Saturday, July 12, 2014

खामोशियाँ गुनगुनाने लगीं



'ग़ज़ल लिख सकोगी ?'

'ना '

'अरे सीधे ना, कोशिश करके तो देखो '

'ठीक है,  I will try'                                                                    

'ये होता है मक़्ता , ये रदीफ़, काफ़िया ये मात्रा, शेर और ऐसे बनती है ग़ज़ल। ऐसे लिखो '     

' देखो..... लिख दी मैंने, ग़ज़ल '                      

'जीरो नंबर, सिफ़र.....बेवकूफ हो तुम। अर्जुन की आँख की तरह केवल मात्रा ही थोड़े देखनी होती हैं। दिल को खोलो ......उसमे दर्द और मोहोब्बत जगाओ'

'खाक.....दिल तो है ही नहीं' 

'कहाँ गया ?'

'है तो परन्तु बड़ा नीरस, उबाऊ, कठोर, शुष्क, प्रेमविहीन वाला है। मित्रों की भाषा में पत्थर जैसा। कतई किसी काम का नहीं है '

'फिर तो जाने दो। लिख लिए तुमने गीत - ग़ज़ल'

'अब ?'

'अब कुछ नहीं... तुम्हारी कलम मनमौजी है जो मन में आए वो लिखो' 

'कुछ तो बताओ क्या लिखूं ?'

'आलोचना लिख डालो।'  

'किसकी ?'

'किसी की भी '

'सन्नाटे की कर दूँ ?'

'और तुमसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है '

"............. "



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