Sunday, August 31, 2014

हर अमृता को इमरोज़ नहीं मिलता


'दुनिया में साहिर तो फिर मिल जाएंगे, परन्तु शिद्दत से भरा दिल लिए इमरोज़ नहीं मिलेंगे '

'ये क्या बकवास है ?'

'क्यों ? मुझे साहिर पसंद नहीं '

'तुमसे पूछा किसी ने ?'

'तब भी बता रही हूँ। प्रेम को समझना इतना आसान होता तो आज दुनिया में सुकून बरस रहा होता '

'क्या दुनिया वालों के पास प्रेम के अलावा और कुछ काम नहीं है ?'

'है न, परन्तु अन्य काम करने के लिए जो आत्मविश्वास और हिम्मत प्रेम देता है वह और कहीं नहीं'

'तुम्हे बड़ा अनुभव है '

'है… तभी तो कह रही हूँ '

'तंज़ मुझ पर ?'

'बड़ा फर्क गिरेगा तुम्हे.... '

'समझा करो, तब साहिर बोल नहीं सका था, होता है ……'

'लिखता तो कमाल का था। लिख कर ही बता देता '

'इतने ढेरों गीत लिखे तो हैं उसने '

'जिसके लिए लिखे उसे बताना तो था। हवाओं के लिए लिखे क्या ?

'ना तुम्हारे लिए लिखे थे। बात करती हो ......पूरे दिन गीत सुनती रहती हो ' 

'मुझे चुप्पे लोग बिलकुल पसंद नहीं '

'तो क्या मैं चुप्पा हूँ ?'

'ना तुम तो दस चुप्पों के बराबर बोलते हो '

'तो मैं तुम्हारा इमरोज़ हुआ ?'

'अरे नहीं …तुम तो मेरे साहिर हो '

'तो तुम अमृता हुईं ?'

'बिलकुल नहीं मैं तो एक ख़्वाब हूँ.......'

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