कई वर्ष पूर्व जब से उत्तराखंड के गंगोलीहाट (जिला पिथोरागढ़) में स्थित इस पाताल भुवनेश्वर की रहस्यमई गुफा के बारे में डिस्कवरी और फिर आज तक टी वी में देखा था तब से धरती से ९० फीट और समुद्र तल से १३५० मीटर पर बनी इस महादेव जी की रहस्यमई नगरी के दर्शन करने की तीव्र इच्छा थी.......
यहाँ इन रास्तों द्वारा सुगमता से पहुंचा जा सकता है :-
१- हल्द्वानी से २१० किलोमीटर वाया..अल्मोड़ा - वन्या - पनार - गंगोलीहाट
२ - टनकपुर रेलवे स्टेशन से १८४ किलोमीटर वाया - चम्पावत - घाट - गंगोलीहाट
पर्वतों, चीड़, देवदार व पहाडी नदियों से घिरा सुरम्य स्थान......देवदार से घिरा नैसर्गिक सोंदर्य का खजाना
एक प्रशिक्षित गाइड का साथ मार्ग प्रशस्त करता रहा, इस गुफा में प्रवेश करने से पूर्व ही जूते, कैमरे, व अन्य सामान को बाहर ही जमा करा देना होता है
अति संकीर्ण मुहाने से उबाड़-खाबड़ लगभग चिकने हो चुके पत्थरों से और छोटी-छोटी ८२ सीढ़ियों से सीधे धरती में ९२ फीट नीचे पहुँचना है.....अब अन्दर लाईट के प्रकाश की पूरी व्यस्था है, प्राकृतिक आक्सीजन की भी कहीं कोई कमी नहीं, शरीर का संतुलन बनाये रखने के लिए लोहे की मोटी जंजीर लगी हुई हैं वापस भी इसी रास्ते से आना होता है .......शरीर को सिकोड़कर, पैर मजबूती के साथ टिका कर अति नीचे झुक कर ही जाना संभव है.......सभी को झुका कर नत मस्तक करा देता वो भाव कुछ ऐसा है जैसे अपने सभी अहंकारों को बाहर द्वार पर ही छोड़ कर आयें, तभी दिव्य लोक की महिमा समझ पाएंगे
नीचे उतरते ही अब एक समतल पर खड़े हैं सजीव सी सरंचनाओं से युक्त एक अद्भुत संसार.......अब यहाँ से सीधे खड़े होकर पूरी गुफा में भ्रमण कर सकते हैं......जगह- जगह पानी के रिसाव से भूमी थोड़ा नम बनी हुई है....
इस प्राकृतिक गुफा की खोज आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी भीतर ताम्रपत्र से सुशुभित एक त्रिलिंगी ( ब्रह्मा, विष्णु, शंकर जिसमें ऊपर बनी जटा से बूंद-बूंद करके तीनो लिंगों का रुद्राभिषेक होता है ) शिवशक्ती को उन्होंने अपनी कैलाश यात्रा के दौरान स्थापित किया था......तभी से कैलाश यात्रियों का दल यहाँ के दर्शन जरूर करता है........
संक्षेप में वर्णित करती हूँ....( आप उपर्युक्त वीडिओ भी जरूर देखें ) सबसे पहले ही बड़ा सा फन फैलाये शेषनाग बना है..........कहते हैं इसने अपने फन पर सारी पृथ्वी को धारण कर रखा है लगभग १६० मीटर लम्बी इस गुफा में आकृतियॉ इतनी सजीव हैं की आश्चर्य होता है.....आप यदि जरा भी भक्ति भाव रखतें हैं तो यहाँ की शक्ती को जरूर महसूस कर पाएंगे
यहीं भीतर केदारनाथ, बद्रीनाथ ओर अमरनाथ के भी दर्शन होते हैं...पुराणों में भी इसका उल्लेख है की विश्व में पातळ भुवनेश्वर के अलावा कोई ऐसा स्थान नहीं जहाँ चारों धामों के एकसाथ दर्शन होतें हैं ,स्कन्द पुराण के मानस खंड के १०३ अध्याय से भी पातळ भुवनेश्वर की महिमा का वर्णन पढ़ सकते हैं
कई रहस्यों से घिरी मैं सोचती रही.......इतनी प्राकृतिक आपदाओं के होते हुवे, नदियाँ व पहाड़ अपने रास्तों से विचलित होकर खिसक गये मगर यहाँ इतने वर्षों में भी ऐसा क्या था जो सभी संरचनाएं पूर्ववत बनी हुई हैं, जैसे आदि गणेश के धड़ भाग पर ठीक बीच में मेरुरज्जु के स्थान पर ही कैसे ऊपर ब्रम्ह कमल से अमृत टपकता है, भीतर शिवशक्ती में त्रिलिंगों पर बूंद -बूंद जल ठीक उनके ऊपर ही रुद्राभिषेक कैसे करता है, कैसे इस गुफा में किसी भी तरह के जीव-जंतु नहीं हैं, क्यूँ जहाँ पर शिव की जटायें हैं लगातार जल के बहने से भी वहाँ पर काई की चिकनाई नहीं है, जहाँ एरावत हाथी के पैर व शरीर बना है वहाँ पर के पत्थर हाथी की त्वचा जैसे ही कैसे हैं, ब्रम्ह्कपाली पर कैसे ठीक ब्रम्हा जी के कपाल वाले स्थान पर ही टपकते जल से उनका तर्पण हो रहा है, कैसे यहाँ पर तर्पण करने से इन्सान मोक्ष को प्राप्त हो जाता है, इसी तरह के कई सवालों से घिरी आज भी उन रहस्यों व आलोकिक अहसासों को याद करके महसूस करती मैं रोमांचित हो उठती हूँ.................

