Friday, March 9, 2012

शेरलाक होम्स का अदभुत संसार, Sherlock Homes Museum


 यूँ तो जासूसी उपन्यासों और लेखों में मुझे कभी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं रही लेकिन शेरलाक होम्स और उनकी गहरी रहस्यमई गुत्थियों को सहजता से सुलझा लेने का हुनर मुझे बहुत आकर्षित करता है जीवन के शुरुआती वर्षों में .....अन्य कुछ लोगों की ही तरह मैं भी उन्हें एक जीता जागता व्यक्ती ही समझती थी.....बाद में मालूम हुआ वो मात्र एक ब्रिटिश लेखक और चिकित्सक सर आर्थेर कोनन डॉयल द्वारा रचा गया जासूसी चरित्र  है ऐसे भी महान लेखक हैं इस दुनिया में जो अपने द्वारा रचे काल्पनिक पात्रों को भी जीवित कर दिये..... 

 
 शेरलाक होम्स का शानदार संग्रहालय लन्दन में है.....ये दुनिया का पहला ऐसा संग्रहालय है जो किसी उपन्यासिक चरित्र पर बना है....कुछ समय के बाद  स्विट्जरलैंड के बर्नीज आल्प्स के मेरिनगेन नामक स्थान पर भी इसका एक छोटा रूप बनाया गया....


२० जुलाई  २०११ में  इंटरलाकन में मेरा दो रातों का विश्राम था सो अगले दिन वहाँ से १८.३ किमी की दूरी पर बना ये संग्रहालय देखने का अवसर निकाला.... कार द्वारा इंटरलाकन से मेरिनगेन का सफ़र करीब ४५ मिनट् का था.....


जितने प्रेम से मैं अपने पसंदीदा लोगों की जीवनी पढना पसंद करती हूँ उतनी ही शिद्दत से मुझे संग्रहालय भी आकर्षित करते हैं, बहुत खुशी और ढेरों आश्चर्य लिए कि कैसा होगा एक काल्पनिक व्यक्ती का जीवन संसार और उसका जीवन चरित्र अनुभव करने मेरिनगेन पहुँची छोटा सा मगर साफ़, सुन्दर, सजाया हुआ सा मेरिनगेन 
संग्रहालय के बाहर उनकी एक सजीव सी मूर्ती लगी हुई है......उनसे थोड़ा रूहानी संवाद करने का आनंद भी लिया.......

भीतर टिकट के साथ एक माइक्रोफोन भी मिला जिसका एक सिरा कान पर लगाना था और दूसरे पर सेंसर लगा था जिस से उस वस्तु विशेष के बारे मैं जानकारी हासिल कर सकें, कई भाषाओँ में से अपनी पसंदीदा भाषा पर इसे सेट किया जा सकता था........टेक्नोलोजी भी कितनी कमाल की चीज़ है 

 ये छोटा सा संग्रहालय इंग्लिश चर्च में बना हुआ है, ऊपर कुछ पेंटिंग्स और जानकारियां हैं, नीचे तल में था शेरलाक होम्स का अदभुत संसार 


वहाँ उनके बारे में कई जानकारियों सहित उनके प्रयोग में लाने वाली वस्तुवें भी रखीं हैं, उनके हैट, दस्ताने, जेब घड़ी, लेन्सेस, सिगार, कोट, छड़ी, चाबुक, डायरी, पेन, चश्मा, उनके द्वारा लिखे पत्र, पुस्तकें, पिस्तौल आदि..... सभी के बारे में जानकारी लेते, वर्णन सुनते, देखते, समझते आगे बढ़ते रहे...अब सामने एक बेहतरीन ढंग से सजा कमरा है, रहस्यों को सुलझाने में जरुरी सभी सामान के साथ-साथ यहाँ पर उनका शानदार शोफा पलंग, कुर्सी, टेबल, शीशा, फायर प्लेस, बहुत सी पुस्तकें और उनकी स्वयं की जरूरतों का सामान भी रखा हुआ है......यहीं पर उन्होंने डाक्टर वाटसन के साथ कई रहस्यों को सुलझाया था, लेसदार रेशमी पर्दों से सवंरा ये कमरा बेहद मनमोहक और सजीव है.  

