Monday, January 27, 2014

कण्व ऋषि आश्रम Kotdwar, Distt Pauri Garhwal (Uttarakhand )

मुख्य कोटद्वार से दस किमी दूर स्थित ये है शकुंतला और दुष्यंत पुत्र भरत की जन्मस्थली जिनके नाम पर हमारे देश का नाम 'भारत' पड़ा। अपनी दुर्दशा पर आँसू बहाता, खंडहर होता , कण्व ऋषि आश्रम। 


सौम्य से दीखते बाबाजी रमानंद दीक्षित ने बताया कि भरत का पालन -पोषण और शिक्षा -दीक्षा अन्य बालकों के साथ यहीं पर हुई थी। किवदंती के अनुसार उन्होंने शावक के दाँतों की गिनती भी यहीं पर की थी। भारत देश ........ जय हो !!
इस मालिनी नदी को पार करके यहाँ पहुंचना होता है। इस पर एक लोहे का पुल भी बन रहा था। दरोगा जी ने बताया कि पिछले दो वर्षों से बस बन ही रहा है और बनता ही जा रहा है …


ट्रस्ट और बाबा रामानंद दीक्षित जी के बीच मतभेद और मनभेद के चलते देश की इस बेशकीमती धरोहर की दुर्दशा। इस मंदिर पर ताले लगे हैं। कोई पूजा -पाठ नहीं कोई रख रखाव नहीं। बाबाजी वही पर पीछे बनी एक कुटिया में रहते हैं।अपनी व्यथा सुनाते हुए कहते हैं -" इसका कोर्ट में केस चल रहा है ,कितने ही मीडिया वाले आ गए, पत्रकार देख गए, कई पत्रिकाओं में इस पर बहुत कुछ लिखा गया। परन्तु सर हालत आप स्वयं देख लें।"


वैसे हर वर्ष जून माह में यहाँ इसी मालिनी नदी के किनारे खूब बड़ा मेला लगता है।


ये कभी यज्ञ स्थल रहा होगा। भरत आज यहाँ आँसू बहाने आते होंगे। एक 'आम आदमी स्टाईल' अनशन मांगती है ये जगह। 


अब इन सीढ़ियों की हालत देख कर मुझे तो...बीस साल बाद वाला चलचित्र याद आ रहा था। वैसे लेखक दिमाग यहाँ पर मस्त कहानियाँ लिख सकते हैं। सूखे पत्तों और वनस्पतियों की खुश्बू के बीच एक फील आ रही थी। इन पर घंटों आराम से बैठा जा सकता है। किसी काम तो आए ये। यही सही........ 


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