Monday, October 3, 2016

ये किसने गीत छेड़ा


कितना मुश्किल हो रहा है आजकल कुछ भी लिख पाना। न शब्द हैं, न भाव और ना ही संवेदनाएं, हमेशा से अति प्रिय लगने वाला एकांत अच्छा नहीं लग रहा है। कुछ बेआवाज बातें और यादें बनी रहतीं हैं, मेरे इर्द -गिर्द...अज़ीब है सब...या रब ये कशमकश और उलझन का कैसा दौर है। 

लगता है समय आ गया है। दिल्ली से बाहर कहीं घूम आऊं। अपने पहाड़ों की तरफ। मेरे पहाड़, मेरे झरने, मेरी नदियां और मेरे अहसास। वहां की वादियों में मचलती ठंडी, शीतल हवाएं, चिड़ियों की चह चह से सजी खुशनुमा सुबह, हिमाच्छादित पर्वतों पर, टुकड़ों में बिखरी हुयी स्वर्णिम धूप और अब शरद ऋतु को आमंत्रित करता हुआ मौसम। 

सब यादों में है। बेइंतहा दिलफरेब यादें। वो जंगल की तरफ खुलती मेरे कमरे की खिड़की। उससे झांकता सुर्ख लाल बुरांश के फूलों से लदा हुआ पेड़। आंगन में नन्ही गिलहरियों की उछल -कूद , बगीचे में चिड़ियों का चिचियाता शोर, फूलों की मह -मह खुश्बू और रात को उसी खिड़की से झांकता हुआ चाँद। सब कुछ मनभावन। इससे सुंदर भला और क्या होगा। 

आती हूँ मेरे प्रिय पहाड़ों तुम्हारे गीत सुनने। तुम्हारा सानिध्य मुझे सुकून देता है, स्नेह देता है और प्रेम से भर देता है। तब सारी कायनात मुझे बेहद खूबसूरत लगने लगती है। नयी ऊर्जा और हौसलों से भर देती है... 


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