Sunday, November 8, 2015

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता


'अजीब होता है सिर्फ अपने आप से महोब्बत करते हुए जीते चले जाना। या रब यह इक-तरफा प्रेम कितनी तकलीफें देता है। झूठे भरम से भी ज्यादा। न जाने कितने वर्ष बीत गए, कितने और बीत जायेंगे। 

बेशक कुछ खोया हुआ सा नहीं लगता है परन्तु कुछ पाया सा भी नहीं लगता है। इससे अच्छा खो ही जाये, तो भी ठीक। आगे कोई इंतज़ार नहीं होगा। पलट कर देखने की ज़हमत नहीं उठानी होगी। न किसी ने आना था न कभी कोई आएगा। फिर ये पलट कर देखने की आदत किस लिए? किसके इंतज़ार में ? सब कुछ अजीब है, उलझा -उलझा सा.... गडमड।' 

"ओए.... क्या बकबका रही है ?"

" कुछ नहीं…"

" चल ओए…कुछ कैसे नहीं। दोस्त हूँ तेरा। सब समझता हूँ। चल बता। फ़टाफ़ट "

"कहा ना कुछ नहीं…… "

"ठीक है, मुझे तू बताना नहीं चाहती और कोई तेरी बात सुनेगा नहीं "

"हाँ… तो....? तू अपने काम से काम रख "

"और तू बकबकाती रहना,  यूँ ही ज़िंदगी भर..... " 

"सुन चल अब घर चलते हैं। शामें ठंडी और उदास होने लगीं हैं "

"अब कब मिलेगी ?"

"मिलूंगी ना…एक तू ही तो है जिसे मेरी खामोशी भी समझ आ जाती है "

"फिर तू मुझसे प्रेम क्यों नहीं करती ?"

"करती हूँ ना? तुझसे प्यारा कोई दोस्त नहीं "

"हम्म …" 

धीरे -धीरे चलते हुए दोनों मेरी आँखों से ओझल हो जाते हैं। 

'जहाँ उम्मीद हो इसकी वहां नहीं मिलता '  ( लव इन मेट्रो स्टेशन पर )



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