Monday, November 16, 2015

तेरा शहर कितना अज़ीब है


तेरा शहर अज़ीब है। आज मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा । 

क्यों ?

यहाँ नदी नहीं, फुर्सतें नहीं और साफ़ नीला आकाश भी नही है। 

जहाँ था वहाँ से क्यों चली आई ?

वहाँ डर नहीं, प्रदूषण नहीं, उलझनें नहीं और भागम -भाग भी नहीं। पुरसुकून और खामोशी है। 

तो ?

तो क्या ? कुछ नहीं....भीतर भी खामोशी और बाहर भी खामोशी.....ऐसे भी कहाँ चलता है। जीवन है सामंजस्य बना रहना चाहिए ना ? ऐसा....

तो अब क्या सोचा ?

कुछ नहीं। तेरा शहर अज़ीब तो है। पर तू यहाँ है न इसलिए तेरा शहर भी अच्छा है। चलो रह लेते हैं। यहीं..... 

चल फिर, मेरे अज़ीब शहर की अज़ीब कॉफी पीते हैं ?

ओह येस्स .... चल न..... जल्दी। पर चाय पिएंगे। 

तू भी अज़ीब है।  








   
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...