Friday, September 18, 2015

दिल आज शायर है


झूठे भरम में जीना बहुत अच्छा होता है। अपने हिसाब से कल्पनायें गढ़ों फिर अपने हिसाब से उसमें रंग भरो और अपने मन मुताबिक कलाकृति पाओ। कितनी कमाल की बात है। जब सब कुछ अपने मन का हो जाए तो दिन खुशियों से महकने लगते हैं। 

जरा सा भरम टूटा और हम बिखर जाते हैं। मन के कैनवास पर सारे रंग बिखर कर एक -दूसरे पर फ़ैल जाते हैं…गडमड हो जाते हैं। अब ये जीना भी कोई जीना हुआ.....बेकार हुआ....मन बेवजह की उदासियों से घिर जाता है। 

अपने पहाड़ ही अच्छे हैं। अखंड, अटल, अविचलित। इनके सानिद्ध्य में, मैं समृद्ध हो जातीं हूँ, पूर्ण हो जाती हूँ। और यही जीवन है.....इस दुनिया से बेगाना होकर अपने आप में खो कर जीना ही जीना है। अस्तु !! 


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