Thursday, March 13, 2014

एक राह तो वो होगी तुम तक जो पहुँचती है


 "मुझे कांच की चूड़ियाँ बहुते पसंद हैं "

"क्यों ? अब ऐसा क्या है इनमें ?"

" ये हमेसा सोर जो करती रैती है न , कभी उदास नी होती "

" शोर तुम्हें इतना पसंद है ?"

"हाँ ....है तो सही ....चुप्पी से दिल घबराता जैसा है "

"घबराता क्यों है ? मैं हूँ न तुम्हारे पास "

" नी हो तुम ....कब्बी बहुते बोलते हो कब्बी एकदम चुप्पे -चाप हो जाते हो "

" अरे ऐसा कहाँ करता हूँ ...बोल तो रहा हूँ ..देखो बोला न ? "

"नै हमारे साथ ऐसा नी होता। बोलो तो फिर हमेसा बोलो। नी बोलो तो फिर कब्बी मत बोलो "

"अरे बड़ी खतरनाक हो तुम तो"

"नै हम नी , खतरनाक बी तुमी हो। कब्बी पहचानो, कब्बी मत पहचानो ..ये स्वांग हमें नी भाता  "

" तुम गाँव वाले भी अज़ीब होते हो !!  "

"तुम सहर वाले बी खूब होते हो !! "



           
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