Friday, September 25, 2026

कुछ अनकहा सा


बात कहीं से भी शुरू करो, कितनी बड़ी भूमिका बांधो किंतु बातों के मर्म को समझना जरूरी है।" उसने कहा।  

"ठीक बात" वह उत्तर हमेशा नपे-तुले शब्दों में देता है। 

"और" 

"और क्या?"  

"कुछ नहीं। जाने दो। कुछ तो इंसान अपने लिए भी रखे, अनकहा, अनसॉल्वड सा।"
 
"मतलब?"

"वही अनकहा जो कहीं उलझा हुआ होता है भीतर। कसकता हुआ संवेदनाओं को जन्म देता है। नई कहानियों का जन्म ऐसे ही होता है।"

"हो गया? और कुछ?" दोनों की हंसी से पार्क का वह कोना महक उठा।