 मैं तो इन सब में इतना खो गई थी की किसी जिंदादिल अनजान ने मुस्कुराते हुवे हाथ से कंधे पर टैप कर के कहा "I think its time to go out, or you want to stay here with his ghost" मुझे अंग्रेजों के किसी जगह विशेष का ज्ञान होना और उनकी जिन्दादिली बहुत पसंद आती है.......खुले दिल, खुली सोच वाले और पूरी जानकारी रखते हुवे प्रसन्नचित लोग........

अब वहाँ से आनंदित होते और मिक्रोफोन वापस करते हुवे बाहर आ जाते हैं, वहाँ से दूर दिख रहा था स्विस आल्प्स का राखंबक फाल् जहाँ से कहा जाता है एक रहस्य सुलझाने के दौरान अपने दुश्मन से लड़ते हुवे उनकी नीचे गिर कर म्रत्यु हो गई थी......परन्तु बाद में अपनी आपार प्रसिद्धी और अपने चाहने वालों के आग्रह पर फिर उन्हें जीवित दिखाना पड़ा था....

सब कुछ इतना जीवंत, सुन्दर व व्यस्थित है की बहुत ही रोमांच व आश्चर्य से होती मैं फिर सोचने लगी....क्या वास्तव में कल्पना में रंग भरकर उसे साकार, सजीव किया जा सकता है, काश......काश.....

कल्पना लोक के इस जासूस को आज भी मैं जीवित व्यक्ती के रूप में ही पसंद करती हूँ, याद करती हूँ......

Monday, February 27, 2012

Give me some sunshine

रविवार कभी भी इतना तकलीफदेह नहीं रहा, कैसा अजीब सा दिन था.....यूँ तो चारों तरफ गाड़ियों, इंसानों और मशीनों का खूब शोर था, परन्तु मैं इन सब से दूर थी जहाँ तक ये शोर पहुँच नहीं पा रहा था, या कहूँ.....मुझे सुनाई नहीं दे रहा था.......भीतर दीमाग और दिल से उठता शोर, उसे मैं सुन रही थी, घुटन का सा भाव,सब कुछ धुंधलके में खोता हुआ, अस्पष्ट, अवर्णित, कभी सुर्ख सफेदी कभी घुप्प स्याह अँधेरा. आज की तारिख में डायरी में लिख देना चाहती थी..... कई बार पेन उठाती-रखती हुई अंततः लिखना शुरू करती हूँ, बहुत कुछ लिखती-काटती हूँ, बहुत कुछ उमड़ता रहा....... अन्दर इतनी हलचल जैसे शांत तालाब में एक छोटे से पत्ते के स्पर्श से उत्पन्न बहुत सी गोल तरंगे जो बहुत दूर तक फ़ैल जाती हैं.... 

देर रात थोड़ा सहज होने पर अब दिन भर के बेख्याली में लिखे हुवे शब्दों पर सरसरी तौर से नज़र डालती हूँ, कितना कुछ लिख दिया था.....विचलित करते ऊब भरे दिन का ज़िक्र, मुस्कान देता पुरानी याद का कोई मीठा टुकड़ा, मित्रों का भरोसा संभालती कई बातें...कहीं-कहीं किसी दिन की चाय के साथ ठहाकों का भी ज़िक्र था, कुछ पंक्तियाँ अति संकोची होती हुई अन्याय के विरुद्ध आवाज ना उठा पाने की घुटन में लिखीं थी तो कुछ किसी के दर्द से द्रवित होकर, कहीं पर आंसुओं से भीगी छटपटाहट भी वर्णित थी तो कहीं चाँद के साथ बीती लम्बी रातों और उस पर लिखी कविताओं का ज़िक्र था......कुछ ज़ज्बाती होकर अपने हिस्से में आये प्रेम पर भी लिख दिया था, कुछ किसी के प्रेम को समझने और समझाने की कश्मकश में......

