Monday, April 11, 2016

ये जो ज़िंदगी की किताब है


पढ़ी हुई कहानियों का किस कदर दिलो -दिमाग पर असर होता है यह ठीक से मैंने अब जाना। मुझे लगता है कहानी लिखने के लिए क्या सोचना और क्या खोजना ? कहीं कोई एक मुस्कराता हुआ लम्हा मिल जाये, कोई टीसता पल दुखा जाये, रुमानियत से भरा एक झोंका सिहरा जाये, कसक शून्यता से भर दे, घटना जो दिल पर दस्तक दे जाये, प्रेम वश, दया वश, ह्रदय संवेदनाओं से भर जाये, किसी मोड़ पर हुई एक अज़नबी मुलाकात, किसी से साझे किये हुए चंद अल्फाज़ यहाँ तक की किसी अनजान को घूर कर उसका भीतर -बाहर का पोस्टमार्टम करते हुए। इसी तरह जीवन का कोई भी एक सिरा पकड़ में आ जाये तो वहीं मेरी नई कहानी सर उठा लेती है। 

सम्बोधन पत्रिका के स्वर्ण जयन्ती वर्ष के - प्रेम कथा अंक में प्रकाशित कहानी 'सरल समर्पण' का स्वरूप नैनीताल भवाली जाते समय कुछ ऐसे ही बन गया था। कहाँ की हिमंती और कहाँ के डॉक्टर द्रोण, बद्री काका जैसे भी कोई मिल गए थे। यह कहानी मेरे दूसरे कहानी संग्रह 'अन्जान राहें तन्हा सफ़र' के शीर्षक वाली यही कहानी है। 

अब तक अन्य प्रकाशित कहानियों की मिली -जुली प्रतिक्रियाएँ आतीं थीं, इसलिए गौर करने जैसा कुछ था नहीं। अब मुद्दा यह है कि इस कहानी के 'सम्बोधन' में प्रकाशन के बाद से अब तक ग्यारह फोन आ चुके हैं। गलती से वहां पर मेल आईडी प्रकाशित होने से रह गया। केवल शान से मेरा मोबाइल नंबर सजा रह गया। विद्या जी एकमात्र महिला हैं जिन्होंने स्नेह से कहा। "बेटा...तुम्हारी खूबसूरत कहानी ने बहुत संवेदित और भावुक कर दिया। खूब लिखो.... " अन्य सभी फोन डॉ द्रोण के थे। डॉ द्रोण से मेरा मतलब....उनकी उम्र से है। सभी पाठक की हैसियत से फोन करने वाले डॉ द्रोण अपने जीवन की लगभग षष्ठी पूर्ति के आसपास के व्यक्ति थे। ( मेरी कहानी के प्रोफ़ेसर, डॉक्टर द्रोण भी पचास की वयस के हैं ) 

हर उम्र के लिए लिखना चाहिए। हर उम्र के अलग रंग, अनुभव और चाहनाएं होतीं हैं। मुझे लगता है सेवानिवृत होने के बाद इंसान को यदि समय बिताने के लिए कुछ अर्थपूर्ण न मिले तो वे भावुक जैसे, एकाकी जैसे, बोर जैसे और क्यूट जैसे कुछ होने लगते है। सभी हिमंती के साथ-साथ उसके अकेलेपन, उदासी और पीड़ा से पीड़ित और संवेदित होते दिखे। एक फोन पर बताया कि उन्हें यह कहानी इतनी पसंद आई कि उन्होंने अपने दस मित्रों को बकायदा फोटोकॉपी करके पढ़वा दी। कमाल के सज्जन व्यक्ति। मैंने भी उनसे वादा किया कुछ उसी उम्र के नायक पर जल्द ही एक और कहानी लिखूंगी। 

औरत के भीतर के मौसम को समझना इतना आसान नहीं। इसलिए मैंने अपने डॉक्टर द्रोण को दिल की गहराइयों से गढ़ा। वे अपने प्रेम को बड़ी शिद्दत और धैर्य से कहानी की नायिका हिमंती से छिपे-दबे तरीके से प्रदर्शित करते हैं। औरों की तरह मुझे भी अपने इन डॉक्टर द्रोण से बेपनाह महोब्बत है। मैं भी न खुश जल्द हो जाती हूँ.....खामख्वाह..... 

अब सवाल यह है कि इस बार नौजवानों के फोन नहीं आए। एक भी नहीं। उनको इस कहानी में दिलचस्पी क्यों नहीं हुई होगी ? क्या इसीलिए कि मैंने अपने नौजवान अफ़सर, आदित्य को उसकी किशोरावस्था में और रुमानियत के दिनों में ही शहीद कर दिया था। जुलम....या रब ये मुझसे क्या हो गया ? ये मैंने क्या कर दिया ? 

अगली कहानी अपने नौजवान पाठकों के लिए....कसक और टीस से भीगी हुई, इश्क़ और रुमानियत से सराबोर। ठीक हो गया फिर....वादा रहा। 



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