Monday, January 13, 2014

Mesmerising and Thrilling Kolhu Jungles in Kotdwar , Pauri Garhwal (Uttarakhand )



मुख्य कोटद्वार ( जिला पौड़ी गढ़वाल ) से सनेह गाँव लगभग दस किमी की दूरी पर है। यहाँ से शुरू होता है लैंसडॉन वन प्रभाग का कोल्हू चौड़ जंगल। जिम कॉर्बेट , नैनीताल से भी इसमें प्रवेश किया जा सकता है।


घने जंगल और कोल्हू नदी के बीच से तेरह बार गुजरते हुए फॉरेस्ट गेस्ट हॉउस ( लगभग ९ किमी ) तक पहुँचने का सफ़र अत्यंत रोमांचक और शानदार था। एक पत्थर को सात बार पानी में उछालते हुए इन कांस्टेबल भाई जी ने बच्चो को तो आश्चर्य में ही डाल दिया। 





 १८९० के अंग्रेजी आर्कीटेक्चर से बने इस गेस्ट हॉउस के अंदर रहने की सारी सुविधाएँ हैं। सोलर सिस्टम और जेनेरेटर से बिजली की पूरी व्यवस्था भी है। रात को फायर प्लेस में आग जलाने से कमरे बेहद आरामदायक हो गए थे। 

 बच्चे पानी में स्टोन बम्पिंग कराते हुए और पत्थर ढूंढते हुए। पतला और चिकना पत्थर होना चाहिए ऐसा उन्हें साथ चलते हुए भाई जी लोगों ने बताया।


 ये है विशाल कोल्हू चौड़। जहाँ पर गूजर प्रजाति की कुछ झोपड़ियां हैं। थोड़ा संकोची स्वभाव के लोग जो मवेशी पालते हैं और दूध का कारोबार करते हैं। यहाँ पर बिजली, पानी ,स्कूल आदि की कोई व्यवस्था नहीं है। आज की इस साधन संपन्न दुनिया में मुख्य कोटद्वार से मात्र कुछ बीस किमी की दूरी पर इतनी असुविधायें देख कर आश्चर्य के साथ -साथ मन दुखी होता है।


उन्होंने शुद्ध दूध पीने को दिया तो अपना गाँव याद गया। वहाँ पर ताईजी की जर्सी गाय का ही ऐसा दूध पीने को मिलता है।


अति अनुभवी ड्राइवर महोदय ने बताया कि यहाँ पर जंगली हाथी, बाघ, चीता, आदि होते हैं। हमें सिर्फ साम्भर, चीतल, काकड़, सियार , गोह, मोर और बहुत से रंग बिरंगे पक्षी ही देखने को मिले। सब से पहले गाड़ी के आगे से काकड़ दौड़ा तभी ड्राइवर ने कहा -" साब ये बड़ा अपसगुनी जानवर होता है। सबसे पहले मिला अब आपको हाथी , चीता कुछ भी देखने को नहीं मिलेगा।" बच्चे इस अंधविश्वास पर बहुत हँसे…ये आजकल के गंदे बच्चे भी न...


 घने जंगल में कट सागौन , रिंगाल ,रोहिणी आदि बहुतायत में पाये जाते हैं जो हाथी का प्रिय भोजन है। सागौन हाथी नहीं खाता।


बहुत घने जंगल से मेरा मन कभी बाहर आने को नहीं करता। कितनी मदहोश करने वाली खुश्बू होती हैं यहाँ की मिट्टी और वनस्पतियों में । अद्भुत !!


यहाँ पर शिव का अति प्राचीन मंदिर भी हैं। जहाँ हर वर्ष दो जून को गाँव वाले भंडारा करते हैं। उस दिन वर्षों से निरंतर बह रहे इस प्राकृतिक धारे के पानी से ही सारा भोजन बनाया जाता है। शिया थापली वाले बाबा जी ने निमंत्रण दिया है। जाना आप सब भी :)) जंगल और इस तरह की रोमांचक यात्रा पसंद करने वाले मित्र जन।


वहाँ पर बिलकुल भी सिग्नल नहीं था। इसलिए एक रात और दो दिन मोबाइल और मायावी दुनिया से दूर रहकर और भी आनंद आ गया। कुछ भी तो नहीं बिगड़ा। हम लोगों ने खुद ही अपनी जान इन गेजेट्स के चलते आफत में डाल रखी है।

फिर वही रात वही दिन / वही दुनिया वही दुनियादारी।



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