Monday, October 12, 2015

दरकते रिश्ते - समाज कल्याण पत्रिका के अक्टूबर २०१५ अंक में प्रकाशित कहानी



"मुझे माफ़ करना पुष्पा, इन लोगों की पढ़ाई की खातिर, इनके भविष्य को बनाने की व्यस्तता के चलते मैं तुम्हारा ध्यान ठीक से नहीं रख सका। सोचा था ऊँची शिक्षा ले कर ऊँचे पद पर पहुँच कर ये दोनों हमारा ध्यान रखेंगे। हमारा बुढ़ापा बच्चों का मुँह देख कर चैन से कट जाएगा। परन्तु मुझे क्या मालूम था कि हमें ये दिन देखने पड़ेंगे। ये इतने ऊँचे उठ जाएंगे कि नीचे अपनी मिट्टी को और हमें देखने के लिए इनकी अकड़ी हुई गर्दन झुकना भूल जाएगी।" सबके हौसला देने के बावजूद भी वे बेहिसाब सिसकते रहे। उनके दिल का दर्द अपने चरम पर था।

सुबह कुछ रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों की मदद से वे आखिरी रस्मों की तैयारी पूरी करने में लग गए। अर्थी उठने तक दोनों बेटे बिना परिवार के ही सही परन्तु वहाँ पहुँच गए। उन्हें देख कर राधेश्याम बिफर पड़े। "अब क्या करने आए हो? यहाँ अब तुम लोगों का क्या रह गया है? चले जाओ यहाँ से....नालायकों....खबरदार जो पुष्पा को हाथ भी लगाया तो?" राधेश्याम ने उन्हें माँ को कन्धा देने के लिए साफ़ मना कर दिया। 


पुष्पा की यही आखिरी इच्छा थी। अपने आखिरी समय पर स्नेह से राधेश्याम का हाथ पकड़कर उसने टूटते हुए कहा था। "जी बेटे तो तब भी नहीं आ सकेंगे। जानती हूँ वहाँ पर बहुत अलग तरह का व्यस्त जीवन होता है। उनसे कुछ मत कहना। उन्हें परेशान भी मत करना। उनका अपना घर-परिवार, जिम्मेदारियां और व्यस्तताएँ है। अब जब यहाँ तक आपने ही साथ दिया है तो मुझे आखिरी विदाई भी आप ही देना। मैं समझूंगी मुझे स्वर्ग मिल गया।"



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