फिर पहाड़ों की यादें बारिश, धूप, देवदार, बुरांश, हरे दूर-दूर तक फैले बुग्यालों के साथ बिताये कुछ पल भी थे, वहीं बचपन की यादों के साथ कोंलेज के दिनों में हुवे पहले कुछ क्रशों का सहलाता प्यारा स्पर्श भी था...वर्तमान के किस्से और साथ में थे बहुत से डूडल्स और चित्र, अब्स्त्रक्ट से जिनके बीच-बीच में बहुत से प्रश्न चिन्ह भी बने थे..... 
या रब..... क्या था वो जो लिखना चाह रही थी....... सारे अहसासों के साथ उतार देना चाहती थी उस दिन की डायरी के पृष्ठ पर......या फिर दीमाग के खालीपन में.....आने वाले एक प्रसन्न दिन में पढने और याद करने के लिए....यादों में खो जाना आदत जो है मेरी...... 

प्रिय ' कोरैक्स' थकान को मुस्कान से दबाते हुवे शायद तुम्हे याद करते हुवे लिखा ये सब.......सर्दी के बुखार को दूर भगाने की कोशिश में........... 

Wednesday, February 22, 2012

बोलो डेस्डिमोना

यदि 
उस दिन 
प्यार से भरी 
डेस्डिमोना ने 
कुछ बोल दिया होता 
तो उसका मार्मिक अंत नहीं होता 
खामोश रहने की यूँ सज़ा नहीं मिली होती 
उसकी निष्ठा वफादारी और सम्पूर्ण प्रेम 
ओथेलो के शक के तले दब गया 
मासूम मौन भयभीत था 
इंतज़ार में डूबा 
अथाह प्रेम  
खुशी और दर्द का गवाह बना 
अब तो बोलो डेस्डिमोना चुप मत रहो 
चार सौ साल पहले की भूल को आज सुधार लो 
जागो और 
अपने अधिकारों के लिए बोलो
 अपने हित के लिए अपने सम्मान के लिए बोलो 
अपनी जान की कीमत पहचानो अपनी रक्षा करो और 
नई पीढी के लिए विरासत में छोड़ जाओ 
स्वाभिमान से सर ऊंचा रखती 
एक नई डेस्डिमोना

Thursday, February 2, 2012

दोहरी ज़िंदगी

उन्मुक्त होने की चाह में विचलित हो जाती हूँ
उस घेरे से जो तुम खींच देते हो 
मेरे चारों तरफ 
अनजाने में 
तब 
खोलती हूँ मैं
घबरा कर उस खिड़की को 
जो उस पेड़ की तरफ खुलती है
जिसके घोसले में चुगा रही होतीं हैं चिड़िया 
अपने डैनों में छिपाकर अपने नन्हे बच्चों को दाना 

Monday, January 23, 2012

'संस्कार' ने मनाया सरस्वती पर्व

डॉ हेम भटनागर जानकी देवी महाविद्यालय की सेवानिवृत प्रधानाचार्या रही हैं, उन्होंने १९८१ में हिन्दी को बढ़ावा देती 'संस्कार' नामक स्वैच्छिक संस्था की नीव रखी, कई पुस्तकों की लेखिका व वृषभदेव पुरस्कार, निष्काम सेवी पुरस्कार, बाल और किशोर साहित्य सम्मान और हिन्दी के क्षेत्र में विशेष योगदान के अनेकों पुरस्कार इनके हिस्से में हैं...८४ वर्ष की अवस्था में आज भी उतनी ही सक्रीय हैं....उनका कथन है- 
 "हर दिन उत्सव का दिन है, एक- एक दिन आनंदमय जीते-जीते पूरा जीवन ही उत्सव सा जिया जाता है"
22 जनवरी रविवार को संस्कार'  की सभा अनुभव आनंद ने सरस्वती पर्व मनाया......ठंडे दिन के बावजूद भी बहुत से उत्साही मित्रों की उपस्थिति बनी रही.....इस बार सभा का आयोजन अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर के घर पर ही किया गया.....
 स्वागत और परिचय के बाद शुरू हुआ सरस्वती पूजन और बसंत के मधुर गीत, जो अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर द्वारा लिखे और लयबद्ध किये गये थे........उन्हें मधुर स्वर दिया, संगीत साधिका श्रीमती प्रमिला भटनागर, अनिता चुघ, श्रीमती मधुलिका अग्रवाल व अन्य सभी साथियों ने...........

