Wednesday, March 9, 2016

मैं जो बोलूं हाँ तो हाँ


मैं इस शहर से बाहर घूमने जाना चाहती हूँ। ले चलोगे ? 

चलो....कहाँ जाना चाहोगी ? 

तुम्हारा शहर है, जहाँ भी ले चलो। 

अच्छा तो जंगल की तरफ चलते हैं। 

हट्टो.....वहां कौन जाएगा, वहां कुछ खाने को भी नहीं मिलता। 

चलो न...हवा खाएंगे और हाथ में हाथ थाम कर गीत गुनगुनाएंगे। 

हद है.....तुम्हें भूख नहीं लगती ?

आशिकों को भूख नहीं लगती। 

ठीक है आशिक महोदय, नहीं खाएंगे चलेगा। कुछ पीने को तो मिल ही जाएगा ?

बिलकुल भी नहीं। 

क्यों ? 

आशिकों को प्यास भी नहीं लगती। 

फिर अकेले जाओ और बिना खाए -पिए अपनी आशिकी के गीत गुनगुनाओ। 

अरे.....बड़ी अजीब हो तुम। 

ओए.....ऐसे बोलोगे तो मैं तुम्हें चिरकुट टाइप आशिक कह दूंगी...

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