Thursday, February 26, 2015

मेरा गीत अमर कर दो



'तुम इस रंग का नेल पेंट क्यों लगाती हो ? नाखून गुलाबी होने चाहिए। इस तरह के सुनहरे देखे हैं कभी ? तुम्हारे ख़्वाबों जैसे.....बेबुनियाद '

'तुम ख्वाब देखते हो ?'

'बिलकुल देखता हूँ , पर तुम्हारी तरह आधारहीन नहीं '

'हम्म्म्म '

'क्या हुम्म्म्म ?'

'कुछ नहीं, यूँ ही...'

'हद है.....मेरे साथ होकर भी मेरे साथ नहीं हो '

'हुमायूँ का मक़बरा अकेले देखने जाने पर सुंदर लगेगा या फिर तुम्हारे साथ देखने पर ?'

'तुम अकेली होती कब हो, तब भी मेरी यादों के साथ होती हो '

'तुम्हारे आफ्टर सेव लोशन का नाम बताऊँ ?'

'हाँ तुमने दिया था। तभी तो तमाम दिन उसकी महक से महकता रहता हूँ '

'और ?'

'और क्या ? काम भी करता हूँ। पापी पेट का सवाल है '

'और ?'

' हाँ… रह -रह कर तुम्हारी यादों से घिर जाता हूँ। यही सुनना चाहती थीं न ?'

'अब आओ हुमायूँ के मकबरे के भीतर चलें और अपने प्रेम को अमर कर दें ' 

' कैसे ?'

वह अपने बालों में लगी हेयर क्लिप निकालती है और अपने सलीम का हाथ थाम लेती है। फिर मकबरे की तरफ तेज क़दमों से बढ़ती है। हँसता हुआ सलीम खुशी से दमकता हुआ बुदबुदाता है। 

'पागल हो गई हो क्या ? सुनो तो....... रुको तो.....'

दोनों को देखती हुई मैं सोच रही थी। पागल तो दोनों जरूर हैं....एक -दूसरे के प्रेम में पागल 

इनका पागलपन हो गया और हमारी इमारत का कबाड़ा....... As if.... 




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