 यहाँ पर उम्र का अंतर नहीं होता संस्कार का यही एक ज़ज्बा मुझे बेहद आकर्षित करता है....सभी मस्ती में, मिल- जुल कर गाते और खुशियाँ बिखेरते हैं.......
 संगीतमय सफ़र के बाद संस्कार सचिव श्रीमती मधुलिका अग्रवाल के द्वारा संस्कार की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई.....बीते माह और संस्कार गोष्ठियों का लेखा जोखा........उसके बाद संस्कार अध्यक्षा डॉ हेम भटनागर ने की कुछ बात मित्रों से.......इस बार गोष्ठी का विषय था ' काव्यमयी,पौराणिक या साहित्यिक अपने परिचित फूलों की कहानियां' 
 सभा को आगे बढ़ाते हुवे फिर कुछ सदस्यों द्वारा बसन्ती सुगंध लिए कविता पाठ, फूलों पर लघु कहानियां और आलेख प्रस्तुत किये गये......श्रीमती मीना जैन ( उपाध्यक्षा संस्कार और कई पुस्तकों की रचयिता), श्रीमती इंदु जैन, श्रीमती कौसल्या गुप्ता (सेवानिवृत प्रोफ़ेसर मिरांडा हाउस ), श्रीमती अनुराधा गुप्ता( समाज सेविका), कई पुस्तकों के लेखक व लेखिकाएं श्री धर्मप्रकाश जैन, जनक वैद, श्रीमती विभा जोशी ( बाल भारती प्रकाशन),  सचिव मधुलिका अग्रवाल ( बाल एवं किशोर साहित्य के लिए पुरस्कृत) अंशु जैन, इंदु जैन, प्रकाश जी और श्री अर्जुन पांचोली आदि सदस्यों ने भी अपने विचार रखे......
 अंत में सभी ने स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया....... 
सभा के साथ ही पुस्तक प्रदर्शनी भी लगी थी, संस्कार की चतुर्मासी पत्रिका 'कलरव'  संस्कार का वार्षिक केलेंडर ' बारामासा',  बाल लेखन और व्यस्क लेखकों द्वारा रचित पुस्तकें भी यहाँ पर उपलब्ध थीं.........

बसंत की आहट पहचानती बसन्ती बयार सी सुगन्धित,  आपसी मेल- जोल, लेखन और ज्ञान को बढ़ावा देती 'अनुभव आनंद' की ये सभा सरस्वती जी का आशीर्वाद लेती फिर मिलने तक संपन्न हुई............

Monday, January 16, 2012

सूकून देता निश्चल प्रेम


उस दिन रात बहुत देर तक क्या लिख रही थी नहीं मालूम, किशोर के नगमे भी कुछ देर तक दिल बहलाते रहे फिर कब आँख लग गई ये भी नहीं मालूम.....शायद आधी रात बीत चुकी थी.....नीचे दरवाजे पर किसी के रोने, किकियाने की आवाज़ से आँख खुली, ओस से भीगी बहुत ही ठंडी रात थी रजाई का मोह छोड़ पाना जरा मुश्किल लग रहा था...तभी फिर से वो कराह सुनाई देती है जल्दी से लाईट जलाती हूँ घड़ी ३.३० दिखा रही थी नीचे उतर कर दरवाजा खोलती हूँ एक मासूम छोटा सा कुत्ते का बच्चा था अपनी पूंछ को समेटे कोने में पड़े पायदान पर अपने ही शरीर में गर्मी तलाशता कशमशा रहा था............ 


