व कुछ अन्य पुस्तकें ,खरीदी थोडा जर्मेन भाषा का कामचलाउ ज्ञान, वीडियो कैमरा, डिजिटल कैमरा और भारतीय संस्कृति को उजागर करते मित्रों व रिश्तेदारों के लिए उपहार ...........

६ मई की रात को उड़ चली ऐल्प्स की हसीन वादियों के ओर....... सुबह ७ बजे परिचारिका की आवाज सुनाई दी -"अगले एक घंटे में हम लोग ज्यूरिक पहुँच जायेंगे" जब मुझे लगा हम ऐल्प्स के ऊपर से गुजर रहें हैं तो अति उत्सुक व रोमांचित होकर नीचे झाँका....... चकित कर देने वाली खूबसूरती चारों ओर बिखरी हुयी थी, दूर दूर तक पहाड़ियों पर फैली हरियाली ऐसा आभास दे रही थी- जैसे चित्रकार ने सारे जहाँ में बहुत ही करीने से हरा रंग भर दिया हो...............

उनके ऊपर छिटकी हुयी बर्फ व कई खूबसूरत साफ़ नीले पानी की झीलें देखकर आह्लादित हो उठी ........भावविह्वल हो आँखों से आँसू छलक आये थे और ये भी ज़िन्दगी का पहला अनुभव था जब ख़ुशी से आँसू छलके थे। इस विश्व में शायद ही इतनी रमणिक जगह कोई और हो ....धरती पर स्वर्ग, शान्त, मौन सहेजती , स्वच्छ, धवल, फूलों व हरियाली का मखमली कालीन का सा आभास देती। भावविभोर हो उस नयी दुनिया में खो सी गयी ...........

ज्यूरिक बेहद साफ़ शहर है। वहाँ से एक घंटे में कार द्वारा हम घर पहुँच गए .....लुसर्न !!!
लुसर्न पहुँचने पर सभी पारिवारिक सदस्य और बड़ी संख्या में मित्रगण बड़ी बेताबी से मेरा इंतज़ार कर रहे थे। हम भारतीय की ही तरह ये अंग्रेज लोग भी बहुत आत्मियता से मिलतें हैं, तहज़ीब वाले व मिलनसार भी होते हैं। सारा कमरा फूलों व चौकलेट्स से सजा हुआ था.....काली काफी, चौकलेट्स और मेरी प्रिय देसी चाय के साथ-साथ मस्ती, प्रेम व अपनेपन से मैं आनंदित हो उठी थी............

उनमें से कुछ अंग्रेज मित्रों ने भारतीय महिला पहली बार देखी थी। मैं उनके साफ़ दूध सी गुलाबी रंगत लिए हुवे चेहरे और सुनहरे बालों की ओर आकर्षित होती तो वो मेरे काले बाल व सांवली रंगत पर आश्चर्य करते थे। बाबा (भाभी की माताजी) तो बड़े स्नेह से पता नहीं कितनी बार मेरे चेहरे व बालों को छूती की कैसे मैंने ये श्यामल वर्ण पाया ....कौन सी क्रीम से सनटैन हुआ ?? इतना अपनापन भारतीयों के प्रति देखकर मन गदगद हो गया और मैं अपनी सारी थकान भूल गयी................


अगले दिन से शुरू हुआ सिटी टूर........... लुसर्न, स्वीज़रलैंड के मध्य में स्थित है। यहाँ पर मैं दो महिने रही...जिसमें से १७ दिन यूरोप दर्शन रहा। आगे फिर कभी आप सभी मित्रों को इसके आस पास की खास-खास जगहों पर ले चलूँगी साथ बने रहें ............