Tuesday, December 22, 2015

दीवारों से मिल कर बातें करना अच्छा लगता है


'तुम मेरी सबसे बड़े दुश्मन हो। ये बात जानती हो न ?'

'हाहा...जानती हूँ।'  

'क्या हाहा....? हर बात का यही एक जवाब होता है तुम्हारे पास। इसका मतलब होता है, बस.... फुल स्टॉप। अपनी फालतू की बातों को विराम दो। यही न?'

'अरे नहीं.....ऐसा बिलकुल भी नहीं है।' 

'तो कैसा है?'

'हम इतने लम्बे अरसे से साथ हैं, अब तो मेरे दिल के अंदर की बातों को समझना सीख लो।' 

'नहीं सीखना। तुम सीखो....सीधी बात करना। बल्कि तुम बातें करना ही सीख लो। बोलना नहीं आया तो.....हाहा कर दिया।' 

'हाहा...ये भी ठीक है।'   

'खाक ठीक है....फिर वही हाहा....हर बार सोचता हूँ अब नहीं। बहुत हो गया। तुमसे बोलने से अच्छा है कोई दीवार से बातें कर ले। तुम दुनिया की सबसे बेकार इंसान हो...' 

'सच्ची !! फिर क्या सोचा?'

'तुमसे बतियाये बगैर रह जो नहीं पाता हूँ। क्या करूँ....मेरी आदतें। ये आदतें भी अज़ीब होतीं हैं। बेकार आदतें...'

'हम्म्म सो तो है। तुम भी बेकार और तुम्हारी आदतें भी बेकार।' 

"हाहा...."  ( दोनों एकसाथ हँस पड़ते हैं। गुलमोहर लरजने लगता है, दिशाएं महकने लगतीं हैं ) 




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...