Friday, December 9, 2016

रुक जाना नहीं तू कहीं हार के


' फिर वही, आज लड़के ने आत्महत्या कर ली...लड़की ने आत्महत्या...प्रेमियों ने आत्महत्या...दहेज़ लोभियों से मुक्ति पाने के लिए आत्महत्या, प्रताड़ित होने पर, शर्मिंदा होने पर, फेल हो जाने के डर से...सब जगह अफरातफरी। बेकार, कबाड़ अखबार। रद्दी बिकने के काबिल भी नहीं होते ये अखबार....'

' अब तुझे क्या हुआ ? भोरे -भोरे ?'

' अरे दुनिया में यही एक खबर है क्या? कितना कुछ अच्छा भी तो हो रहा होगा। नकारे लोग, नकारात्मकता फैलाने चले आते हैं।'

'तू बकबका ले कुछ देर, फिर बताना बात क्या हुयी, नाश्ते में मिर्ची के परांठे खा कर आई है क्या ?'

'तू जानता है उन आत्महत्या करने वालों को ? मैं भी नहीं जानती। फिर क्या करना हुआ ये पढ़कर? मुझे इन आत्महत्या करने वालों से कतई सहानुभूति नहीं होती। बिलकुल नहीं।'

'हाव मीन , हाव् इनह्यूमन....इनसेंसिटिव.... हाव.....'

'बोल - बोल रुक क्यों गया...? देख....जब हमारा खाने को मन करता है हम खा लेते हैं, सोने का मन किया सो लिए। घूमने जाना, फिल्म देखना, कॉफी पीना, पढ़ना, कॉलेज बंक करना....जो हमारा मन करता है हम करते हैं। हम अपनी मर्ज़ी के मालिक....होते हैं कि नहीं....बता तो ?'

' हाँ बरोबर....तो कहना क्या चाहती है विद्वान् ? '

'वही तो....जिसका जीने का मन है वो जिए जिसका मरने का मन है वो मरे.... इसमें हो हल्ला करने का क्या औचित्य? सिम्पल... ' 

' व्हाट सिंपल ? इतना सिंपल भी नहीं है ये।'

' है न ...क्वाईट सिंपल...समझ...दिक्कतें सभी की ज़िंदगी में होती हैं न। अब जिसको जीने का सलीका नहीं आया, जो जीवन के संघर्षों के आगे धराशायी हो गए, जिसने कष्टों के आगे घुटने टेक दिए, जिन्हें परेशानियों से कुश्ती करना नहीं आया, जो ज़िंदगी की कठिन लहरों से जूझते हुए संभलना नहीं सीख सके....उसने क्या ख़ाक जिया।' 

' तू और तेरा फलसफा....तेरे प्रवचन। '

' डार्विन बाबा का फ़लसफ़ा...survival of the fittest '

' धन्य हो गया मैं तुम्हारे सानिध्य में रह कर, देवी....'

' ठीक हो गया फिर। अगला प्रवचन..फिर कभी....'


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