Saturday, January 11, 2014

दिन महीने साल गुजरते जाएँगे


" आज ठण्ड ज्यादा है न ?"


"कल भी तो तुमने ऐसा ही कहा था। रोज़ वही बातें दोहराते हो , बोर नहीं होते ? तुम्हारे हिसाब से तो अब तक टेम्प्रेचर बिलो ज़ीरो हो जाना चाहिए था "

"तुम वीकेंड्स पर खीजी हुई क्यों रहती हो?" 

"हाँ तो तुमसे कौन कहता है मेरे साथ चला करो ? मुझे अकेले टहलना बहुत पसंद है "

"जानता हूँ। परन्तु तुम अकेली कहाँ हो पार्क में और भी तो बहुत लोग हैं "

"जानते होते तो मेरे साथ नहीं होते इस वक्त "

"तो जाऊं क्या ?"

"जाओ जल्दी और लीव मी अलोन डिअर सर "

" जानता हूँ तुम मेरे मफलर से कान ढक लेने से खफा हो जाती हो ?"

"मेरी बला से तुम कुछ भी पहनो बस मेरे से दूर रहो "

"......."

" और सुनो कल सुबह ठीक छह बजे यही इसी जगह ....... ठीक ?"

"क्यों फिर बोर नहीं होंगी मुझसे। मंकी कैप पहन कर आउंगा "

" चलेगा ....... पर कह दिया न पहुँच जाना, बस.... मुझे अकेले टहलना अच्छा नहीं लगता "

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