नज़र उठा कर अपनी मासूम और बहुत ही प्यारी आँखों से अब मुझे देखने लगा फिर धीरे से उठा, छोटी सी पूंछ को हिलाता मेरे पैरों पर आकर बैठने लगा....ये कैसा प्रेम हुआ....उसने मुझे पहले कभी देखा नहीं, मैंने उसे खाने को कुछ दिया नहीं....अभी तक तो सहलाया भी नहीं......फिर भी वो इतना प्रेम क्यूँ दिखा रहा है, सोचती हुई उसके पास बैठ कर अब उसे सहलाती हूँ........करुणामयी, स्नेहिल आँखों से यदा-कदा उसे अपनी और देखते हुए मुझे उस पर ढेरों प्यार आने लगा, उसके निश्चल प्रेम से अब मैं भी अच्छा महसूस करने लगी..........

दया और स्नेहवश उसे उठाकर अन्दर लाती हूँ, हीटर के पास कालीन पर रख देती हूँ, रसोई से गर्म करके थोड़ा दूध और ब्रेड लाकर उसे देती हूँ.....झट-पट खुशी से पूंछ हिलाता वो खाने में मशगूल हो जाता है पेट भर जाने पर आधा खाना वही छोड़ वो गिरता हुआ सा फिर से मेरे पैरों की गर्माहट पर ही बैठ जाता है और थोड़ी ही देर में नींद उसे बदहाल कर देती है......अपने सर को दोनों पैरों के बीच दबाकर वो सो जाता है.....

उसकी सहूलीयत के लिए धीरे से अपना पैर उसके नीचे से बाहर खींचतीं हूँ......वो सरकता, रेंगता हुआ फिर से मेरे पैर पर की गर्मी पर ही सर रख कर चैन से सो जाता है, खुशी और आपार स्नेह से अब आँखों में नमी महसूस करती हूँ.........उमड़ती ममता के साथ उस मासूम से जीव को सहला देती हूँ.... फिर मुझे ओस से भीगी, पूस की ठंडी, स्याह, वीरान रात से कोई शिकायत नहीं हुई.........

सिमोन दि बोवुआर की " एक गुमशुदा औरत की डायरी" पढ़ते हुवे सोचती हूँ निश्चल प्रेम करना इंसानी फितरत में क्यूँ नहीं होता.....अब बची हुई रात के उस हिस्से में प्रेम को परिभाषित करने लगती हूँ......कई अनुभव, रिश्ते, यादें, बातें सब टटोलती हूँ.....कुछ भी ऐसा नहीं मिलता जहाँ पर जाकर रात ठहर जाती......बनते-बिगड़ते कई रिश्ते, दुनियादारी, समाज.......दूर-दूर तक जाकर भी यादें खाली हाथ ही लौट आती हैं......
झूठी खुशियों के लिए ही सही रिश्तों का भ्रम बना रहना चाहिए जीवन का सफ़र थोड़ा आसान तो हो ही जाता है.......

Wednesday, January 11, 2012

अपने आप में खो जाना कितनी आनंद की बात है


सारी दुनिया से बेखबर धूल मिट्टी में खेलता 
वो कोमल गुलाबी फ़रिश्ता सा बच्चा 
चेहरे पर अखंड हंसी चिपकाये 
कपड़ों की सुध ना तन की
भूख प्यास से बेखबर 
 घंटों खेलता 
मिट्टी खाता खिलखिलाता किलकारियां भरता 
परिचारिका उसे निहारती धन्य हो जाती 
शाम ढले माँ काम से वापस आती 
बच्चे का ध्यान ना रखने पर 
परिचारिका को कोसती 
ताने देती 
फिर 
नहाया सजाया 
राजकुमार सा बच्चा 
अब मखमली कालीन पर बैठता 
बन्धनों में जकड़ा खुली हवा को तरसता 
रंगों को ढूढता
सहमा उदास बच्चा रोता है 
परिचारिका की आँखें भी नम हैं 
उस मासूम की मुस्कान छिन जाने पर
अब दोनों खेलते हैं कुछ किलकारी रहित खेल 

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