Friday, February 14, 2014

ये ज़मीं चाँद से बेहतर नज़र आती है हमें


" इधर आओ तो...........ओहो .... जल्दि……देखो तो............. च्च्च्च.......... आ भी नहीं सकते…क़्या तुम भी……"

"कितना शोर करती हो ………क्या देखना है.......... दिखाओ"

"मेरा सर ...... छुप गया अब वो, बादलों के पीछे। वो ऊपर आकाश में खामोश, अकेला, टंगा चाँद "

"अब इसमें देखने जैसा क्या है ? रोज़ ही तो निकलता है। तुम्हारी तो आदत हो गई है शोर मचाने की। पिछले जन्म में चिड़िया थी क्या ?"

" नाह……तारा थी....... चाँद के सबसे नजदीक वाला "

"पता इस चाँद को न बहुती मज़ा आता होगा। ऊपर से सारे संसार को देखते रहो। सब इससे कितना प्यार करते हैं। और एक ये है भाव खाता हुआ। किसी को कोई जवाब ही नहीं देता …मुझे तो कमस कम नही ही देता "

"अरे नहीं वो चाँद न……… "

" हाँ …हाँ…जानती हूँ........उसे नहीं बोल पाने की सजा वाला श्राप मिला है। किसी ऋषी मुनि ने दिया है "

"तुम कभी कायदे की बात क्यों नहीं करती हो ? जब देखो बिना सर पैर की वाहियात बातें "

"नहीं रे जब मुझे भूत लग जाता है न तभी करती हूँ। नहीं तो चुप ही तो रहती हूँ। रहती हूँ कि नहीं .....जल्दि बताओ ?"

"ख़ाक चुप रहती हो...... तुम्हारी तो चुप्पी भी शोर करती है "

"तो मैं बोलूँ भी नहीं और चुप भी नहीं रहूँ ? ऐसा कहना चाह रहे हो ?"

"हाँ ऐसा ही कह रहा हूँ........कर सकती हो ऐसा ? हाँ नयी तो……बेकार की बात "

"अच्छा सुनो……अब तो मैंने बहुत बोल लिया...... गला और होंठ भी सूख गए.....प्यास जैसी भी लगने लग गई.......कुछ पिलाओ तो"

"…………… "

"क्या.........पानी की बात कर रही हूँ.......हट्ट.....यु डर्टी माइंड……"

कल शाम वहाँ रेस्त्रां की भीड़ में दोनों को देखती, सुनती मैं सोच रही थी……ये नोक -झोंक कभी प्यार में तब्दील हो जाएगी या फिर........बातें हैं बातों का क्या 

  प्रेम चतुर्दशी की शुभकामनाएँ ! सभी पर प्रेम और सुकून बरसे 


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