Sunday, September 18, 2016

खामोश सा अफ़साना


कभी -कभी बेहद अनिश्तिता की स्तिथी बन जाती है। कभी लगता है खूब बोलना -बतियाना चाहिए। पूर्वतः भीड़ में शिरकत करते हुए लोगों से मिलना जुलना, गोष्ठियाँ, थियेटर, फिल्म, आवारगी आदि सभी कुछ बिंदास करना। मित्रों, रिश्तेदारों के बुलावों और आमन्त्रण को स्वीकार करते हुए देर शाम घर पहुंचना। वो भी ठीक ही था। सोचकर उत्त्साहित भी हो जाती हूँ। 

फिर अगले पल विचार बदलते देर नहीं लगती। क्यों करना चाहिए ये सब ? ऐसा करके क्या तो निराला हुआ और अब क्या निराला होगा ? चुपचाप शांति से जीवन जीने में भी कोई बुराई नहीं लगती। घर - बाहर के अपने रोज के काम करना। फ्री होते ही फिर मन और दिल की करना। इससे बढ़ कर कोई आनंद नहीं। 

ज्यादा मिचमिच और चकर -चकर किये बगैर भी बढ़िया चल रहा है। वक्त वैसे ही काम पड़ा रहता है फिर काहे के झमेले पालना। शायद इसी को आनुवांशिकता कहते होंगे। मेरी अति अल्पभाषी माँ महीने के तीस दिन में मुश्किल से तीस वाक्य बोलतीं होंगी। सोचती हूँ इससे उनका क्या बिगड़ा ? लोग उन्हें खूब चाहते हैं, खूब आदर -मान देते हैं। मुझे मेरी माँ दुनिया की सबसे खूबसूरत, सबसे सुखी और सुकून से भरी हुयी लगतीं हैं। हर परिस्थिती में मुस्काती हुयी। उन्हें ज़िंदगी से न कभी कोई शिकायत थी, न होगी। उनसे अक्सर कह देतीं हूँ। 

"माँ यार आई लव यू...खूब.....एंड मिस यू.... खूब। " इसके एवज में माँ मेरा हाथ थाम कर अपनी मासूम और प्यारी सी मुस्कान थमा देतीं हैं। हम सभी से स्नेह तो वे भी बेइंतहा करतीं हैं बस ऐसा कुछ कहतीं नहीं हैं। 

"अपने शब्दों को बचा के रखने का तुम्हारा शौक बहुत पुराना है, जानती हूँ यार माँ..."


Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...