"Prayer is not only talking to God,it is also listening while He speaks to us "
आज प्रात से ही मन अलग ही तरह की सुन्दरता गढ़ रहा था, तय हुआ था की आज का दिन धारचूला में स्थित नारायण स्वामी आश्रम में बिताना था बहुत समय पहले से ही ये नाम सुना हुआ था तीव्र इच्छा के रहते आज दर्शन होने थे...
प्रात ८ बजे ही वहां के लिए प्रस्थान किया धारचूला के तपोवन नामक स्थान से ये करीब ६५ किमी दूर सोसा गावं की भूमि पर नारायण स्वामी के मार्गदर्शन में १९३५ ( तब वो २६ - २७ वर्ष के थे ) से बनना शुरू हुआ था और १९४० में बनकर तैयार हुआ .
मनोरम छटा बिखेरते सर्पिलाकार रास्तों से ऊपर चढ़ते जाना बेहद आनंददायक रहा जगह -जगह जीवन का संकेत देते निर्झर, स्वच्छ झरने और चारों तरफ फ़ैली हरीतिमा ..
चीड़, बांज, देवदार और उनके बीच खिलते हुवे लाल सुर्ख बुरांश ......उस पर चारों तरफ फैली चीड़ और जंगली फूलों की सुगंध .प्रकृती अपना सारा खज़ाना खोल कर लुटाने को तैयार..
लगभग १० बजे के आसपास ऊपर आश्रम पहुँच गए
मानो शिव के धाम आ गए, वातावरण में उर्जा का संचार इतना तीव्र था की आँखों और शरीर में झूम सी महसूस होने लगी नारायण स्वामी को कई जगहों तपस्या करने व भटकने के बाद १९३५ में यहाँ आकर शांति मिली, .वो कर्नाटक के रहने वाले थे व उच्च शिक्षित भी थे नारायण स्वामी कीर्तन करते करते ही घंटों भाव समाधी में चले जाते थे ...
उन्हें कई तरह के साज़ बजाने आते थे ..आज भी उनके करताल,गिटार,मेंडोलिन आदि उधर रखे हुवे हैं
जब भक्तों की संख्या बहुत बढ़ जाती थी तब गहन ध्यान करने वो शून्य कुटीर में आ जाते थे
ये गुम्बदनुमा छत ( Gothic Architecture ) लिए हुवे बना है और इसके चारों तरफ से घने जंगल व दूर हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ दिखतीं हैं
.इसके अन्दर उनके वस्त्र, खडाऊं ,कमंडल,झोला आदि कुछ सामान आज भी सुरक्षित है, उनके कुछ भाव मुझे बहुत ही आकर्षित करते हैं ....तर्क एवं व्याख्यानबाजी से दूर रहकर वे कहते थे - " दस अच्छी बातें कहने से एक अच्छा सेवा का काम कर दिखाना ज्यादा अच्छा है / जाति - पाति का भेदभाव ना रखते हुवे प्राणी मात्र से स्नेह हो / Trust is the name which gradually deepens into Divine love / Where faith is missing, life looses all its zest "
ऐसे उत्तम विचारों के धनी नारायण स्वामी हर किसी को नारायण के ही संबोधन से बुलाते थे...शायद सभी एक ही ईश्वर से उत्पन्न हैं .. सोच का आधार यही रहा हो ९ नवम्बर १९५६ को (४८ वर्ष के अवस्था में ) वो ब्रम्हलीन हुवे
ऊपर जाते ही सर्वप्रथम मुलाकात एक सौम्य महिला सुश्री द्रोपदी गर्बियाल( सेवानिवृत प्रधानाचार्या एवं ट्रस्टी ) से हुई . अब उन्होंने अपना जीवन यहाँ से मानव सेवा को समर्पित किया हुआ है उन्हें देख कर थोड़ा चोंकी थी मैं, वो चेहरा, वो आवाज़ वो स्वरूप बहुत करीब से देखा हुआ मालूम हुआ कुछ बीती, भूली यादें समेटने लगी फिर उनसे आश्रम की जानकारी लेते हुवे ही मालूम हुआ सुश्री गंगोत्री गर्बियाल सेवानिवृत प्रधानाचार्या व १९९९ तक आश्रम में अवैतनिक व्यवस्थापक एवं ट्रस्टी थीं.
अब इस नाम के साथ आपना जो सम्बन्ध था याद हो उठा....... जब मैं रानीखेत में कक्षा ६ -७ में थी तब वहाँ पर सुश्री गंगोत्री हमारी प्रधानाचार्या थीं. मुझे आज भी उनकी याद है बहुत ही व्यवस्थित शख्त मिजाज़, सधी हुई कड़क आवाज जो बिना माइक के भी दूर तक पहुँच जाती थी ..समय की पाबंदी एवं अनुसाशन उनका मूल मन्त्र था ...
यदा कदा मोनीटेर्स मीट में अपनी अपनी कक्षाओं की रिपोर्ट से उन्हें अवगत कराना होता था कक्षा मोनीटर होने से मुझे भी उन्हें करीब से जानने के कुछ अवसर मिले ...स्मृति में उनके कहे चंद शब्द उभर आये..... " तुम लड़की थोड़ा और बोला करो ..इस उम्र में इतनी चुप्पी अच्छी नहीं होती ..." सोचती हूँ आज मिली होती तो .......?:) याद आते ही चेहरे पर मुस्कान सज जाती है .....कुछ पल अचानक ज़िंदगी में कितने महत्वपूर्ण होकर हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं, यहाँ कुछ वर्ष पहले आती ( १९९९ में ८२ वर्ष की अवस्था में उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया ) तो उनसे मेरी मुलाकात जरुर हो जाती .....
संतों का साथ भी हर किसी के भाग्य में कहाँ ...कहते हैं ना ...' बिनु हरिकृपा मिले नहीं संता ' महान लोगों की इस भूमी में असीम सुख, आनंद व उर्जा से साक्षात्कार हुआ, द्रोपदी जी को ८० वर्ष की अवस्था में भी अति स्वास्थ्य और सामर्थ्यवान देख कर योग,प्राणायाम,सेवा भाव,व संतों के आशीर्वाद की शक्ती पर आश्चर्य मगर विश्वास भी होता है
यहाँ पर अक्सर ज्ञान सिविर भी होते रहते हैं ( हिंदी, गुजराती व इंग्लिश में ) ...व १९८१ से कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्री भी यहाँ दर्शन करने आते हैं ....नारायण स्वामी ने स्वयं भी ( १९३६ - १९५४ के दौरान ) १३ बार कैलाश मानसरोवर यात्रा की थी .
उन्ही से नारायण स्वामी के जीवन के बारे में और जानकारी हासिल की .....पूरे आश्रम परिसर को देखने व समझने के बाद स्वादिष्ट भोजन की व्यस्था थी ....प्रसाद स्वरूप उनकी ही लिखी हुई पुस्तक ' परम पूज्य श्री नारायण स्वामी एवं श्री नारायण आश्रम ' भेंट स्वरुप मिली ...सुन्दर, मीठी बातें, मुलाकातें, यादें व संतो की पावन भूमी से अभिभूत होते, भौतिक दुनिया में वापस आना मन को भा नहीं रहा था..................
