Wednesday, February 8, 2017

एक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुँचती है


"कभी लगता है इंसान की खानाबदोश फितरत ही अच्छी थी। शानदार, जीवंत। हर सुबह नयी, हर शाम नयी। नया देखते रहो, नया सीखते रहो "

"नॉट एट ऑल, बिलकुल भी नहीं। एक जगह टिक कर अपनी आने वाली पीढी के बेहतर भविष्य के लिए सुख -सुविधाएँ जोड़ने में कोई बुराई नहीं है "

" बुराई ही तो है.. इन्ही भौतिक सुख -सुविधाओं को जोड़ने में उम्र तमाम हो जाती है। हमारे न रहने पर क्या होगा ? कैसे होगा का भाव हमेशा माथे पर सिलवटें बुनता रहता है। खामख्वाह की व्यस्तता और चिंताएं बोनस में " 

" तो ?? सभी करते हैं, करनी भी चाहिए। " 

"नहीं करनी चहिये। बिलकुल नहीं.. इस आसक्ति से मुक्ति मिल सकती है बशर्ते हम किसी एक जगह पर जमे न रह जाएँ। "

" बेकार की बात। अपनी जड़ें होनी ही चाहिए। तुम अजीज क्यों नहीं आती हो ऐसी बेवकूफी भरी वाहियात बातों से ?"

"अरे..बात समझो। फिर पीछे क्या छूट जायेगा ? उन सुविधाओं को कौन बरतेगा ? कैसे ? जैसे भावों से मुक्ति मिल जाएगी। क्या मस्त स्वछन्द जिंदगी होगी....नहीं क्या ? "

"ख़ाक होगा। पागलों के सर पर सींग थोड़े ही होते हैं। तुम्हारे जैसे लोग ही होते हैं- पागल। कतई पागल....."

"मुझे ये संबोधन मंज़ूर है लेकिन मैं अपने भाव नहीं बदल सकती। कतई नहीं...." 


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