Sunday, May 3, 2015

चाँद को रोक लो


नए जीवन की शुरुआत हो रही थी। नए घर में गए। सब कुछ नया था। नया परिवार, नया संसार। नए लोग नए तौर तरीके। हम वही, जो थे सो थे। बाबूजी कभी समझा दिया करते थे। "बेटा कुछ खाना बनाना सीख लो नहीं तो ससुराल में सास मां की मार खाओगी।"

मुझे बड़ी हैरानी होती थी भला खाना बनाना कौन सा मुश्किल काम है, इसके लिए कौन सी बड़ी पढ़ाईयां और डिग्री चाहिए थी? मेरे घर पर ठेठ अनपढ़ अम्मा, क्या लज़्ज़तदार खाना पकाती थी। एक दिन मैंने अम्मा से पूछा। "अम्मा आप ने खाना बनाना कहाँ से सीखा ?" वह जोर से हंसी और बोली। "भगबान ने सब कुछ्छ सीखा कर भेजा ठहरा मुझे।" 

"मुझे क्यों नहीं सिखाया ?" मैंने भी उनके मज़ाक में साथ दिया। 

"तुझको बाबू और काम करने के लिए भेजा ठहरा फिर। "

" तो मेरे साथ ससुराल आप चलना खाना बनाने। " 

" ठीककक हो गया फिर। आउंगी तेरे दहेज़ में।" सभी हंस दिए। मां ने रसोई में कभी जाने नहीं दिया। मुझे कुछ आया नहीं। बात ख़तम हो गई। 

ब्याह के बाद माताजी ने घुड़का। "खूब घूमना -फिरना हो गया है अब चलो रसोई के दर्शन भी कर लो।" उस घर में खाने को इतनी तवज्जो दी जाती थी कि मैं असमंजस में। पूरे वक्त रसोई, पकवान और खाना। जब खाना सच में बनाना पड़ा तो बड़ी भाभी का मुंह देखा। उन्हें बताया। "भाभी मुझे नहीं आता। "

भाभी ने माताजी के आगे शोर मचाया। " अब क्या करोगी? एक और अनपढ़ आ गई। अब खाओ छप्पन भोग।" 

माताजी सख्त स्वभाव की। मुझे घूर कर बोलीं। "इधर आ क्वीन विक्टोरिया। तुझे सच में नहीं आता या कामचोरी है?" पापाजी बेहद नेक इंसान थे। मेरे मायूस चेहरे की तरफ देख कर माता जी से बोले। "कोई बात नहीं... बच्चे हैं...सीखा दो सब आ जाएगा।" उस दिन लगा बेकार की शादी। मेरा बस चले घर में रसोई बनाऊं ही नहीं।  

"जा... मूरख।" माताजी ने लानत भेजी। परन्तु फिर सीखाने भी चली आईं। मैंने बेमन से कुछ दिन थोड़ा बहुत सीखा। फिर भाभी से एक अम्मा को ढूंढ कर लाने के लिए कह दिया। भाभी मेरे हाल पर फिर हंस दी। माताजी को बताया। इस बार वे भी जोर से हंस दी और बोली। "अरे महा-मूरख...क्यू परेशान है..."

अब कुछ वर्षों से जीवन में कोई नहीं है। जो बात -बेबात स्नेहवश मूरख, महा-मूरख कहे। ऐसे लोगों का जीवन में होना बहुत जरूरी होता है। नहीं तो खामख्वाह लगने लगता है कहीं ऐसा तो नहीं कि हम बहुत विद्वान टाइप कुछ हो गए हैं। 

कहीं पर वैसे वाले सच्चे अपनेपन का अहसास अब नहीं मिलता। सब तरफ दिखावा, बनावट, अहम, झूठ, फरेब, दुराव -छिपाव और भी न जाने क्या -क्या बिखरा हुआ है। अति प्रेम और मिठास से भरी चिकनी -चुपड़ी बातों से मुझे कोफ़्त सी होने लगती हैं।

 मुझे तो खडूस की उपाधि मिली हुई है और मुझे पसंद भी वैसे ही लोग आते हैं। अब ?? 




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